नई दिल्ली: अंतरिक्ष विज्ञान जगत से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) का लगभग 1.5 टन (करीब 1500 किलोग्राम) वजनी पुराना अंतरिक्ष टेलीस्कोप और वेधशाला (Swift Observatory) आज पृथ्वी के वायुमंडल में अनियंत्रित रूप से प्रवेश करने वाला है। वैज्ञानिकों की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, इस डीकमिश्रड स्पेसक्राफ्ट का मलबा भारत के कुछ हिस्सों पर भी गिरने की संभावना जताई जा रही है, जिसके चलते सुरक्षा एजेंसियों और अंतरिक्ष प्रेमियों की नजरें इस घटना पर टिकी हुई हैं।
दो दशक से अधिक की सेवा के बाद पृथ्वी की ओर वापसी
नासा का यह प्रतिष्ठित स्विफ्ट वेधशाला (Swift Observatory) अंतरिक्ष में पिछले लगभग 22 वर्षों से ब्रह्मांड के रहस्यों को खंगाल रहा था। इसे मूल रूप से ब्रह्मांड में होने वाले गामा-किरण विस्फोटों (Gamma-ray bursts) और अन्य खगोलीय घटनाओं का अध्ययन करने के लिए भेजा गया था। अपने लंबे कार्यकाल के दौरान इस अंतरिक्ष यान ने ब्लैक होल, सुपरनोवा और आकाशगंगाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण डेटा वैज्ञानिकों को मुहैया कराए।
लेकिन, अंतरिक्ष में उपयोग की एक लंबी अवधि पूरी करने और ईंधन खत्म होने के बाद यह अब एक निष्क्रिय मलबे के रूप में तब्दील हो चुका है। वायुमंडलीय खिंचाव (Atmospheric Drag) और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण इसकी कक्षा लगातार नीचे आ रही थी। अमेरिकी स्पेस फोर्स और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह आज यानी 4 नवंबर को धरती के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर जाएगा।
भारत के किन हिस्सों पर मंडरा रहा है खतरा?
अंतरिक्ष विशेषज्ञों और ग्लोबल ट्रैकिंग रिपोर्ट्स के अनुसार, इस वेधशाला के पुन: प्रवेश का जो संभावित क्षेत्र (Debris Zone) बन रहा है, उसमें भारत के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्से भी शामिल हैं। संभावित दायरे में मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, कोच्चि और भुवनेश्वर जैसे प्रमुख शहर आ रहे हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि दिल्ली, कोलकाता और देश का अधिकांश उत्तर भारत इस संभावित क्षेत्र से बाहर है।
वैज्ञानिकों का यह भी स्पष्ट कहना है कि ‘री-एंट्री ज़ोन’ का दायरा बहुत बड़ा होता है, इसलिए इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मलबा जमीन पर गिरेगा ही। यह केवल वह रास्ता है जिसके ऊपर से अंतरिक्ष यान गुजरेगा। सटीक समय और स्थान को लेकर अभी भी लगभग 11 घंटे तक का अंतर या अनिश्चितता बनी हुई है।
क्या अंतरिक्ष यान का पूरा मलबा जमीन पर गिरेगा?
आम जनमानस के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि डेढ़ टन भारी भरकम मशीन जब धरती पर गिरेगी, तो कितनी तबाही मचा सकती है? इस पर अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।
जब कोई अंतरिक्षीय वस्तु अत्यधिक वेग से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो हवा के घर्षण (Friction) के कारण भीषण गर्मी पैदा होती है। इस भयंकर तापमान (हजारों डिग्री सेल्सियस) के कारण उपग्रह का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जलकर राख हो जाता है। हालांकि, इसके कुछ बेहद मजबूत हिस्से, जैसे कि टंगस्टन के कंपोनेंट्स या विशेष धातुओं के टुकड़े इस आग को झेलते हुए जमीन या समुद्र तक पहुंच सकते हैं।
अधिकांश मलबा महासागरों में समाने की उम्मीद
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति को देखें तो इसका लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पानी यानी महासागरों से घिरा हुआ है और केवल 30 प्रतिशत हिस्से पर ही जमीन है। यही कारण है कि अंतरिक्ष अनुसंधान संगठनों का मानना है कि यदि कोई बचा हुआ टुकड़ा नीचे गिरता भी है, तो उसके किसी घनी आबादी वाले शहर के बजाय खुले समुद्र या बियाबान इलाकों में गिरने की संभावना सबसे अधिक है।
नासा और अन्य अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियां इस अनियंत्रित री-एंट्री (Uncontrolled Re-entry) पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की तरफ से भी ऐसे अंतरिक्ष मलबे पर नजर रखने के लिए आधुनिक रडार और ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिक्ष मलबे से इंसानों या संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की आशंका सांख्यिकीय रूप से बेहद कम होती है। इतिहास में भी इस तरह के कई उपग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में सुरक्षित तरीके से जलकर नष्ट हो चुके हैं। जैसे-जैसे आज दिन आगे बढ़ेगा, नासा और स्पेस फोर्स की तरफ से इसके सटीक समय और मार्ग को लेकर और अधिक स्पष्ट अपडेट सामने आएंगे।
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