दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में कुत्ता टहलाने के चर्चित मामले में पूर्व आईएएस अधिकारी रिंकू दुग्गा (Rinku Dhugga) को देश की सर्वोच्च अदालत से बहुत बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक (Stay) लगा दी है, जिसमें रिंकू दुग्गा की अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।
केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने स्पष्ट अंतरिम आदेश जारी किया कि आगामी सुनवाई तक अधिकारी की सेवा बहाली पर स्टे लागू रहेगा। अदालत ने रिंकू दुग्गा को नोटिस जारी कर उनका जवाब भी मांगा है।
पूरा विवाद: स्टेडियम खाली कराने से शुरू हुई कहानी
यह मामला मई 2022 का है, जब मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर एक खबर तेजी से वायरल हुई थी।
- आरोप था कि आईएएस अधिकारी रिंकू दुग्गा और उनके आईएएस पति संजीव खिरवार दिल्ली के सरकारी त्यागराज स्टेडियम में शाम के समय अपना कुत्ता टहलाने के लिए खिलाड़ियों और एथलीटों को समय से पहले ही बाहर निकाल देते थे।
- स्टेडियम के एथलीटों और कोचों ने शिकायत की थी कि अधिकारियों के इस व्यक्तिगत रवैये के कारण उनका अभ्यास बाधित हो रहा है।
- मामले के तूल पकड़ते ही गृह मंत्रालय (MHA) ने तत्काल कार्रवाई करते हुए रिंकू दुग्गा का तबादला अरुणाचल प्रदेश और उनके पति संजीव खिरवार का तबादला लद्दाख कर दिया था।
अनिवार्य सेवानिवृत्ति से हाईकोर्ट तक की कानूनी जंग
विवाद के बाद केंद्र सरकार ने प्रशासनिक नियमों के तहत समीक्षा समिति की सिफारिश पर रिंकू दुग्गा को समय से पहले ही ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ (Compulsory Retirement) दे दी थी। केंद्र सरकार का तर्क था कि प्रशासनिक सेवाओं में जनता के प्रति जवाबदेही और अनुशासन सर्वोपरि है।
इस आदेश के खिलाफ रिंकू दुग्गा पहले सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और फिर दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचीं।
- ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट का फैसला: कैट और दिल्ली हाईकोर्ट ने रिंकू दुग्गा की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को दरकिनार कर दिया था।
- हाईकोर्ट का तर्क: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का नियम प्रशासनिक तंत्र से अक्षम या ‘डेडवुड’ (निष्क्रिय) अधिकारियों को बाहर निकालने के लिए होता है। रिंकू दुग्गा की पूर्व वार्षिक रिपोर्ट (APAR) उत्कृष्ट रही हैं और उनके रिकॉर्ड में कोई गंभीर प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी, इसलिए यह नियम उन पर लागू नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर केंद्र सरकार ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
- केंद्र सरकार का तर्क है कि सरकारी संपत्तियों और स्टेडियम का व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करना और एथलीटों के अधिकारों का हनन करना एक गंभीर प्रशासनिक अनुशासनहीनता है।
- ऐसे मामलों में ढील देने से नौकरशाही में गलत संदेश जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने केंद्र सरकार की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जिससे रिंकू दुग्गा की सेवाओं में वापसी फिलहाल पूरी तरह अटक गई है।
मामले का प्रशासनिक और नैतिक पहलू
यह मामला न केवल कानूनी लड़ाई का हिस्सा है, बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों के आचरण और लोक सेवकों की जिम्मेदारी पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
- जनता का भरोसा: लोक सेवकों को सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षक माना जाता है। इस घटना ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग करने पर वरिष्ठ अधिकारियों को भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
- भविष्य की दिशा: सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से सिविल सेवाओं में अनुशासन और जवाबदेही की महत्ता और अधिक मजबूत हुई है।
इस मामले की अगली सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि क्या अधिकारी को सेवा में वापस लिया जाएगा या फिर केंद्र सरकार का अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला बरकरार रहेगा। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के इस कड़े रुख से रिंकू दुग्गा के प्रशासनिक करियर की राहें बेहद कठिन दिखाई दे रही हैं।
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