मेरठ जेल में करवा चौथ: ‘कातिल’ चर्चित महिला बंदियों मुस्कान और रविता ने मंगवाई चूड़ी-बिंदी, जानिए जेल प्रशासन और संस्था का रुख

मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिला कारागार से एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अपने पतियों की हत्या के आरोपों और सजा के चलते जेल की सलाखों के पीछे दिन काट रही बहुचर्चित महिला कैदियों, मुस्कान और रविता, ने इस बार करवा चौथ के पावन अवसर पर सोलह श्रृंगार का सामान यानी चूड़ियां और बिंदी की मांग की है। जेल में बंद इन महिला कैदियों द्वारा इस प्रकार की मांग किए जाने के बाद से यह मामला जेल परिसर से लेकर बाहर तक चर्चा का विषय बन गया है।

संजीवनी महिला संस्था की पहल और मांग

मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार को ‘संजीवनी महिला संस्था’ की एक टीम मेरठ जिला जेल का दौरा करने पहुँची थी। यह संस्था लंबे समय से जेल के भीतर महिला बंदियों के उत्थान, कल्याण और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में विभिन्न वोकेशनल ट्रेनिंग (व्यावसायिक प्रशिक्षण) जैसे कैंडल बनाना, ब्यूटीशियन कोर्स और अन्य हस्तशिल्प कार्य सिखाने का कार्य करती है। संस्था की सचिव पारुल बंसल के नेतृत्व में टीम ने जेल की महिला बंदियों से मुलाकात की और आने वाले करवा चौथ पर्व के मद्देनजर उन्हें पूजा और श्रृंगार से जुड़ी सामग्रियां उपलब्ध कराने की पहल की।

इसी दौरान जब महिला बंदियों से उनकी जरूरतों के बारे में पूछा गया, तो बहुचर्चित मामलों में बंद मुस्कान और रविता ने विशेष रूप से चूड़ियां और बिंदी की मांग की। संस्था की ओर से उनकी इस मांग को पूरा करते हुए उन्हें श्रृंगार का सामान और पूजा की अन्य सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। हालांकि, संस्था के अधिकारियों का यह भी कहना है कि हालांकि दोनों ने श्रृंगार का सामान जरूर मांगा है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से यह पुष्टि नहीं की है कि वे इस बार करवा चौथ का व्रत रखेंगी या नहीं।

जेल मैनुअल और प्रशासन के नियम

इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद जेल प्रशासन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जेल के नियमों और मैनुअल के अनुसार किसी भी महिला बंदी को अपनी आस्था के अनुसार व्रत रखने और पूजा-पाठ करने की पूरी स्वतंत्रता होती है। वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि जेल में बंद महिला कैदी अपनी इच्छा के अनुसार करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए जेल प्रशासन की तरफ से नियमानुसार फलाहार और पूजा की व्यवस्था की जाती है।

जेल प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला बंदी का पति दूसरे शहर में रहता है, तो वह उनकी तस्वीर या किसी अन्य निशानी को सामने रखकर विधि-विधान से पूजा कर सकती है। इसके अलावा, यदि पति-पत्नी दोनों ही जेल के अंदर बंद हैं, तो जेल नियमावली के प्रावधानों और आदेशों के तहत मुलाकात की व्यवस्था कराई जाती है। हालांकि, मुस्कान और रविता के मामलों को लेकर अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि चूंकि वे अपने मामलों में सह-अभियुक्तों के साथ जुड़ी हैं और वे वैवाहिक रिश्ते के दायरे में नहीं आती हैं, इसलिए उन्हें नियमों के तहत अलग-अलग परिस्थितियों में देखा जाता है।

मुस्कान और रविता के चर्चित मामले

गौरतलब है कि मुस्कान और रविता दोनों ही अपने-अपने मामलों को लेकर उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में चर्चा का केंद्र रही हैं। मुस्कान का नाम मेरठ के चर्चित ‘ब्लू ड्रम मर्डर केस’ (सौरभ हत्याकांड) से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालत द्वारा उसे और उसके साथी साहिल को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। हालांकि, इस सजा के खिलाफ उनके वकीलों द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की गई है, जिस पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। इसके बावजूद, जेल के भीतर मुस्कान लगातार खुद को व्यस्त रखने की कोशिश कर रही है। वह जेल के अंदर ब्यूटीशियन और कैंडल मेकिंग जैसे कोर्सेज में सक्रिय रूप से हिस्सा लेती रही है।

वहीं दूसरी ओर, रविता का मामला भी काफी संवेदनशील और गंभीर अपराधों से जुड़ा हुआ है। इन संगीन मामलों में उम्रकैद या सजा काट रही इन महिला कैदियों द्वारा त्योहारों के माहौल में इस तरह श्रृंगार सामग्री की मांग करना और जेल के भीतर धार्मिक परंपराओं का पालन करने की इच्छा जताना समाज और जेल व्यवस्था दोनों दृष्टियों से एक अनूठा पहलू प्रस्तुत करता है।

जेल में सुधारात्मक और रचनात्मक प्रयास

मेरठ जिला जेल में महिलाओं के जीवन को सकारात्मक दिशा देने के लिए इस तरह के सामाजिक संगठनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संजीवनी महिला संस्था जैसी संस्थाएं न केवल त्योहारों के समय महिलाओं को मानसिक संबल प्रदान करती हैं, बल्कि उन्हें हुनरमंद बनाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं। भले ही मुस्कान और रविता के व्रत रखने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई हो, लेकिन जेल के अंदर इस तरह की गतिविधियां यह दिखाती हैं कि कठिन परिस्थितियों और जेल की चारदीवारी के बीच भी मानवीय भावनाएं और त्योहारों का उल्लास किसी न किसी रूप में अपनी जगह बना ही लेता है।

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  • Rahul Kaushik

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