SpaceX रॉकेट की चाँद से भीषण टक्कर

अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों में इंसानी मिशनों और अभियानों की होड़ के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया के खगोलविदों और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ (SpaceX) का एक विशालकाय और बेकाबू हो चुका रॉकेट अब सीधे चाँद की ओर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों की सटीक गणनाओं और ऑर्बिट ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, यह भटका हुआ रॉकेट बेहद तेज गति से सीधे चंद्रमा की सतह से टकराने वाला है। इस टक्कर के बाद होने वाले भयंकर धमाके और उससे उठने वाले सैकड़ों किलोमीटर ऊँचे धूल के गुबार को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़े दावे किए हैं। आइए जानते हैं इस अद्भुत, दुर्लभ और वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण खगोलीय घटना की पूरी कहानी।

रॉकेट का इतिहास: 2015 में हुआ था लॉन्च

चाँद की ओर तेजी से बढ़ रहा यह रॉकेट ‘स्पेसएक्स फाल्कन 9’ (SpaceX Falcon 9) का एक ऊपरी हिस्सा यानी सेकंड स्टेज (Upper Stage) है। इस रॉकेट को आज से कई साल पहले, फरवरी 2015 में फ्लोरिडा स्थित केप कैनावेरल से लॉन्च किया गया था। इस मिशन का प्राथमिक उद्देश्य अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ (NASA) और राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के एक अति-संवेदनशील जलवायु अवलोकन उपग्रह (Deep Space Climate Observatory – DSCOVR) को अंतरिक्ष में स्थापित करना था।

उपग्रह को उसकी निर्दिष्ट कक्षा यानी ‘लैग्रेंज प्वाइंट 1’ (L1) तक सफलतापूर्वक पहुँचाने के बाद रॉकेट के इस ऊपरी हिस्से का ईंधन पूरी तरह समाप्त हो गया। गुरुत्वाकर्षण और अंतरिक्षीय भौतिकी के नियमों के अनुसार, किसी भी रॉकेट के पास धरती के वायुमंडल में वापस लौटने के लिए पर्याप्त ईंधन होना चाहिए। लेकिन फाल्कन 9 के इस बूस्टर में इतना ईंधन नहीं बचा था कि वह वापस आकर पृथ्वी पर लैंड कर सके या वायुमंडल में जलकर नष्ट हो सके। वहीं दूसरी ओर, इसके पास इतनी ऊर्जा भी नहीं थी कि वह पृथ्वी-सूर्य प्रणाली के गुरुत्वाकर्षण बल से मुक्त होकर गहरे अंतरिक्ष में निकल जाए। नतीजा यह हुआ कि 2015 से यह कई टन वजनी धातु का ढाँचा अंतरिक्ष में एक ‘अंतरिक्ष कचरे’ (Space Debris) की तरह लावारिस भटक रहा है।

कैसे बदला रास्ता और चाँद की ओर बढ़ा?

पिछले लगभग नौ-दस वर्षों से यह रॉकेट पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बलों के बीच एक जटिल और अराजक (chaotic) कक्षा में तैर रहा था। खगोलविदों ने इसे लगातार ट्रैक किया और समय-समय पर इसके मार्ग का अध्ययन करते रहे। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे ‘केऑटिक ऑर्बिट’ कहा जाता है, जहाँ छोटे-छोटे गुरुत्वाकर्षण खिंचाव समय के साथ किसी वस्तु की दिशा में बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

हाल ही में जब यह बूस्टर चंद्रमा के काफी करीब से गुजरा, तो चंद्रमा के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल ने इसे अपनी ओर खींच लिया। इस घटना ने रॉकेट के प्रक्षेपवक्र (Trajectory) को पूरी तरह से बदल दिया। अब यह किसी दिशाहीन मलबे की तरह तैरने के बजाय सीधे चंद्रमा की ओर एक ‘कमिटेड इम्पैक्ट कोर्स’ (Committed Impact Course) पर है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब इसके मार्ग को बदलने का कोई तरीका नहीं है और इसकी चाँद से टक्कर होना शत-प्रतिशत तय है।

भयंकर विस्फोट और 100 किमी ऊँचा गुबार: वैज्ञानिक विश्लेषण

भौतिकी के नियमों के अनुसार, जब अंतरिक्ष में कोई भारी वस्तु अत्यंत उच्च वेग से किसी ठोस सतह से टकराती है, तो वहाँ एक भीषण गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का उत्सर्जन होता है।

  • विस्फोट का वेग: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 4.4 मीट्रिक टन वजन का यह लोहे और एल्यूमीनियम का ढाँचा लगभग 9,000 से 9,500 किलोमीटर प्रति घंटे की प्रचंड रफ्तार (लगभग 2.6 किलोमीटर प्रति सेकंड) से चंद्रमा की सतह से टकराएगा।
  • विस्फोट का असर: यद्यपि चंद्रमा पर वायुमंडल न होने के कारण पृथ्वी जैसी आग की लपटें या ध्वनि तरंगे उत्पन्न नहीं होंगी, लेकिन इस गतिज ऊर्जा के कारण एक भीषण धमाका होगा। रॉकेट के टकराते ही सतह की चट्टानें और धूल तुरंत वाष्पीकृत (vaporized) हो जाएँगी।
  • विशालकाय गड्ढा (Crater): इस प्रभाव से चंद्रमा की सतह पर लगभग 10 से 20 मीटर (30 से 65 फीट) चौड़ा और कई मीटर गहरा एक नया गड्ढा यानी क्रेटर बन जाएगा।
  • 100 किलोमीटर ऊँचा धूल का गुबार: सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में मात्र छठवां हिस्सा (1/6th) है और वहाँ वायुमंडलीय दबाव या हवा का प्रतिरोध बिल्कुल नहीं है। इस कारण, टकराने के बाद चंद्रमा की रेजोलिथ (सतही धूल) और मलबे का एक विशालकाय गुबार अंतरिक्ष में लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई तक उछल जाएगा।

क्या धरती से दिखेगा यह नज़ारा?

आम लोगों और खगोलशास्त्रियों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस खगोलीय धमाके को धरती से नंगी आँखों से या दूरबीन (Telescope) के जरिए देखा जा सकेगा?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह इस बात पर निर्भर करता है कि टक्कर चंद्रमा के किस हिस्से में होती है:

  1. चंद्रमा का सुदूर हिस्सा (Far Side of the Moon): यदि यह टक्कर चंद्रमा के उस हिस्से में होती है जो हमेशा पृथ्वी से विपरीत दिशा में रहता है (जिसे ‘डार्क साइड ऑफ़ द मून’ भी कहा जाता है), तो धरती पर बैठा कोई भी व्यक्ति इसे सीधे नहीं देख पाएगा।
  2. चंद्रमा का दृश्य हिस्सा (Near Side): यदि यह घटना पृथ्वी के सामने वाले हिस्से में होती है और उस समय वहाँ रात का अंधेरा रहता है, तो शौकिया खगोलविद (Amateur Astronomers) उच्च क्षमता वाले टेलीस्कोप की मदद से क्षितिज पर उठने वाली हल्की चमक और धूल के गुबार के प्रभाव को देख सकते हैं। नंगी आँखों से इसे देखना संभव नहीं होगा क्योंकि दूरी बहुत अधिक (लगभग 3,84,000 किमी) है।

हालाँकि, भले ही यह घटना धरती से सीधी न दिखे, लेकिन चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे विभिन्न देशों के लूनर ऑर्बिटर्स—जैसे नासा का LRO (Lunar Reconnaissance Orbiter) और भारत का चंद्रयान-2 ऑर्बिटर—इस टक्कर और उसके बाद बनने वाले क्रेटर की हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेने के लिए पूरी तरह मुस्तैद रहेंगे।

खगोलविदों के लिए एक दुर्लभ वैज्ञानिक अवसर

वैज्ञानिक इस अनपेक्षित दुर्घटना को एक नुकसान के रूप में नहीं, बल्कि एक सुनहरे अवसर के रूप में देख रहे हैं। प्राकृतिक रूप से उल्कापिंड (Meteorites) हमेशा चाँद से टकराते रहते हैं, लेकिन हमें कभी यह पता नहीं होता कि टक्कर कब, कहाँ और कितने वजन की वस्तु से होगी।

स्पेसएक्स के इस रॉकेट के मामले में वैज्ञानिकों को टकराने वाली वस्तु का सटीक द्रव्यमान (Mass), उसका आकार और उसकी गति पहले से पता है। इसलिए, जब यह रॉकेट चाँद से टकराएगा, तो वैज्ञानिक निम्नलिखित बातों का गहन अध्ययन कर सकेंगे:

  • चंद्रमा की आंतरिक बनावट: इस टक्कर से चंद्रमा पर जो भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) उत्पन्न होंगी, उनसे चंद्रमा की क्रस्ट (ऊपरी परत) और मेंटल के बारे में नई जानकारियाँ मिलेंगी।
  • चंद्रमा की निचली सतह की चट्टानें: 100 किमी ऊपर उठने वाले धूल के गुबार और बने क्रेटर का स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण करके वैज्ञानिक यह जान सकेंगे कि चंद्रमा की सतह के नीचे किस प्रकार के खनिज और पानी/बर्फ के अंश मौजूद हैं।

अंतरिक्ष कचरा (Space Debris) और भविष्य की चिंताएँ

इस घटना ने एक बार फिर से अंतरिक्ष कचरे की वैश्विक समस्या को उजागर कर दिया है। वर्तमान में पृथ्वी की कक्षा और उसके आसपास हजारों निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट के बूस्टर और धातु के टुकड़े घूम रहे हैं। यदि इसी तरह अंतरिक्ष में मलबा बढ़ता रहा, तो भविष्य के मानव मिशनों और उपग्रहों के लिए यह गंभीर खतरा बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय अब इस बात पर जोर दे रहा है कि सभी अंतरिक्ष एजेंसियों और निजी कंपनियों को अपने रॉकेट बूस्टरों को मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित रूप से नष्ट करने (De-orbiting) का सख्त नियम अपनाना होगा।

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  • Rahul Kaushik

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