नई दिल्ली: देश की राजनीति में ‘वोट चोरी’ और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर जारी विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और ‘इंडिया’ गठबंधन के तमाम शीर्ष विपक्षी नेताओं ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त याचिका दाखिल की है। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से गैर-कानूनी तरीके से हटाए जा रहे हैं और यह प्रक्रिया लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है।
बाराखंबा से सुप्रीम कोर्ट तक राजनीतिक विरोध मार्च
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने से पहले राजधानी दिल्ली की सड़कों पर विपक्षी दलों ने अपनी एकजुटता और विरोध का बड़ा प्रदर्शन किया। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय, एनसीपी (शरद पवार) सांसद सुप्रिया सुले, सीपीआई(एम) के एम.ए. बेबी, सीपीआई के डी. राजा और अन्य विपक्षी सांसद बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़े।
इस विरोध मार्च के दौरान कांग्रेस और सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं ने हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर “वोट चोरी बंद करो” और “लोकतंत्र की रक्षा करो” जैसे नारे लगाए। यद्यपि सुरक्षा बलों द्वारा सुरक्षा का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट परिसर के ठीक बाहर रोकने का प्रयास किया गया, इसके बावजूद विपक्षी नेताओं की लीगल टीम और प्रतिनिधिमंडल ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में विधिवत रूप से अपनी याचिका प्रस्तुत की।
क्या है ‘वोट चोरी’ और एसआईआर (SIR) का पूरा विवाद?
चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची की गहन जांच और अपडेशन के लिए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) की शुरुआत की गई है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया की आड़ में लक्षित तरीके से लाखों योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।
राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन का मुख्य दावा है कि:
- लाखों वोटों की अनधिकृत कटौती: ‘फॉर्म 7’ का दुरुपयोग करके और बिना किसी उचित भौतिक सत्यापन या व्यक्तिगत सुनवाई के मतदाताओं के नाम छांटे जा रहे हैं।
- चुनाव आयोग के निर्णय पर सवाल: याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या आंतरिक परामर्श के बिना ही स्वविवेक से महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले लिए, जो संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है।
- पारदर्शिता का अभाव: ऑनलाइन डेटाबेस (ECINET और ERONET) में किए जा रहे बदलावों की कोई सार्वजनिक रिपोर्टिंग या सर्वदलीय समीक्षा उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका: 10 प्रमुख मांगें
विपक्षी नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई याचिका में 10 प्रमुख राहत और निर्देश देने की मांग की गई है:
- SIR पर तत्काल अंतरिम रोक: जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं दे देता, तब तक देश के सभी राज्यों में जारी एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जाए।
- आंतरिक फाइलों और रिकॉर्ड्स की पेशी: 24 जून 2025 को एसआईआर शुरू करने संबंधी चुनाव आयोग की सभी मूल फाइलें, मीटिंग के मिनट्स, चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियां और ECINET व ERONET के एक्सेस लॉग्स कोर्ट के सामने पेश किए जाएं।
- संवैधानिक वैधता की जांच: यह जांच की जाए कि चुनाव आयोग का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।
- दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act, 1950) के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए जाएं।
- पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया: भविष्य में एसआईआर से जुड़ा कोई भी निर्णय बहुमत और रिकॉर्डेड मिनट्स की उपस्थिति में ही लागू किया जाए।
- ऑनलाइन फॉर्म 6 का सही अनुपालन: पंजीकरण नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए और प्रक्रियागत विसंगतियों को सुधारा जाए।
- सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच समिति: हटाए गए नामों और डेटाबेस की निष्पक्ष जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए।
- हटाए गए नामों की बूथ-वार सूची का प्रकाशन: जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी सूची कारण, आयु और लिंग के साथ सार्वजनिक की जाए और नाम वापस जोड़ने का अवसर दिया जाए।
- सुनवाई का अधिकार: बिना पूर्व नोटिस दिए किसी भी नागरिक का नाम मतदाता सूची से न हटाया जाए।
- आगामी चुनावों के लिए विशेष व्यवस्था: जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं, वहां पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए अंतिम समय तक अवसर प्रदान किया जाए।
सरकार और सत्तारूढ़ दल का पलटवार
विपक्ष के इस आक्रामक रुख और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा सत्तापक्ष के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सत्तापक्ष का कहना है कि:
- संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश: सरकार के अनुसार, जब भी चुनाव करीब आते हैं या विपक्ष को अपनी हार का अंदेशा होता है, वह चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की साख पर सवाल उठाने लगता है।
- फर्जी मतदाताओं की पहचान आवश्यक: भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तर्क दिया है कि देश भर में अवैध घुसपैठियों, फर्जी प्रविष्टियों और मृत मतदाताओं के नाम हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए अनिवार्य है। मतदाता सूची को पारदर्शी बनाना ही एसआईआर का मुख्य उद्देश्य है।
आगे क्या होगा?
विपक्ष की ओर से दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं। हालांकि, याचिका की प्रारंभिक जांच के दौरान रजिस्ट्री की ओर से प्रक्रियाओं और कागजातों से जुड़ी कुछ तकनीकी कमियों को चिह्नित किया गया था, जिन्हें पूरा करके त्वरित सुनवाई की अपील की गई है।
यह मामला केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी चुनावों के दृष्टिकोण से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना सबसे प्राथमिकता का विषय है, और अब शीर्ष अदालत के फैसले से ही इस पूरे विवाद पर विराम लगने की उम्मीद है।
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