बांग्लादेश की राजनीतिक हलचलों का सीधा प्रभाव हमेशा से भारत पर पड़ता रहा है। अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को ढाका छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इसके बाद से ही बांग्लादेश की बागडोर अंतरिम सरकार के हाथों में है और भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक ठंडापन देखा गया है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं और शेख़ हसीना बांग्लादेश लौटती हैं, तो इससे भारत को क्या और कैसे फ़ायदे हो सकते हैं? यह केवल एक राजनीतिक नेता की स्वदेश वापसी का मामला नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता, सीमा सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी का एक बेहद अहम पहलू है।
1. पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और आतंकवाद पर लगाम
भारत के दृष्टिकोण से शेख़ हसीना के शासनकाल (2009 से 2024) की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत-बांग्लादेश सीमा पर शांति और सुरक्षा रही है।
- पूर्वोत्तर के उग्रवादियों पर कार्रवाई: जब हसीना सत्ता में थीं, तब उन्होंने बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए करने की सख्त मनाही कर दी थी। उन्होंने ULFA (उल्फा) और NDFB जैसे उग्रवादी गुटों के शीर्ष नेताओं को पकड़कर भारत को सौंपा था, जिससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (असम, त्रिपुरा, मेघालय) में अलगाववाद की कमर टूट गई थी।
- कट्टरपंथ और आतंकवाद नियंत्रण: हसीना की वापसी से बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव कम हो सकता है। यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक राहत की बात होगी, क्योंकि ढाका में कट्टरपंथी तत्वों का उभार भारत के सीमावर्ती राज्यों में उग्रवाद और घुसपैठ को बढ़ावा देता है।
2. चीन और पाकिस्तान के प्रभाव पर अंकुश
बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए बहुत संवेदनशील है। बांग्लादेश को ‘सैंडविच देश’ की तरह देखा जाता है जो भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब है।
- चीन का प्रभाव घटाना: शेख़ हसीना ने हमेशा ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति को प्राथमिकता दी। उन्होंने चीन से भारी आर्थिक सहायता और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तो स्वीकार किया, लेकिन रणनीतिक और सुरक्षा के मुद्दों पर हमेशा भारत का ख्याल रखा। वर्तमान अंतरिम सरकार या विरोधी दल BNP (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के रुख में चीन के प्रति झुकाव स्पष्ट दिखाई देता है। हसीना की वापसी इस संतुलन को फिर से भारत के पक्ष में मोड़ सकती है।
- पाकिस्तान की साज़िशों पर रोक: BNP और जमात-ए-इस्लामी के शासनकाल में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का बांग्लादेश में व्यापक प्रभाव रहता था। शेख़ हसीना के लौटने से बांग्लादेश फिर से भारत-विरोधी साज़िशों का अड्डा बनने से बच सकता है।
3. आर्थिक साझेदारी और ‘कनेक्टिविटी’ को नया जीवन
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए बांग्लादेश के जरिए कनेक्टिविटी (सड़क, रेल और जलमार्ग) बेहद ज़रूरी है।
- पूर्वोत्तर के लिए आसान पहुँच: शेख़ हसीना के कार्यकाल में ही अखौरा-अगरतला रेल लिंक, चटगांव (Chattogram) और मंगला (Mongla) बंदरगाहों तक भारत की पहुँच और अंतर्देशीय जलमार्गों (Inland Waterways) के समझौते हुए। इससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुँचाना सस्ता और तेज़ हो गया।
- द्विपक्षीय व्यापार: बांग्लादेश, दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। हसीना की सरकार के समय दोनों देश व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर करने के बेहद करीब थे। उनकी वापसी से व्यापारिक अनिश्चितता ख़त्म होगी और दोनों देशों के बीच लंबित व्यापार समझौते तेज़ी से आगे बढ़ सकेंगे।
4. अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा और मानवीय पहलू
बांग्लादेश में शेख़ हसीना के जाने के बाद वहाँ के अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर हिंदुओं पर हमलों की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।
- सामाजिक स्थिरता: शेख़ हसीना की पार्टी (अवामी लीग) पारंपरिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष दल माना जाता है। उनके शासन में अल्पसंख्यकों को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा मिली हुई थी।
- शरणार्थी संकट से बचाव: यदि बांग्लादेश में कट्टरपंथ बढ़ता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, तो बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करके भारत के पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में शरण लेने की कोशिश करेंगे। हसीना की वापसी से बांग्लादेश के भीतर एक समावेशी वातावरण बनेगा, जिससे भारत पर शरणार्थी संकट का दबाव कम होगा।
5. ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और क्षेत्रीय संगठन (BIMSTEC)
भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी प्रथम) है। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के निष्क्रिय होने के बाद भारत ने BIMSTEC (बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन) को बढ़ावा दिया।
- शेख़ हसीना BIMSTEC की एक मज़बूत समर्थक रही हैं। बंगाल की खाड़ी के आसपास के देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए भारत और बांग्लादेश का एक पन्ने पर होना ज़रूरी है। हसीना के सत्ता में लौटने से दक्षिण एशिया में भारत के नेतृत्व को बल मिलेगा और क्षेत्रीय विकास की रुकी हुई परियोजनाएँ फिर से गति पकड़ सकेंगी।
क्या चुनौतियाँ भी हैं?
हालाँकि शेख़ हसीना की वापसी से भारत को कई कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ होंगे, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं:
जनभावना का सम्मान: बांग्लादेश की आम जनता में शेख़ हसीना के अंतिम वर्षों के शासन को लेकर भारी असंतोष था। यदि भारत केवल शेख़ हसीना का खुले तौर पर समर्थन करता दिखता है, तो बांग्लादेशी आवाम के बीच भारत-विरोधी (Anti-India) भावनाएं और गहरी हो सकती हैं। भारत को शेख़ हसीना के प्रति अपने समर्थन और बांग्लादेश की आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, शेख़ हसीना की बांग्लादेश में सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी (या उनकी पार्टी का पुनरुत्थान) भारत के लिए रणनीतिक रूप से एक ‘विन-विन’ स्थिति (जीत की स्थिति) होगी। इससे भारत-बांग्लादेश सीमा पर फिर से स्थिरता आएगी, आतंकवाद पर अंकुश लगेगा, चीन-पाकिस्तान का गठजोड़ कमज़ोर होगा और आर्थिक विकास का पहिया तेज़ी से घूमेगा।
भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और समृद्धि की कुंजी है—और इस कुंजी को सही दिशा में घुमाने में शेख़ हसीना हमेशा भारत की एक विश्वसनीय सहयोगी साबित हुई हैं।
यह भी पढ़ें: अजिंक्य रहाणे ने क्रिकेट और IPL को कहा अलविदा, शेयर किया इमोशनल पोस्ट