महाराष्ट्र के ठाणे जिले में स्थित उल्हासनगर शहर में एक बेहद संवेदनशील और चौकाने वाली घटना सामने आई है। शहर की सड़कों पर लगे भीषण ट्रैफिक जाम के कारण समय पर अस्पताल न पहुँच पाने की वजह से एक गर्भवती महिला को ऑटो-रिक्शा में ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतारों और थमे हुए पहियों के बीच उत्पन्न हुई इस आपातकालीन स्थिति में local नागरिकों और आसपास मौजूद महिलाओं की सतर्कता से एक बड़ा हादसा टल गया। गनीमत यह रही कि विपरीत परिस्थितियों और स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता के बावजूद जच्चा (मां) और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ हैं। इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों में प्रशासन और शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर काफी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
अस्पताल जाते समय ट्रैफिक में फंसी ऑटो-रिक्शा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, उल्हासनगर की रहने वाली महिला को सुबह अचानक प्रसव पीड़ा (labor pain) शुरू हुई। परिजनों ने बिना कोई समय गंवाए महिला को नजदीक के सरकारी अस्पताल पहुँचाने के लिए तुरंत एक ऑटो-रिक्शा किराए पर लिया। परिवार को उम्मीद थी कि वे समय रहते अस्पताल पहुँच जाएंगे और महिला को उचित डॉक्टरी देखभाल मिल सकेगी।
हालांकि, जैसे ही ऑटो-रिक्शा शहर के प्रमुख मार्ग पर पहुँची, गाड़ियों का भारी काफिला और थम चुका ट्रैफिक उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। सड़क निर्माण कार्य, अवैध पार्किंग और मुख्य चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल व पुलिस प्रबंधन के अभाव के कारण गाड़ियों की कतारें कई किलोमीटर तक फैली हुई थीं। ऑटो चालक ने काफी कोशिश की कि किसी तरह दूसरे रास्तों या पतली गलियों से निकलकर अस्पताल पहुँचा जाए, लेकिन हर तरफ गाड़ियां एक-दूसरे से सटी खड़ी थीं। मिनट दर मिनट गुजरते समय के साथ महिला की प्रसव पीड़ा बेहद गंभीर और असहनीय होती चली गई।
ऑटो-रिक्शा बना ‘लेबर रूम’, स्थानीय महिलाओं ने बढ़ाई मदद
जब ऑटो-रिक्शा काफी देर तक एक ही जगह फंसा रहा और अस्पताल पहुँचना पूरी तरह असंभव दिखने लगा, तब स्थिति बेहद नाजुक हो गई। महिला की बिगड़ती हालत को देखकर ऑटो-रिक्शा में मौजूद परिजन घबरा गए और मदद के लिए पुकारने लगे। परिजनों की आवाज सुनकर आसपास के राहगीर, स्थानीय दुकानदार और ऑटो चालक तुरंत मदद के लिए आगे आए।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए स्थानीय महिलाओं ने बिना कोई समय गंवाए मोर्चे को संभाला। ऑटो-रिक्शा को चारों तरफ से चादरों, साड़ियों और कपड़ों से ढंककर एक अस्थायी ‘लेबर रूम’ का रूप दिया गया, ताकि महिला को गोपनीयता (privacy) मिल सके। अनुभवी और स्थानीय महिलाओं की सूझबूझ और मदद से कुछ ही समय में महिला का सुरक्षित प्रसव कराया गया। ऑटो-रिक्शा के भीतर ही किलकारी गूंजते ही आसपास मौजूद लोगों और परिजनों ने राहत की सांस ली।
प्रसव के बाद तुरंत अस्पताल में कराया गया भर्ती
प्रसव संपन्न होने के तुरंत बाद, वहां मौजूद नागरिकों ने बिना किसी देरी के ट्रैफिक के बीच ऑटो-रिक्शा के लिए रास्ता बनवाया। इसके बाद जच्चा और नवजात शिशु दोनों को पास के नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों की टीम ने तुरंत दोनों को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया।
अस्पताल के डॉक्टरों ने नवजात शिशु और मां की प्राथमिक जांच की। डॉक्टरों का कहना है कि सड़क पर और बिना चिकित्सीय सुविधाओं के जन्म होने के बावजूद, मां और बच्चा दोनों खतरे से बाहर हैं। दोनों की सेहत पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और आवश्यक दवाएं व टीके प्रदान किए जा रहे हैं। डॉक्टरों ने भी आपात स्थिति में मदद करने वाली स्थानीय महिलाओं की तत्परता और समझदारी की सराहना की।
शहर की खस्ताहाल ट्रैफिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने उल्हासनगर और आसपास के क्षेत्रों में आए दिन लगने वाले भीषण ट्रैफिक जाम की समस्या को एक बार फिर उजागर कर दिया है। शहर के नागरिकों का कहना है कि मुख्य सड़कों पर अतिक्रमण, बेतरतीब ढंग से खड़े वाहन और ट्रैफिक पुलिस की अनुपस्थिति के कारण रोजमर्रा की जिंदगी अस्त-व्यस्त रहती है।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि आपातकालीन वाहनों जैसे एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और मरीजों को ले जा रही गाड़ियों के लिए कोई अलग ‘ग्रीन कॉरिडोर’ या रास्ता निकालने की व्यवस्था नहीं होती। आए दिन एम्बुलेंस ट्रैफिक में फंसी रहती हैं, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ जाती है। उल्हासनगर में ऑटो-रिक्शा में प्रसव की यह घटना कोई पहली घटना नहीं है; इससे पहले भी बुनियादी ढांचे और खराब सड़कों की वजह से आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
नागरिकों ने की सख्त कार्रवाई और सुचारू व्यवस्था की मांग
घटना की खबर शहर में फैलते ही प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठने लगे हैं। नागरिक संगठनों और स्थानीय निवासियों ने उल्हासनगर नगर निगम और स्थानीय पुलिस प्रशासन से मांग की है कि शहर की सड़कों को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए और ट्रैफिक प्रबंधन को दुरुस्त किया जाए।
लोगों का कहना है कि यदि स्थानीय महिलाएं समय पर मदद के लिए आगे न आतीं, तो कोई भी बड़ा हादसा हो सकता था। नागरिकों ने मांग की है कि मुख्य रास्तों पर एम्बुलेंस और आपातकालीन वाहनों की सुगम आवाजाही के लिए विशेष इंतजाम किए जाएं, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह की खौफनाक और असहनीय स्थिति से न गुजरना पड़े।
इस घटना ने जहाँ एक तरफ भारतीय समाज में आपसी सहयोग, मानवता और स्थानीय नागरिकों की एकजुटता की मिसाल पेश की है, वहीं दूसरी तरफ यह हमारे शहरी बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक लचर रवैये पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करती है।
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