जनसमाज संवाददाता: लद्दाख की पर्यावरण सुरक्षा, लोकतांत्रिक अधिकारों और हाल ही में देश की शिक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं व पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भूख हड़ताल कर रहे जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक एक बार फिर देश की राजनीति और जन-चर्चा के केंद्र में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठने के बाद जब प्रशासन द्वारा उन्हें स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब उन्होंने अनशन वापस लेने के लिए सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के समक्ष कुछ विशेष शर्तें रखीं।
वांगचुक द्वारा रखी गई इन शर्तों को लेकर राजनीतिक गलियारों, कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। जहाँ एक तरफ उनके समर्थक और सहयोगी इसे न्याय और जवाबदेही तय करने की पारदर्शी लड़ाई मान रहे हैं, वहीं आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक इन शर्तों के औचित्य, शैली और समयबद्धता पर सवाल उठा रहे हैं।
किन शर्तों पर टिका है अनशन तोड़ने का फैसला?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ और अस्पताल से जारी पत्रों के जरिए सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया कि वे अपनी भूख हड़ताल तभी समाप्त करेंगे जब उनकी मुख्य मांगों या शर्तों पर ठोस प्रगति होगी। उनकी प्रमुख शर्तें कुछ इस प्रकार हैं:
- सरकार द्वारा जवाबदेही स्वीकार करना: देश की शिक्षा व्यवस्था में हालिया कमियों, विशेषकर पेपर लीक जैसे मामलों की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकार द्वारा ली जाए।
- संसद भवन पर आश्वासन: यदि वांगचुक और प्रदर्शनकारी प्रतिनिधियों को संसद के द्वार तक जाने दिया जाए, तो वहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता खुद आकर उन्हें भरोसा दिलाएं कि इन विषयों को संसद सत्र के भीतर मजबूती से उठाया जाएगा।
- अस्पताल में सांसदों की मौजूदगी: यदि स्वास्थ्य संबंधी कारणों या प्रशासनिक पाबंदियों के कारण उन्हें संसद जाने की अनुमति नहीं मिलती, तो सर्वदलीय सांसद और नेता सफदरजंग अस्पताल आकर उन्हें इस बात का सार्वजनिक आश्वासन दें।
क्यों उठ रहे हैं सवाल? प्रमुख विवादित पहलू
इन शर्तों के सार्वजनिक होने के बाद से ही विभिन्न मोर्चों से कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं:
1. संसदीय और संवैधानिक प्रक्रियाओं का टकराव
कानूनी विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। किसी व्यक्तिगत आंदोलनकारी या समूह की यह मांग कि विभिन्न दलों के सांसद अस्पताल परिसर या संसद के बाहर आकर उन्हें आश्वासन दें, स्थापित संसदीय प्रोटोकॉल और लोकतांत्रिक गरिमा के खिलाफ है। आलोचकों का तर्क है कि नीतियों में बदलाव और चर्चा का सही मंच संसद का पटल है, न कि किसी दबाव समूह की शर्त पर दिया गया लिखित या मौखिक आश्वासन।
2. विरोध का राजनीतिकरण
सोनम वांगचुक ऐतिहासिक रूप से लद्दाख के पर्यावरण, छठवीं अनुसूची और स्थानीय स्वायत्तता के लिए एक गैर-राजनीतिक चेहरे के रूप में जाने जाते रहे हैं। हालांकि, दिल्ली में NEET/पेपर लीक विवाद, राजनीतिक छात्र संगठनों और संसद मार्च जैसे अभियानों से जुड़ने के कारण विश्लेषकों का मानना है कि उनका आंदोलन अब गैर-राजनीतिक न रहकर विशुद्ध सियासी रंग ले चुका है। इस बदलाव ने उनकी मूल मांगों से ध्यान भटका दिया है।
3. प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव
दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय के दृष्टिकोण से देखें तो मानसून सत्र के दौरान संसद परिसर और उच्च-सुरक्षा क्षेत्रों में भीड़ जुटाने या सांसदों को एक स्थान पर बुलाने की मांग से सुरक्षा और यातायात व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ता है। धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लागू होने के बावजूद इस प्रकार की शर्तें रखना प्रशासनिक गतिरोध को बढ़ावा देने जैसा माना जा रहा है।
4. ‘अवैध हिरासत’ के आरोप और अस्पताल का माहौल
वांगचुक ने आरोप लगाया कि उन्हें सफदरजंग अस्पताल में अवैध रूप से नजरबंद किया गया है और उनके संवाद पर पाबंदियां लगाई गई हैं। इसके विपरीत, दिल्ली पुलिस और अस्पताल प्रशासन का कहना है कि लगातार भूख हड़ताल के कारण गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें जीवन रक्षा और चिकित्सा देखभाल के लिए अस्पताल लाया गया था।
लोकतंत्र और सत्याग्रह के तरीके पर बहस
सोनम वांगचुक के इस रुख ने भारतीय लोकतंत्र में अहिंसक विरोध, सत्याग्रह की सीमा और सरकार की जवाबदेही के तरीकों को लेकर एक मौलिक सवाल खड़ा कर दिया है।
फिलहाल यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय तक भी पहुँच चुका है, जहाँ वांगचुक के स्वास्थ्य और उनकी स्थिति पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी गई है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार और विभिन्न दल संवाद का कोई नया रास्ता तलाशते हैं या फिर शर्तों और प्रशासनिक सीमाओं का यह विवाद और अधिक गहराता है।
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और जंतर-मंतर पर चल रहे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए आप यह वीडियो देख सकते हैं: Sonam Wangchuk Hunger Strike Updates। इस वीडियो में वांगचुक द्वारा रखी गई शर्तों, सफदरजंग अस्पताल से जुड़े उनके दावों और दिल्ली में सुरक्षा इंतजामों की पूरी रिपोर्ट दिखाई गई है।
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