झारखंड में इन दिनों राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और युवाओं का गुस्सा सड़कों पर साफ नजर आ रहा है। परीक्षाओं में लगातार हो रही देरी, प्रश्नपत्र लीक के आरोप, परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल और लंबित भर्तियों को लेकर हजारों छात्र लंबे समय से आंदोलनरत हैं। इस विशाल प्रदर्शन के बीच एक आम छात्र की आपबीती और उसका दर्द पूरे राज्य के प्रतियोगी परीक्षार्थियों की स्थिति को उजागर करता है।
छात्र का दर्द: “अब किताबों से ज्यादा उम्र की चिंता सताने लगी है”
प्रदर्शन के दौरान हाथ में तख्ती लिए खड़े एक छात्र ने जब मीडिया के सामने अपनी बात रखी, तो उसकी आंखों में न केवल गुस्सा था, बल्कि वर्षों की मेहनत के बेकार जाने की हताशा भी साफ झलक रही थी।
छात्र ने अपनी तकलीफ बयां करते हुए कहा, “हम गांव-देहात से पेट काटकर रांची जैसे शहर में एक छोटे से कमरे में रहने आते हैं। हमारे मां-बाप अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा हर महीने हमें सिर्फ इस उम्मीद में भेजते हैं कि एक दिन हम सरकारी नौकरी पाकर उनका नाम रोशन करेंगे। लेकिन यहां हकीकत कुछ और ही है। एक वैकेंसी आने में दो-तीन साल लग जाते हैं, जब फॉर्म भरते हैं तो परीक्षा की तारीखों का कोई ठिकाना नहीं होता। अगर किसी तरह परीक्षा हो भी गई, तो पेपर लीक का जिन्न बाहर आ जाता है और पूरी प्रक्रिया रद्द हो जाती है।”
छात्र ने आगे कहा, “अब हमें पढ़ाई से ज्यादा अपनी ढलती उम्र की चिंता सताने लगी है। हम ओवर-एज (अधिक उम्र) हो रहे हैं। घर से फोन आता है तो माता-पिता का चेहरा याद आ जाता है। उन्हें क्या जवाब दें? क्या उन्हें यह बताएं कि हमने पढ़ाई नहीं की, या यह बताएं कि जिस सिस्टम के भरोसे हम बैठे थे, वही लाचार है? एक-एक परीक्षा के रिजल्ट के लिए सालों का इंतजार किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है।”
आंदोलन की मुख्य वजहें और छात्रों की प्रमुख मांगें
झारखंड के अलग-अलग जिलों से आए छात्रों का कहना है कि यह आंदोलन केवल किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि उनके भविष्य की रक्षा का सवाल है। छात्रों ने प्रशासन और सरकार के समक्ष निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे हैं:
- समयबद्ध परीक्षा कैलेंडर: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा सभी भर्तियों के लिए एक पारदर्शी और निश्चित परीक्षा कैलेंडर जारी किया जाए, जिसका पालन कड़ाई से हो।
- पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई: राज्य में आयोजित होने वाली परीक्षाओं में पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए और पेपर लीक माफिया के खिलाफ कठोर कानूनी कदम उठाए जाएं।
- लंबित परिणामों की शीघ्र घोषणा: जिन परीक्षाओं के आयोजन को महीनों बीत चुके हैं, उनके परिणाम बिना किसी देरी के जारी किए जाएं और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की जाए।
- उम्र सीमा में छूट: परीक्षाओं के आयोजन में हुए कई वर्षों के विलंब को देखते हुए प्रभावित अभ्यर्थियों को अधिकतम आयु सीमा में अतिरिक्त छूट दी जाए।
परिजनों पर आर्थिक और मानसिक दबाव
इस प्रोटेस्ट में शामिल अधिकतर अभ्यर्थी मध्यमवर्गीय या किसान परिवारों से आते हैं। लॉज और हॉस्टल का किराया, कोचिंग की फीस, और दैनिक खर्चों को पूरा करने में कई परिवार कर्ज के तले दब चुके हैं।
कई परीक्षार्थियों का कहना है कि लंबे समय तक नतीजे न आने के कारण समाज और रिश्तेदारों का दबाव भी उन पर बनने लगता है। लगातार असफलता और अनिश्चितता के इस चक्र ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है। डिप्रेशन और हताशा के बावजूद ये छात्र अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
सिस्टम से जवाबदेही की उम्मीद
छात्र आंदोलन ने अब एक व्यापक रूप ले लिया है। युवाओं का स्पष्ट कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक उनका यह शांतिपूर्ण विरोध जारी रहेगा।
राज्य के नौजवानों का यह आक्रोश केवल एक नौकरी की मांग नहीं है, बल्कि यह उस पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था की मांग है, जिसमें हर मेहनती छात्र को उसकी काबिलियत के आधार पर सही समय पर अवसर मिल सके। अब देखना यह होगा कि शासन और प्रशासन इन युवाओं की चीख और उनकी तकलीफ पर कितनी जल्दी संवेदनशीलता दिखाता है।
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