सिनेमा जगत में स्टॉकिंग (पीछा करना), एकतरफा प्यार और सनक पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन जब कोई कहानी सामाजिक बंधनों, मानसिक प्रताड़ना और कानूनी दांव-पेचों के उलझे हुए जाल को एक साथ पर्दे पर लाती है, तो वह महज मनोरंजन न रहकर समाज का एक कड़वा सच बन जाती है। निर्देशक नवजोत गुलाटी और विहान सामत के निर्देशन में बनी फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ एक ऐसी ही थ्रिलर-ड्रामा फिल्म है, जो दर्शक को शुरू से अंत तक अपनी सीट से बांधे रखती है। मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी और विजय राज जैसे बेहतरीन कलाकारों से सजी यह फिल्म एक ऐसी लड़की की दास्तान है, जिसका जीवन एक जुनूनी आशिक की सनक के कारण पूरी तरह तहस-नहस हो जाता है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी की मुख्य धुरी पूजा (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है। पूजा एक साधारण, समझदार और अपने सपनों को पूरा करने की चाह रखने वाली आधुनिक लड़की है। उसकी जिंदगी में सब कुछ सामान्य चल रहा होता है, जब तक कि उसकी जिंदगी में एक अनजान सिरफिरे आशिक की एंट्री नहीं होती। यह अनजाना शख्स न सिर्फ उसका पीछा करता है, बल्कि उसके हर कदम, उसकी बातचीत और उसकी दिनचर्या पर पैनी नजर रखता है। शुरुआत में फोन कॉल्स और धमकियों से शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे एक मानसिक खौफ में बदल जाता है।
पूजा की जिंदगी तब और नरक बन जाती है जब वह सिरफिरा आशिक उसे हासिल करने के लिए तमाम हदें पार कर देता है। मामला सिर्फ निजी प्रताड़ना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कानूनी और सामाजिक रूप ले लेता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब मामला अदालत (कोर्टरूम) के कटघरे में पहुंचता है। कोर्टरूम में वकील बने विजय राज और पीड़िता का पक्ष रखने वाली वकील/सहयोगी के रूप में हुमा कुरैशी के प्रवेश के बाद फिल्म का रोमांच दोगुना हो जाता है। क्या पूजा को इस सिरफिरे आशिक के जाल और सामाजिक बदनामी से आजादी मिल पाती है? क्या न्याय प्रणाली उस अदृश्य दरिंदे को बेनकाब कर पाती है? यह जानने के लिए आपको यह फिल्म देखनी होगी।
अभिनय: कलाकारों की जानदार परफॉर्मेंस
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट का दमदार अभिनय है।
- मृणाल ठाकुर: मृणाल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे संजीदा और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को निभाने में माहिर हैं। पूजा के किरदार में उन्होंने भय, बेबसी, गुस्सा और आखिरकार एक पीड़ित से लड़ने वाली मजबूत महिला बनने के सफर को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से दर्शाया है। उनके चेहरे के भाव और आंखों से झलकती लाचारी दर्शक के दिल को छू लेती है।
- हुमा कुरैशी: हुमा कुरैशी का किरदार फिल्म को एक नया दृष्टिकोण देता है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस बेहद मजबूत है। कोर्टरूम ड्रामा और पूजा का संबल बनने में हुमा का काम बेहद सराहनीय है। उनका अभिनय परिपक्व और प्रभावशाली है।
- विजय राज: जब भी विजय राज स्क्रीन पर आते हैं, तो अपने संवाद अदायगी और संजीदगी से पूरा दृश्य अपने नाम कर लेते हैं। कोर्टरूम के दृश्यों में एक गंभीर और तीखे तेवर वाले वकील के रूप में उनका अभिनय फिल्म का मुख्य आकर्षण है।
निर्देशन और स्क्रीनप्ले
फिल्म का पटकथा (स्क्रीनप्ले) शुरुआत से ही एक रहस्य और तनाव का माहौल बनाने में सफल रहता है। निर्देशक नवजोत गुलाटी ने थ्रिलर और इमोशनल ड्रामा का एक सही संतुलन बनाने की कोशिश की है। फिल्म में जिस तरह से एक स्टॉकर की मानसिकता और उससे पीड़िता पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव को दर्शाया गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है।
हालांकि, फिल्म का पहला हाफ जहां पूरी तरह से खौफ और सस्पेंस बनाने में बीतता है, वहीं दूसरे हाफ में जब कहानी कोर्टरूम में पहुंचती है, तो रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस होती है। कुछ कानूनी बहसें और ड्रामेटिक सीन्स थोड़े लंबे खिंचे हुए लगते हैं, जिन्हें एडिट टेबल पर और बेहतर किया जा सकता था। इसके बावजूद, क्लाइमेक्स में मिलने वाला मोड़ दर्शक को निराश नहीं करता।
तकनीकी पक्ष और संगीत
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (छायांकन) कहानी के मिजाज के बिल्कुल अनुकूल है। डार्क और सस्पेंस से भरे दृश्यों में लाइट का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि दर्शक खुद को उस डर का हिस्सा महसूस करने लगता है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की गति और तनाव को बढ़ाने में काफी मदद करता है। जब भी स्टॉकर की मौजूदगी का एहसास कराया जाता है, तो बैकग्राउंड म्यूजिक रोंगटे खड़े कर देता है।
अंतिम फैसला: देखें या न देखें?
‘पूजा मेरी जान’ महज एक थ्रिलर फिल्म नहीं है, बल्कि यह उस कड़वी हकीकत का आईना है जिससे न जाने कितनी लड़कियां हर दिन गुजरती हैं। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ एक गंभीर संदेश भी देती है कि किसी भी प्रकार के मानसिक उत्पीड़न या सनक को प्यार का नाम नहीं दिया जा सकता।
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