भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी युवा चेहरों में जब भी बात होती है, तो चिराग पासवान का नाम सबसे ऊपर आता है। एक दौर था जब वे मायानगरी मुंबई की झिलमिलाती दुनिया में अपनी पहचान बनाने निकले थे, लेकिन किस्मत उन्हें बिहार के उस राजनीतिक अखाड़े में ले आई जहां का हर कदम शह और मात का खेल होता है। सिनेमा के रुपहले पर्दे पर फ्लॉप साबित होने वाले चिराग आज देश की संसद और बिहार की राजनीति के सबसे बड़े ‘सस्पेंस मास्टर’ बन चुके हैं। दिल्ली के सत्ता के गलियारों से लेकर पटना की सड़क तक, हर कोई यही सोचता रह जाता है कि चिराग का अगला कदम क्या होगा।
चिराग पासवान के इस सफर की शुरुआत मुंबई की फिल्मी दुनिया से हुई थी। साल 2011 में उन्होंने फिल्म ‘मिले ना मिले हम’ से बॉलीवुड में अपना डेब्यू किया था। फिल्म में उनके साथ कंगना रनौत जैसी अभिनेत्री भी थीं। हालांकि, बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म पूरी तरह से औंधे मुंह गिरी और चिराग के अभिनय करियर का सूरज उगने से पहले ही ढल गया। लेकिन चिराग ने हार मानने की जगह अपनी राह बदलने का फैसला किया। उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि उनकी असली कर्मभूमि रुपहला पर्दा नहीं, बल्कि अपने पिता रामविलास पासवान की बनाई राजनीतिक जमीन है।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव के समय चिराग ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। यह वह दौर था जब लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अस्तित्व पर सवाल खड़े हो रहे थे। उस वक्त चिराग ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया। उन्होंने अपने पिता रामविलास पासवान को कांग्रेस-राजद गठबंधन से अलग कर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के साथ हाथ मिलाने के लिए राजी किया। कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने इसे चिराग का अपरिपक्व फैसला माना था, लेकिन 2014 के चुनाव नतीजों ने सभी को चौंका दिया। एनडीए गठबंधन में लोजपा ने शानदार प्रदर्शन किया और चिराग खुद जमुई से पहली बार सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे।
चिराग के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ और संकट साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आया। उस वक्त चिराग के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं—एक तरफ उनके पिता रामविलास पासवान का गंभीर बीमारी से जूझना और दूसरी तरफ बिहार की स्थानीय राजनीति में खुद को साबित करना। चिराग ने इस चुनाव में एक ऐसा दांव खेला जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। उन्होंने ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का नारा दिया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। हालांकि, उन्होंने केंद्र में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी वफादारी बनाए रखी और खुद को “मोदी का हनुमान” कहा।
2020 का चुनाव चिराग के लिए बेहद संघर्षपूर्ण रहा। इस चुनाव के दौरान ही उनके पिता रामविलास पासवान का निधन हो गया। पिता के साये के बिना चिराग बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को भले ही केवल एक सीट मिली, लेकिन उन्होंने जदयू को दर्जनों सीटों पर ऐसा नुकसान पहुंचाया कि नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर पर खिसक गई। राजनीति के दिग्गजों को यह समझ आ गया कि चिराग को हलके में लेना भारी भूल हो सकती है। वे भले ही खुद बड़ी संख्या में सीटें न जीत पाए हों, लेकिन वे दूसरों का खेल बिगाड़ने वाले सबसे बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे।
संकटों का दौर यहीं खत्म नहीं हुआ। चुनाव के कुछ ही महीनों बाद जून 2021 में चिराग को अपनी ही पार्टी के भीतर सबसे बड़े बगावत का सामना करना पड़ा। उनके अपने सगे चाचा पशुपति कुमार पारस ने लोजपा के बाकी सांसदों के साथ मिलकर बगावत कर दी और पार्टी पर अपना दावा ठोक दिया। चिराग के पास से पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और यहां तक कि उनका पिता का बंगला भी छीन लिया गया। एक पल के लिए ऐसा लगा कि चिराग पासवान का राजनीतिक करियर पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

लेकिन चिराग ने घुटने टेकने के बजाय सड़कों पर उतरने का रास्ता चुना। उन्होंने बिहार के कोने-कोने में ‘आशीर्वाद यात्रा’ निकाली। वे जनता के बीच गए, अपनी आपबीती सुनाई और अपने पिता की विरासत का समर्थन मांगा। बिहार की जनता ने उनके प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई। युवाओं के बीच चिराग की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। अपनी आक्रामक शैली, स्पष्ट भाषण कला और सधे हुए बयानों से वे फिर से बिहार के राजनीतिक पटल पर मजबूती से खड़े हो गए।
राजनीति में समय का चक्र हमेशा घूमता है और 2024 के लोकसभा चुनाव में चिराग का सस्पेंस और धैर्य काम आया। सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान चिराग ने दिल्ली और पटना के राजनीतिक पंडितों को लंबे समय तक उलझाए रखा। भाजपा को यह अच्छी तरह समझ आ गया था कि बिहार में पासवान वोट बैंक पर असली पकड़ चाचा पशुपति पारस की नहीं, बल्कि रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की ही है। नतीजतन, एनडीए ने पशुपति पारस को दरकिनार करते हुए चिराग पासवान की पार्टी (लोजपा-रामविलास) को 5 लोकसभा सीटें दीं।
चिराग ने इस मौके को भुनाते हुए शत-प्रतिशत स्ट्राइक रेट हासिल किया और अपनी पांचों की पांचों सीटों पर जीत दर्ज की। उन्होंने न सिर्फ अपनी पुरानी सीट जमुई बचाई, बल्कि अपने पिता की पारंपरिक सीट हाजीपुर से भी भारी मतों से जीत हासिल की। चुनाव नतीजों के बाद वे केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और अपने पिता की विरासत को फिर से उसी ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
आज के समय में चिराग पासवान बिहार की भावी राजनीति का एक ऐसा केंद्र बन चुके हैं, जिसकी अनदेखी न तो एनडीए कर सकती है और न ही विपक्षी महागठबंधन। वे सरकार का हिस्सा रहते हुए भी कई मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राय रखने से नहीं हिचकिचाते, जिससे दोनों ही खेमों में हमेशा यह सस्पेंस बना रहता है कि उनका अगला रुख क्या होगा। बॉलीवुड की फ्लॉप शुरुआत से लेकर भारतीय राजनीति के सबसे अनप्रेडिक्टेबल खिलाड़ी बनने तक का चिराग पासवान का यह सफर यह साबित करता है कि राजनीति में हार और जीत से ज्यादा आपका धैर्य और सही समय पर सही दांव खेलने की क्षमता मायने रखती है।
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