निठारी कांड: बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली ने बदला नाम ‘सदा राम’ बनकर हरिद्वार की चाय दुकान पर बिताए अंतिम दिन

देश के सबसे चर्चित और भयावह निठारी कांड (Nithari Murder Case) के आरोपी सुरेंद्र कोली को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अदालत से बरी होने और जेल से रिहा होने के बाद सुरेंद्र कोली ने अपनी पुरानी पहचान पूरी तरह मिटा दी थी। उसने अपना नाम बदलकर ‘सदा राम’ रख लिया था और धर्मनगरी हरिद्वार की एक साधारण चाय की दुकान पर काम करके गुमनामी की जिंदगी जीने लगा था। अपने अंतिम दिनों में वह समाज से पूरी तरह कटकर गुमनाम स्थिति में रहा।

निठारी कांड और अदालती फैसला

नोएडा के निठारी गांव में वर्ष 2006 में हुए जघन्य हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस मामले में मुख्य आरोपी मनविंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली पर कई बच्चों व महिलाओं के अपहरण, बलात्कार और हत्या के गंभीर आरोप लगे थे। कई मामलों में निचली अदालतों ने कोली को फांसी की सजा भी सुनाई थी।

हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव और जांच प्रक्रियाओं में कमियों के आधार पर सुरेंद्र कोली को निठारी से जुड़े कई मुख्य मामलों में बरी (Acquitted) कर दिया था। सालों तक सलाखों के पीछे रहने के बाद जब वह जेल से बाहर आया, तो उसके पास न तो रहने का ठिकाना था और न ही समाज में स्वीकार्यता।

नाम बदलकर ‘सदा राम’ बनने की कहानी

जेल से रिहा होने के बाद सुरेंद्र कोली के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान छुपाकर जीवन यापन करने की थी। निठारी कांड के खौफनाक अतीत के कारण उसे कहीं काम या आश्रय मिलना असंभव था।

  • पहचान में बदलाव: उसने अपना नाम बदलकर ‘सदा राम’ रख लिया।
  • हरिद्वार का रुख: अपनी पहचान छुपाने के लिए उसने पवित्र शहर हरिद्वार को चुना, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में किसी व्यक्ति का गुमनाम रहना अपेक्षाकृत आसान होता है।
  • चाय की दुकान पर काम: हरिद्वार में उसने एक स्थानीय चाय के ठेले/दुकान पर सहायक के रूप में काम करना शुरू किया। वह बर्तन धोने, चाय बनाने और ग्राहकों को देने जैसे छोटे-मोटे काम करता था।

गुमनामी में बीते अंतिम दिन

स्थानीय लोगों और चाय दुकान के मालिक को कभी इस बात का अंदाजा नहीं हुआ कि ‘सदा राम’ के नाम से काम करने वाला शांत और चुपचाप रहने वाला यह व्यक्ति देश के सबसे बड़े आपराधिक मामलों में से एक का आरोपी रह चुका है। वह बेहद सीमित बातचीत करता था और अपने अतीत के बारे में किसी से कोई जिक्र नहीं करता था।

अंतिम दिनों में बीमारी और एकाकीपन के बीच जीवन बिताते हुए उसने हरिद्वार में ही अंतिम सांस ली। उसकी पहचान उजागर होने के बाद स्थानीय लोग और सुरक्षा एजेंसियां भी स्तब्ध रह गईं।

यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि कानून द्वारा बरी होने के बावजूद, निठारी कांड जैसे गंभीर मामलों से जुड़े रहे व्यक्ति के लिए समाज की मुख्यधारा में लौटना कितना कठिन और जटिल होता है।

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  • Rahul Kaushik

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