मेरठ: High-Tension Line के नीचे BJP नेता का कांवड़ शिविर, RTI एक्टिविस्ट ने उठाए सवाल

जनसमाज संवाददाता,मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में कांवड़ यात्रा के दौरान एक बड़ा प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी मामला सामने आया है। मेरठ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक स्थानीय नेता द्वारा लगाए गए कांवड़ सेवा शिविर की जगह को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि यह शिविर उच्च क्षमता वाली हाईटेंशन (High Tension) बिजली की लाइनों के ठीक नीचे लगाया गया है। इस पूरे मामले को उजागर करते हुए एक स्थानीय आरटीआई (RTI) एक्टिविस्ट ने जिला प्रशासन और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक्टिविस्ट का साफ तौर पर कहना है कि प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है और नियमों को ताक पर रखकर यह अनुमति दी गई है।

क्या है पूरा मामला?

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं (शिवभक्तों) की सुविधा के लिए जगह-जगह सेवा शिविर लगाए जाते हैं। इन शिविरों में कांवड़ियों के विश्राम, भोजन, चिकित्सा और जल की व्यवस्था की जाती है। मेरठ में भी एक मुख्य मार्ग पर भाजपा नेता द्वारा विशाल कांवड़ शिविर का आयोजन किया गया है। लेकिन चिंता की बात यह है कि जिस स्थान पर यह टेंट और वाटरप्रूफ ढांचा खड़ा किया गया है, उसके ठीक ऊपर से हाईटेंशन बिजली के तार गुजर रहे हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता ने इस स्थान का दौरा करने और स्थिति का जायजा लेने के बाद मीडिया और प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। उनका कहना है कि कांवड़ शिविरों में रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु रुकते हैं। शिविर में लोहे के पाइप, साउंड सिस्टम, हैवी लाइटें और जल व्यवस्था के लिए बड़े-बड़े उपकरण लगे हुए हैं। यदि किसी कारणवश हाईटेंशन लाइन में स्पार्किंग होती है या कोई तार टूटकर गिरता है, तो यह स्थिति अत्यंत भयावह रूप ले सकती है।

सुरक्षा नियमों की सरेआम अनदेखी

कांवड़ यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने के लिए उत्तर प्रदेश शासन और मेरठ प्रशासन द्वारा हर साल विस्तृत दिशा-निर्देश (SOP) जारी किए जाते हैं। इन नियमों के अनुसार:

  • हाईटेंशन लाइनों से दूरी: बिजली की हाईटेंशन और एक्स्ट्रा हाईटेंशन लाइनों के ठीक नीचे या उनके असुरक्षित दायरे में कोई भी अस्थायी या स्थायी टेंट, पंडाल या शिविर लगाने की सख्त मनाही होती है।
  • अग्नि सुरक्षा और जल निकासी: शिविरों में अग्नि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए और लोहे के खंभों का इस्तेमाल करते समय अर्थिंग का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • प्रशासनिक एनओसी (NOC): शिविर लगाने से पहले पुलिस, नगर निगम, और विद्युत निगम से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होता है।

इस मामले में आरटीआई एक्टिविस्ट का आरोप है कि राजनीतिक रसूख के कारण सभी नियमों को किनारे कर दिया गया। बिजली विभाग और स्थानीय पुलिस ने बिना जमीनी निरीक्षण किए शिविर की अनुमति दे दी या फिर अवैध रूप से चल रहे इस शिविर पर आंखें मूंद लीं।

आरटीआई एक्टिविस्ट के गंभीर आरोप

मामले को उठाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट ने प्रशासनिक रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा:

“प्रशासन और बिजली विभाग सत्ताधारी दल के नेता के दबाव में काम कर रहे हैं। आम जनता या छोटे आयोजकों के लिए दर्जनों नियम थोप दिए जाते हैं, लेकिन जब बात किसी बड़े राजनीतिक चेहरे की आती है, तो सुरक्षा के सारे पैमाने धरे के धरे रह जाते हैं। हाईटेंशन लाइन के नीचे हजारों लोगों का जमावड़ा किसी भी समय तबाही का कारण बन सकता है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब कांवड़ मार्गों पर लंबे-लंबे डीजे और लोहे के भाले/त्रिशूल लेकर श्रद्धालु चलते हैं, तो अक्सर बिजली के तारों से स्पर्श होने का खतरा बना रहता है। ऐसे में शिविर का ही हाईटेंशन लाइन के नीचे होना भारी लापरवाही को दर्शाता है।

विद्युत विभाग और प्रशासन का रुख

मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर तूल पकड़ने के बाद प्रशासनिक गलियारे में हलचल तेज हो गई है। स्थानीय नागरिकों और कांवड़ियों की सुरक्षा को देखते हुए लोगों में भी भय का माहौल है।

  • बिजली विभाग की प्रतिक्रिया: विद्युत निगम के अधिकारियों से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही है। अधिकारियों का दावा है कि यदि शिविर से कोई खतरा महसूस होता है, तो संबंधित आयोजक को नोटिस जारी किया जाएगा या लाइन की सुरक्षा के वैकल्पिक उपाय किए जाएंगे।
  • स्थानीय पुलिस व प्रशासन: पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि कांवड़ मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था पहली प्राथमिकता है। यदि किसी शिविर से सुरक्षा मानकों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसका निरीक्षण कर आवश्यक बदलाव कराए जाएंगे।

अतीत के हादसों से सबक न लेने का आरोप

उत्तर प्रदेश में पहले भी कांवड़ यात्रा या धार्मिक आयोजनों के दौरान करंट लगने की कई दुखद घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बीते वर्षों में कई जगहों पर कांवड़ के तारों से टकराने या शिविरों में शॉर्ट सर्किट होने से श्रद्धालुओं की जान जा चुकी है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि अतीत की घटनाओं से सबक लेते हुए प्रशासन को अति-संवेदनशील स्थानों पर शिविर लगाने की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए थी। मेरठ कांवड़ यात्रा का एक प्रमुख केंद्र है, जहां से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी यूपी के लाखों कांवड़िए गुजरते हैं। ऐसे में मुख्य मार्ग पर सुरक्षा में जरा सी चूक बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

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  • Rahul Kaushik

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