मेरठ (उत्तर प्रदेश)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में चर्चित ‘थप्पड़ कांड’ का मामला अब एक नया और गंभीर रूप ले चुका है। पुलिसिया कार्रवाई, प्रशासनिक रवैये और अधिकारों के हनन को लेकर उठी आवाज़ें अब अदालत के दरवाजे तक पहुंच गई हैं। बीए की छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा और कलेक्ट्रेट पर हुए लाठीचार्ज के बाद पीड़ित पक्ष ने न्याय की गुहार लगाई है।
मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडे और करीब 50 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए विशेष एससी-एसटी (SC/ST) कोर्ट में याचिका दायर की गई है। इस याचिका के कोर्ट में दाखिल होते ही राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है।
क्या है पूरा मामला? जानिए मुख्य वजह
इस पूरे विवाद की जड़ 15 मई को मेरठ की रहने वाली बीए की छात्रा ललिता गौतम का संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होना और उसके बाद 17 मई को उसकी लाश बरामद होना है। परिजनों और स्थानीय लोगों का आरोप था कि पुलिस ने शुरुआत में हत्या की धाराएं न लगाकर मामले में लापरवाही बरती। हालाँकि, बाद में मुख्य आरोपी अंकुश की गिरफ्तारी हुई और केस को हत्या में तब्दील किया गया, लेकिन परिजनों का दावा था कि इस अपराध में कई अन्य लोग भी शामिल थे, जिन्हें बचाने की कोशिश की जा रही थी।
निष्पक्ष जांच और सह-आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर 8 जुलाई को कलेक्ट्रेट चौराहे पर दलित संगठनों, परिजनों और समर्थकों द्वारा बड़ा प्रदर्शन शुरू किया गया। प्रदर्शनकारियों ने सड़क जाम कर दी, जिससे प्रशासनिक तंत्र हरकत में आया।
प्रदर्शन से लाठीचार्ज और ‘थप्पड़ कांड’ तक
प्रदर्शनकारी जैसे ही मुख्य मार्गों को बाधित कर न्याय की मांग करने लगे, मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज किया। इसी बीच, हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को जब बंदी वाहन (पुलिस वैन) में बिठाया गया, तो एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया।
वायरल हुए वीडियो में पुलिस वैन के अंदर एक युवक (रवि गौतम) को थप्पड़ और लात-घूंसों से मारते हुए देखा गया। आरोप लगाया गया कि मारपीट करने वाले अधिकारी कोई और नहीं, बल्कि खुद मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे थे।
एससी-एसटी कोर्ट में दायर याचिका में क्या हैं आरोप?
प्रदर्शनकारियों और पीड़ितों का कहना है कि पुलिस का यह रवैया न केवल अमानवीय था, बल्कि यह दलित समुदाय के प्रति दमनकारी मानसिकता को दर्शाता है।
इसी के आधार पर अदालत में याचिका दायर कर एसएसपी अविनाश पांडे और उनके साथ मौजूद 50 से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ निम्नलिखित मांगों को रखा गया है:
- अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए।
- अधिकारों का दुरुपयोग: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और कस्टडी में लिए गए लोगों के साथ शारीरिक हिंसा करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो।
- विभागीय और कानूनी कार्रवाई: मामले की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।
एसएसपी अविनाश पांडे की सफाई और पुलिस का पक्ष
विवाद गहराने और आलोचनाएं झेलने के बाद एसएसपी अविनाश पांडे ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपना पक्ष रखा।
- आधा-अधूरा वीडियो: एसएसपी का कहना है कि सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही वीडियो क्लिप अधूरी और भ्रामक है, जिसमें पूरी घटना का सच नहीं दिखाया गया है।
- आत्महत्या का प्रयास रोकने का दावा: पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, बंदी वाहन के भीतर एक युवक (रवि गौतम) ने खुद को नुकसान पहुंचाने या फांसी लगाने की कोशिश की थी। स्थिति पर तुरंत काबू पाने और उसे किसी भी जानलेवा कदम से रोकने के लिए पुलिस को त्वरित बल प्रयोग करना पड़ा।
- सुनियोजित साजिश: पुलिस का आरोप है कि कलेक्ट्रेट में विरोध प्रदर्शन के नाम पर माहौल खराब करने और दंगा फैलाने की सोची-समझी साजिश रची गई थी।
गर्माई राज्य की राजनीति
मेरठ के इस घटनाक्रम के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।
- विपक्ष का हमला: समाजवादी पार्टी और भीम आर्मी जैसे संगठनों ने उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला है। भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद और किसान नेता राकेश टिकैत ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की।
- सड़कों से अदालतों तक लड़ाई: दलित अधिकार कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि कस्टडी में किसी भी नागरिक के साथ मारपीट करना गैर-कानूनी है और इस मामले को अंजाम तक पहुंचाया जाएगा।
एससी-एसटी कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद अब गेंद न्यायपालिका के पाले में है। अदालत इस याचिका पर सुनवाई के बाद यह तय करेगी कि क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ पुलिस केस (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया जाएगा या नहीं
यह मामला अब सिर्फ एक हत्याकांड के विरोध का नहीं, बल्कि पुलिस की जवाबदेही, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शन की स्वतंत्रता पर खड़े हुए गंभीर सवालों की परीक्षा बन चुका है।