दूध के दामों में भारी बढ़ोतरी की आहट: सरकार को मिला 3 दिनों का अल्टीमेटम, प्रति लीटर ₹8 तक बढ़ सकती है कीमत

देश में आम जनता की जेब पर एक बार फिर महंगाई का बड़ा बोझ पड़ने जा रहा है। आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सबसे जरूरी चीज यानी ‘दूध’ की कीमतों में सीधी और भारी बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। प्राप्त रिपोर्ट्स और डेयरी संघों की ताजा गतिविधियों के अनुसार, दूध के दामों में प्रति लीटर 8 रुपये तक का बड़ा इजाफा हो सकता है। पशुपालकों और डेयरी किसान संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर सरकार के समक्ष 3 दिनों का अल्टीमेटम रख दिया है। यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर सरकार और संबंधित प्रशासन ने उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो पूरे राज्य/देश में दूध की आपूर्ति प्रभावित होने के साथ-साथ नई दरें लागू कर दी जाएंगी।

क्यों बन रही है दूध महंगा करने की नौबत?

दूध के दाम अचानक 8 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ाने के पीछे कई बड़े और जायज कारण सामने आ रहे हैं। डेयरी किसानों और दूध उत्पादक समितियों का कहना है कि पिछले कुछ समय में पशुपालन की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।

  • चारा और खली की कीमतों में उछाल: पशुओं के हरे और सूखे चारे, भूसे, और खल (दाना) के दामों में पिछले कुछ महीनों के दौरान 20 से 30 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई है। मौसम की मार और फसलों के नुकसान के कारण चारा लगातार महंगा हो रहा है, जिससे पशुपालकों के लिए मवेशियों का रखरखाव काफी खर्चीला हो गया है।
  • परिवहन और ईंधन लागत: पेट्रोल और डीजल की दरों में हुई बढ़ोतरी का सीधा असर दूध के परिवहन पर पड़ा है। ग्रामीण इलाकों के संकलन केंद्रों (Collection Centers) से दूध को प्रोसेसिंग प्लांट और फिर वहां से रिटेल मार्केट तक पहुंचाने में आने वाला ट्रांसपोर्टेशन खर्च काफी बढ़ चुका है।
  • पशु चिकित्सा और दवाइयां: मवेशियों के इलाज, टीकाकरण और देख-रेख से जुड़ी दवाइयों के दाम भी बढ़े हैं। लंपी वायरस जैसी बीमारियों के प्रकोप के बाद से किसानों को पशुओं के स्वास्थ्य पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

डेयरी संघों का स्पष्ट तर्क है कि वर्तमान बिक्री मूल्य पर दूध बेचना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। अगर दूध के दाम नहीं बढ़ाए गए, तो छोटे और मध्यम पशुपालक इस व्यवसाय से पीछे हटने को मजबूर हो जाएंगे, जिससे भविष्य में दूध का गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

सरकार को 3 दिनों की चेतावनी: क्या हैं मांगें?

दूध उत्पादक संगठनों ने एकजुट होकर प्रशासन और संबंधित मंत्रालयों को स्पष्ट चेतावनी जारी की है। उन्होंने अपनी मांगों को पूरा करने के लिए केवल 3 दिनों का समय दिया है।

  1. खरीद मूल्य (Procurement Price) में वृद्धि: किसानों की प्राथमिक मांग है कि डेयरी कंपनियों और सरकारी कोऑपरेटिव्स द्वारा किसानों से खरीदे जाने वाले दूध के बेस प्राइस (FAT और SNF के आधार पर) में तुरंत बढ़ोतरी की जाए, ताकि लागत का उचित मुनाफा किसानों को मिल सके।
  2. चारे पर सब्सिडी: सरकार से मांग की जा रही है कि पशुपालकों को राहत देने के लिए सूखे चारे और कमर्शियल कैटल फीड पर विशेष सब्सिडी दी जाए।
  3. बिजली और पानी की दरों में राहत: डेयरी फार्मिंग को कृषि के समकक्ष रखकर व्यावसायिक बिजली दरों के बजाय रियायती दरों पर बिजली और पानी उपलब्ध कराया जाए।

किसान नेताओं का कहना है कि वे बीते कई महीनों से शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन देकर अपनी समस्याएं सरकार के सामने रख रहे थे, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसी उपेक्षा के विरोध में अब 3 दिनों का अल्टीमेटम जारी करना पड़ा है। यदि 3 दिनों के भीतर वार्ता के जरिए समाधान नहीं निकला, तो दूध की सप्लाई रोकने और नई बढ़ी हुई दरों को लागू करने का फैसला लिया जाएगा।

आम जनता के बजट पर पड़ेगा सीधा असर

यदि 8 रुपये प्रति लीटर की यह बढ़ोतरी लागू होती है, तो इसका सीधा प्रभाव आम उपभोक्ता की रसोई और मासिक बजट पर पड़ेगा। दूध न केवल पीने के काम आता है, बल्कि इससे बनने वाले अन्य डेयरी उत्पादों पर भी इसका व्यापक असर दिखेगा:

  • दैनिक बजट बिगड़ेगा: 4 से 5 सदस्यों वाले एक सामान्य परिवार में औसतन 1.5 से 2 लीटर दूध की खपत रोज होती है। यदि प्रति लीटर 8 रुपये की वृद्धि होती है, तो एक परिवार का महीने का बजट लगभग ₹360 से ₹480 तक बढ़ जाएगा।
  • अन्य डेयरी उत्पाद होंगे महंगे: दूध के दाम बढ़ते ही दही, पनीर, छाछ, मक्खन, घी, और खोया की कीमतों में भी खुद-ब-खुद 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी तय है।
  • मिठाई और चाय-कॉफी की दुकानें: स्थानीय हलवाइयों, रेस्टोरेंट और चाय-कॉफी के स्टॉलों पर भी इसका असर देखने को मिलेगा। कप चाय और मिठाई के दामों में बढ़ोतरी की पूरी संभावना बन जाएगी।

डेयरी उद्योग और जानकारों की राय

आर्थिक विशेषज्ञों और उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि दूध की कीमतों में बढ़ोतरी का यह चक्र पूरी तरह से सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट (उत्पादन लागत) से जुड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, पशुपालकों को बचाना भी उतना ही जरूरी है जितना कि उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत देना। यदि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिलेगा, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।

हालांकि, जानकारों का यह भी सुझाव है कि सरकार को बीच का रास्ता निकालते हुए मध्यस्थता करनी चाहिए। सरकार चाहे तो कोऑपरेटिव सोसायटियों को कुछ राहत पैकेज या सब्सिडी देकर इस 8 रुपये के झटके को कम कर सकती है, जिससे किसानों को भी सही दाम मिल सके और आम जनता पर भी 8 रुपये का एकमुश्त भारी बोझ न पड़े।

आगे क्या होगा?

अगले 72 घंटे (3 दिन) इस पूरे मामले में बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं। सबकी निगाहें अब राज्य और केंद्र सरकार के संबंधित विभागों पर टिकी हैं कि क्या वे अल्टीमेटम की समय-सीमा समाप्त होने से पहले किसान प्रतिनिधियों को वार्ता की मेज पर बुलाते हैं या नहीं।

यदि सरकार की ओर से कोई मध्यस्थता नहीं होती है, तो अगले 3 दिनों के बाद देश के कई प्रमुख शहरों में पैकेट वाले दूध के साथ-साथ खुले दूध के दाम भी ₹8 तक महंगे हो जाएंगे। आम उपभोक्ता के लिए सलाह यही है कि वे आने वाले दिनों में अपने घरेलू बजट को थोड़ा और री-एडजस्ट करने के लिए तैयार रहें।

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  • Rahul Kaushik

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