‘अब मोहन भागवत को आरक्षण पर सोचना चाहिए’, मायावती ने मल्लिकार्जुन खरगे के मामले में RSS मुखिया को घेरा

देश की राजनीति में संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण के मुद्दे को लेकर अक्सर बयानबाजी का दौर देखने को मिलता है। इसी क्रम में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़ी हालिया राजनीतिक बयानबाजी और आरक्षण की समीक्षा से जुड़े बयानों को आधार बनाकर मायावती ने आरएसएस प्रमुख से अपने रुख पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। मायावती के इस कदम ने देश के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और मायावती का तीखा हमला

मायावती ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स और आधिकारिक बयानों के जरिए इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने साफ कहा कि जब-जब देश में वंचित, शोषित, दलित और पिछड़े समाज के नेताओं की आवाज बुलंद होती है, तब-तब सत्ताधारी दल और उनसे जुड़े संगठन उन्हें निशाना बनाने का काम करते हैं। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का पक्ष लेते हुए कहा कि विपक्षी दलों के शीर्ष दलित नेताओं के साथ जिस प्रकार की राजनीतिक बयानबाजी और आचरण किया जा रहा है, वह समाज के एक बड़े वर्ग के स्वाभिमान से जुड़ा मामला है।

बसपा प्रमुख ने कहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अक्सर जातिगत व्यवस्था, सामाजिक समरसता और आरक्षण को लेकर बयान देते रहते हैं। हालांकि, मायावती का मानना है कि संघ का नजरिया व्यावहारिक धरातल पर दलितों और वंचितों के अधिकारों को मजबूती प्रदान करने के बजाय उनके संशय को बढ़ाता है। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा:

“आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को अब आरक्षण की समीक्षा की बात करने के बजाय इसकी जरूरत, इसके संवैधानिक महत्व और दलित-पिछड़े समाज के सही प्रतिनिधित्व पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।”

आरक्षण पर आरएसएस के रुख की समीक्षा की मांग

देश में आरक्षण का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। समय-समय पर आरएसएस और बीजेपी नेताओं के बयान आरक्षण की समीक्षा या इसमें बदलाव की वकालत करते रहे हैं। मायावती ने इसी संदर्भ में मोहन भागवत को घेरते हुए कहा कि आरक्षण कोई ‘दया या दान’ नहीं है, बल्कि यह बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा देश के संविधान के माध्यम से दलितों और पिछड़ों को दिया गया एक सुरक्षा कवच और प्रतिनिधित्व का अधिकार है।

मायावती ने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्यों की वर्तमान सरकारों की नीतियों के कारण सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कोटा अधूरा पड़ा है। बैकलॉग की भर्तियां पूरी नहीं की जा रही हैं और बड़े पैमाने पर सरकारी विभागों का निजीकरण करके परोक्ष रूप से आरक्षण को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे समय में आरएसएस प्रमुख द्वारा सामाजिक मुद्दों पर दिए जाने वाले वक्तव्यों की प्रासंगिकता तब तक साबित नहीं होगी, जब तक वे आरक्षण को पूरी निष्ठा से लागू करने का समर्थन नहीं करते।

मल्लिकार्जुन खरगे प्रकरण: राजनीतिक संदेश और मायने

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर जारी खींचतान पर मायावती की यह टिप्पणी कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि बसपा और कांग्रेस के बीच चुनावी दूरियां रही हैं, लेकिन जब बात दलित समाज के शीर्ष नेतृत्व के मान-सम्मान और आरक्षण के रक्षा कवच की आती है, तो मायावती रणनीतिक रूप से खुलकर सामने आती हैं।

बहुजन समाज पार्टी की भावी रणनीति

मायावती का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि बसपा आने वाले समय में अपने कोर वोट बैंक (दलित, शोषित और वंचित वर्ग) को फिर से एकजुट करने की कोशिश में है। पिछले कुछ चुनावों में बसपा के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठते रहे हैं, ऐसे में मायावती आरक्षण, संविधान और दलित स्वाभिमान के मुद्दों को उठाकर अपने पारंपरिक जनाधार को यह संदेश देना चाहती हैं कि बसपा ही उनके अधिकारों की सबसे प्रखर आवाज है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के दलितों और पिछड़ों को किसी भी दल या संगठन की मीठी-मीठी बातों या राजनीतिक बहकावे में नहीं आना चाहिए। आरएसएस मुखिया मोहन भागवत को अपने बयानों पर पुनर्विचार करते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे आरक्षण को स्थाई सामाजिक न्याय का साधन मानते हैं या नहीं।

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  • Rahul Kaushik

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