केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफे के बाद ओडिशा लौटे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और संबलपुर से सांसद धर्मेंद्र प्रधान का भुवनेश्वर हवाई अड्डे पर जिस भव्य अंदाज में स्वागत किया गया, उसने राज्य के सियासी पारे को अचानक चढ़ा दिया है। मीडिया और राजनीतिक हलकों में इसे केवल एक नेता का गृह राज्य आगमन नहीं, बल्कि ओडिशा की प्रांतीय राजनीति में एक बड़े शक्ति-संतुलन (Power Balance) के बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
नीट-यूजी (NEET-UG) परीक्षा से जुड़े विवादों और राजनीतिक जवाबदेही को स्वीकार करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से अलग होने के बाद, ओडिशा की धरती पर धर्मेंद्र प्रधान के इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ ने सत्ताधारी भाजपा के भीतर और विपक्षी दलों (बीजद व कांग्रेस) दोनों के खेमों में हलचल तेज कर दी है।
1. केंद्रीय भूमिका से राज्य की राजनीति का रुख: आखिर क्यों मचा हड़कंप?
धर्मेंद्र प्रधान पिछले एक दशक से अधिक समय से केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल रहे हैं। 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनावों में जब भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी के नेतृत्व में सरकार बनाई, तब भी पार्टी संगठन की नींव तैयार करने में धर्मेंद्र प्रधान को मुख्य शिल्पी (Architect) माना गया था।
अब, दिल्ली के केंद्रीय शासन से मुक्त होकर राज्य में उनकी सीधी उपस्थिति ने कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है:
- वैकल्पिक शक्ति केंद्र (Alternative Power Centre): राज्य में मांझी सरकार के गठन के बावजूद संगठन और विधायकों के एक बड़े धड़े पर प्रधान की पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है।
- लीडरशिप री-सेट की सुगबुगाहट: यद्यपि राज्य में भाजपा की सरकार सुचारू रूप से चल रही है, लेकिन प्रधान का ओडिशा वापस लौटना भविष्य में राज्य के शीर्ष पद (मुख्यमंत्री) या एक बेहद प्रभावशाली राज्य मार्गदर्शक की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
- विधायकों और मंत्रियों का भारी समर्थन: भुवनेश्वर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए मोहन चरण मांझी सरकार के 5 मंत्री और 21 से अधिक विधायक स्वयं पहुंचे थे। इसके अलावा प्रदेश के 11 सांसदों का खुला समर्थन यह दर्शाता है कि राज्य भाजपा में उनका राजनीतिक कद कितना विशाल है।
2. भाजपा के अंदरूनी समीकरण और ‘पावर डायनामिक्स’
ऑडिट और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान की ओडिशा में पूर्णकालिक सक्रियता से भाजपा के भीतर आंतरिक गुटबाजी और शक्ति-संतुलन के नए समीकरण बन सकते हैं।
| क्षेत्र/घटक | धर्मेंद्र प्रधान का प्रभाव और राजनीतिक स्थिति |
| विधानसभा विधायक (78 सीटें) | अधिकांश नए और पुराने विधायकों के टिकट वितरण में प्रधान की सीधी भूमिका रही है, जिससे उनके प्रति विधायकों की निष्ठा जगजाहिर है। |
| राज्य मंत्रिमंडल (16 मंत्री) | मांझी कैबिनेट के कम से कम 7 से 8 मंत्री सीधे तौर पर धर्मेंद्र प्रधान खेमे के माने जाते हैं। |
| संगठनात्मक ढांचा | छात्र राजनीति (ABVP) से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक काम कर चुके प्रधान की पकड़ ओडिशा के सभी 147 विधानसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं पर है। |
हालांकि, इस भव्य स्वागत और राजनीतिक उभार से पार्टी के भीतर कुछ ऐसे गुटों में असहजता भी देखी जा रही है जो केंद्र में प्रधान की व्यस्तता के दौरान राज्य संगठन में अपनी स्वायत्त जगह बना चुके थे। मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी और प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल जैसे नेताओं ने भले ही सार्वजनिक रूप से प्रधान के त्याग की सराहना की हो, लेकिन राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि प्रधान की निरंतर उपस्थिति राज्य शासन के केंद्र बिंदु को प्रभावित कर सकती है।
3. विपक्ष में छाई बेचैनी: बीजू जनता दल (बीजद) और कांग्रेस का रुख
धर्मेंद्र प्रधान की इस ‘घर वापसी’ से केवल भाजपा के भीतर ही नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल बीजू जनता दल (BJD) और कांग्रेस के भीतर भी खलबली मच गई है।
- आक्रामक घेराबंदी की रणनीति: विपक्षी दलों ने प्रधान के भव्य स्वागत पर नैतिक सवाल उठाए हैं। विपक्ष का तर्क है कि जिस नेता ने प्रतियोगी परीक्षाओं की धांधली के आरोपों के बीच पद छोड़ा हो, उनका ऐसा ‘नायक’ जैसा स्वागत करना राज्य की जनता और युवाओं के साथ भद्दा मजाक है।
- नवीन पटनायक के बाद बीजद की स्थिति: पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की घटती सक्रियता और पूर्व नौकरशाह वी.के. पांडियन के राजनीतिक परिदृश्य से पीछे हटने के बाद बीजद खुद को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में धर्मेंद्र प्रधान जैसा मजबूत और आक्रामक रणनीतिकार अगर पूरी तरह ओडिशा में केंद्रित होता है, तो यह बीजद के बचे-खुचे जनाधार को और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है।
4. ‘इमेज री-सेट’ या भविष्य की बड़ी पटकथा?
इस्तीफे के बाद धर्मेंद्र प्रधान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी सार्वजनिक छवि को पुनः उभारना (Image Reset) है। ओडिशा में उनकी इस वापसी को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने राजनीतिक जवाबदेही (Political Accountability) का परिचय देते हुए नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया, जिससे उनका कद घटा नहीं बल्कि और बढ़ा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, भाजपा आलाकमान धर्मेंद्र प्रधान को ओडिशा में एक दीर्घकालिक रणनीतिक भूमिका में रख सकता है, ताकि 2029 के आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों तक पार्टी के शासन और संगठन को अभेद्य बनाया जा सके।
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