दृश्यम 3 रिव्यू: 2 अक्टूबर का राज पुराना, अब 23 जुलाई का खेल

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सस्पेंस, थ्रिलर और पारिवारिक ड्रामा के मेल की बात होगी, तब ‘दृश्यम’ फ्रैंचाइजी का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। साल 2015 में जब विजय सलगांवकर (अजय देवगन) ने अपनी चालाकी और चौथी पास दिमाग से अपने परिवार को एक संगीन जुर्म के चंगुल से बचाया था, तब 2 अक्टूबर और 3 अक्टूबर की तारीखें हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय दर्शकों के जेहन में दर्ज हो गई थीं। इसके बाद ‘दृश्यम 2’ में पुलिस की नई चालों और विजय के मास्टरस्ट्रोक ने यह साबित कर दिया था कि कहानी में अब भी बहुत कुछ बाकी है। अब, निर्देशक और लेखकों की जोड़ी ने इस सस्पेंस ड्रैगन को एक नए मुकाम पर पहुंचाते हुए ‘दृश्यम 3’ के साथ बड़े पर्दे पर दस्तक दी है। अगर आप सोच रहे थे कि 2 अक्टूबर के सत्संग और पाव भाजी की कहानी खत्म हो चुकी है, तो आप पूरी तरह गलत हैं। ‘दृश्यम 3’ में कहानी 2 अक्टूबर के पुराने पन्नों से आगे निकलकर एक नई तारीख—23 जुलाई के इर्द-गिर्द घूमती है। इस बार खेल सिर्फ सबूत मिटाने या लाश छिपाने का नहीं है, बल्कि कानूनी दांव-पेच, मनोविज्ञान, पुराने गवाहों के पुनरागमन और अतीत की उस राख को उकेरने का है, जिसे विजय सलगांवकर ने बड़ी सावधानी से दबा दिया था। यह फिल्म न केवल दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है, बल्कि थ्रिलर शैली को एक नया आयाम भी देती है।

कहानी का ताना-बाना और 23 जुलाई का असली रहस्य

फिल्म की शुरुआत वहीं से होती है जहां विजय सलगांवकर का परिवार अपनी सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश कर रहा है। लेकिन खाकी वर्दी की टीस इतनी आसानी से खत्म नहीं होती। पुलिस बल, जो दो बार एक साधारण सिनेमाप्रेमी के हाथों हार झेल चुका है, इस बार किसी भी कीमत पर हार मानने के मूड में नहीं है। पुलिस महकमे के नए आला अधिकारी और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की एक विशेष टीम इस केस की फाइल को दोबारा खोलती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब अतीत की एक ऐसी घटना सामने आती है, जो 23 जुलाई की रात से जुड़ी हुई है। यह वही तारीख है, जिस दिन खाकी के एक बहुत बड़े राज पर पर्दा पड़ा था।

विजय सलगांवकर, जो हमेशा दो कदम आगे की सोचता है, इस बार खुद को एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरा पाता है जहां उसके अपने ही फैसले उसके खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं। क्या विजय इस बार भी अपने परिवार (नंदिनी और बेटियों) को बचा पाएगा? या फिर 23 जुलाई का यह नया खेल उसकी बनाई हर रणनीति को ताश के पत्तों की तरह ढहा देगा? फिल्म का स्क्रीनप्ले इतनी खूबसूरती से लिखा गया है कि हर 15 मिनट में दर्शकों को एक नया झटका (ट्विस्ट) लगता है। लेखक ने 2 अक्टूबर की पुरानी यादों को बड़े ही तार्किक ढंग से 23 जुलाई के नए सस्पेंस से जोड़ा है, जो दर्शकों को अंत तक सीट से बांधे रखता है।

अभिनय का जादू: अजय देवगन और पूरी स्टारकास्ट का प्रदर्शन

अजय देवगन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ‘विजय सलगांवकर’ का किरदार उनके अलावा कोई और इतनी शिद्दत से नहीं निभा सकता। उनकी आंखों की खामोशी, चेहरे पर परिवार की चिंता और दिमाग में लगातार चलती शतरंज की चालें—हर भाव को उन्होंने बिना किसी लाउड एक्टिंग के बेहद गहराई से पर्दे पर उतारा है। जब विजय सलगांवकर पर्दे पर सोच में पड़ता है, तो थियेटर में बैठा हर दर्शक भी उसके साथ सोचने पर मजबूर हो जाता है।

तब्बू (मीरा देशमुख) का किरदार भले ही इस बार एक नए रूप में सामने आता है, लेकिन उनकी मौजूदगी ही स्क्रीन पर एक जबरदस्त तनाव पैदा कर देती है। एक दुखी मां और एक सख्त पुलिस अफसर के बीच का संतुलन उन्होंने बेहतरीन तरीके से साधा है। अक्षय खन्ना (आईजी तरूण अहलावत) ने अपने तीखे और तार्किक अंदाज से फिल्म में जान फूंक दी है। उनकी अजय देवगन के साथ आमने-सामने की टक्कर और दिमागी जंग (Mind Games) फिल्म के सबसे मजबूत पहलुओं में से एक हैं। इसके अलावा, श्रीया सरन ने नंदिनी के रूप में एक सहमी हुई लेकिन परिवार के लिए ढाल बनने वाली मां का किरदार बखूबी निभाया है। सह-कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है, जिससे कहानी का हर किरदार अहम महसूस होता है।

दृश्यम 3 रिव्यू

निर्देशन, संगीत और तकनीकी पक्ष

फिल्म का निर्देशन बेहद सधा हुआ है। एक हिट फ्रैंचाइजी की तीसरी किश्त बनाना किसी भी निर्देशक के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि दर्शकों की उम्मीदें सातवें आसमान पर होती हैं। लेकिन निर्देशक ने कहानी के सस्पेंस को बनाए रखने के लिए तकनीक और बेहतरीन एडिटिंग का इस्तेमाल किया है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) कहानी के मिजाज के साथ पूरी तरह मेल खाता है। सस्पेंस वाले दृश्यों में बैकग्राउंड म्यूजिक दर्शकों के दिल की धड़कन बढ़ा देता है, वहीं भावुक पलों में यह बहुत शांत और प्रभावी हो जाता है।

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (कैमरा वर्क) बहुत शानदार है। गोवा के खूबसूरत दृश्यों से लेकर पुलिस स्टेशन की घुटन भरी दीवारों तक, कैमरे ने हर माहौल को बहुत जीवंतता के साथ पकड़ा है। फिल्म की पेसिंग (रफ्तार) पहले हाफ में थोड़ी धीमी लगती है क्योंकि वहां नए किरदारों और 23 जुलाई के बैकग्राउंड को स्थापित किया जाता है, लेकिन सेकंड हाफ में फिल्म जिस तेजी से आगे बढ़ती है, दर्शक अपनी पलकें झपकाना भूल जाते हैं।

विजय की यह बाजी कितनी भारी पड़ी? (समीक्षा का निष्कर्ष)

‘दृश्यम 3’ केवल एक सस्पेंस थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह इंसान के अपने परिवार के प्रति समर्पण और न्याय व्यवस्था की सीमाओं की एक गहन पड़ताल है। इस बार विजय सलगांवकर की बाजी बेहद जोखिम भरी है। इस बार लड़ाई सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि समय और तकनीक से भी है। 23 जुलाई के राज ने विजय के हर दांव को उलझाकर रख दिया था, लेकिन जिस तरह से वह इस विषम परिस्थिति से निकलने का रास्ता तलाशता है, वह सिनेमाई रूप से देखने लायक है।

क्या यह फिल्म ‘दृश्यम’ और ‘दृश्यम 2’ के स्तर को छू पाती है? इसका जवाब है—हाँ, बिल्कुल! यह फिल्म अपने पुराने दोनों भागों की साख को न सिर्फ बरकरार रखती है, बल्कि सस्पेंस के मामले में उन्हें कड़ी टक्कर भी देती है।

फिल्म देखें या न देखें?

यदि आप थ्रिलर, सस्पेंस और सस्पेंस-ड्रामा फिल्मों के शौकीन हैं, तो ‘दृश्यम 3’ आपके लिए एक मस्ट-वॉच (जरूर देखने योग्य) फिल्म है। अजय देवगन का धमाकेदार अभिनय, कसी हुई पटकथा और वो 23 जुलाई का मास्टर-ट्विस्ट आपको लंबे समय तक याद रहेगा।

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