‘साहब, मैं जिंदा हूं…’ सरकारी फाइलों में दर्ज हुई मौत, पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर बुजुर्ग महिला

उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की मऊरानीपुर तहसील से प्रशासनिक लापरवाही और लचर सरकारी व्यवस्था का एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है। तहसील क्षेत्र के ग्राम धौर्रा की रहने वाली वृद्ध महिला राजाबाई को जीवित होने के बावजूद सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, उनकी जीवन-यापन का इकलौता जरिया बनी वृद्धावस्था पेंशन को अचानक रोक दिया गया।

जब 7 अक्टूबर को राजाबाई अधिकारियों के सामने पहुंचीं और थरथराती आवाज में बोलीं, “साहब, मैं जिंदा हूं…”, तो वहां मौजूद हर शख्स हैरान रह गया। कागजों पर दम तोड़ चुकी महिला अपनी जीवित उपस्थिति दर्ज कराने और अपना हक मांगने के लिए तहसील कार्यालय पहुंची थी।

सहारा छिना तो खुली लापरवाही की पोल

राजाबाई की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। बढ़ती उम्र और शारीरिक असमर्थता के कारण वे दैनिक मजदूरी या कोई अन्य शारीरिक श्रम करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। उनके जीवन का एकमात्र वित्तीय सहारा राज्य सरकार द्वारा मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन थी।

राजाबाई के अनुसार, उन्हें नियमित रूप से पेंशन की तीन किस्तें प्राप्त हुई थीं, जिससे उनके रोजमर्रा के खान-पान और आवश्यक खर्च चल रहे थे। लेकिन कुछ समय पहले अचानक उनके खाते में राशि आना बंद हो गया। शुरुआत में उन्हें लगा कि किसी तकनीकी खराबी या बैंक सर्वर की समस्या के कारण राशि नहीं आ पा रही है। जब पेंशन काफी समय तक नहीं आई, तो उन्होंने मामले की जानकारी जुटाना शुरू किया।

अधिकारियों और संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ करने पर जो सच सामने आया, उसने राजाबाई के पैर तले जमीन खिसका दी। विभाग के डिजिटल रिकॉर्ड में उन्हें ‘मृत’ दर्ज कर दिया गया था।

बिना जमीनी सत्यापन के फाइल पर मोहर

वृद्ध महिला का सबसे गंभीर आरोप यह है कि उन्हें मृत घोषित करने की पूरी प्रक्रिया बंद कमरों और दफ्तरों के मेजों पर ही पूरी कर ली गई। नियम के अनुसार, किसी लाभार्थी का नाम सूची से हटाने या उसकी स्थिति में बदलाव करने से पहले स्थानीय कर्मचारियों द्वारा धरातलीय सत्यापन (ग्राउंड वेरिफिकेशन) किया जाना अनिवार्य है।

यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी गांव आकर निष्पक्ष रूप से जांच करता, तो सच्चाई तुरंत उजागर हो जाती। लेकिन बिना किसी मौके पर गए, केवल कागजी औपचारिकताओं के आधार पर जीवित व्यक्ति को मृत दर्ज कर दिया गया। इस लापरवाही ने एक असहाय वृद्ध महिला को दाने-दाने का मोहताज बना दिया।

एसडीएम कार्यालय में न्याय की गुहार

जब राजाबाई के सभी स्थानीय प्रयास विफल रहे, तो उन्होंने सीधे प्रशासनिक अधिकारियों के पास जाने का फैसला किया। 7 अक्टूबर को वे तहसील कार्यालय पहुंचीं और एसडीएम के समक्ष अपनी व्यथा रखी।

सामने खड़ी एक जीवित महिला का यह कहना कि ‘कागजों में मेरी मौत हो चुकी है’, पूरे सिस्टम के काम करने के तरीके पर तीखे सवाल खड़े करता है। राजाबाई ने मांग की है कि सरकारी आंकड़ों में सुधार कर उन्हें पुनः ‘जीवित’ दर्ज किया जाए और उनकी रोकी गई पेंशन राशि को जल्द से जल्द बहाल किया जाए।

प्रशासन का रुख और समाज कल्याण विभाग को निर्देश

मामला अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद मऊरानीपुर के उपजिलाधिकारी (एसडीएम) मनोज कुमार भारती ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उन्होंने पुष्टि की कि ग्राम धौर्रा निवासी राजाबाई ने पेंशन बंद होने और रिकॉर्ड में मृत दर्ज होने के संबंध में लिखित शिकायत दी है।

प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लेते हुए समाज कल्याण विभाग को तुरंत पत्र भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जा रही है। जांच रिपोर्ट में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर कागजों को दुरुस्त करने के साथ-साथ दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।

डिजिटल डेटा और धरातल की हकीकत पर सवाल

यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश या देश के किसी अन्य राज्य से कागजों में मृत घोषित होने का मामला सामने आया हो। डिजिटलाइजेशन का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और योजनाओं का लाभ सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाना था, लेकिन धरातलीय सत्यापन की कमी के कारण यह प्रक्रिया अक्सर कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है।

जब तक जमीनी स्तर पर डेटा एंट्री करने वाले और रिपोर्ट लगाने वाले कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक राजाबाई जैसी कई बेबस बुजुर्ग महिलाओं को अपने जीवित होने का प्रमाण देने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे। अब देखना यह होगा कि समाज कल्याण विभाग कितनी जल्दी इस चूक को ठीक करता है और पीड़ित महिला की पेंशन कब तक बहाल होती है।

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