बॉलीवुड में सिद्धार्थ मल्होत्रा के संघर की कहानी: असफलता से ‘शेरशाह’ तक का सफर

बॉलीवुड की चकाचौंध से भरी दुनिया बाहर से जितनी लुभावनी और चमकदार नजर आती है, अंदर से इसका संघर्ष उतना ही कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है। बाहर से आने वाले हर कलाकार (आउटसाइडर) के लिए हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाना एक बहुत ही कठिन परीक्षा की तरह है। फिल्म उद्योग में बिना किसी ‘गॉडफादर’ या फिल्मी पृष्ठभूमि के कदम रखना और खुद को साबित करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। ऐसे ही संघर्षशील और प्रेरणादायक अभिनेताओं की सूची में एक प्रमुख नाम आता है—सिद्धार्थ मल्होत्रा। आज भले ही सिद्धार्थ बॉलीवुड के शीर्ष अभिनेताओं में गिने जाते हैं और उनकी लाखों की संख्या में फैन फॉलोइंग है, लेकिन उनका यह सफर किसी परीकथा जैसा आसान बिल्कुल नहीं था। एक समय ऐसा भी था जब उनके पास रहने, खाने और सर्वाइव करने तक के लाले पड़े हुए थे। हाल ही में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपने शुरुआती दिनों के इन्हीं कड़वे और संघर्षपूर्ण अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे असफलता, आर्थिक तंगी और अनिश्चितता के दौर में उनके भीतर के ढीठपन और अड़ियल रवैये ने उन्हें पूरी तरह टूटने से बचाया।

सिद्धार्थ मल्होत्रा का जन्म दिल्ली के एक साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई और परवरिश दिल्ली में ही हुई। मॉडलिंग की दुनिया में पहचान बनाने के बाद सिद्धार्थ ने अभिनय की दुनिया में किस्मत आजमाने का फैसला किया और अपने सपनों को साकार करने के लिए सपनों की नगरी मुंबई का रुख किया। हालांकि, मुंबई किसी भी नए कलाकार का स्वागत पलकें बिछाकर नहीं करती। यहाँ कदम रखते ही सिद्धार्थ को सिनेमा उद्योग की कठोर और व्यावहारिक वास्तविकताओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने एक फिल्म के लिए ऑडिशन दिया और किस्मत से उन्हें साइन भी कर लिया गया। वह उनकी आधिकारिक पहली फिल्म होने वाली थी। सिद्धार्थ बेहद खुश थे और अपनी पहली ही फिल्म की तैयारियों में पूरी जी-जान से जुट गए। उन्होंने अभिनय की वर्कशॉप्स लीं, अपने किरदार पर काम किया और महीनों तक उस प्रोजेक्ट की शूटिंग शुरू होने का बेसब्री से इंतजार करते रहे।

लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का एक कड़वा सच यह भी है कि यहाँ जब तक फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज न हो जाए, तब तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। कुछ ही समय बाद वह प्रोजेक्ट अचानक पूरी तरह बंद हो गया। बजट की कमी या आंतरिक कारणों से फिल्म मेकर्स ने उस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। एक युवा और नए कलाकार के लिए, जिसने अपने करियर के कई कीमती महीने उस एक मौके के नाम कर दिए थे, यह बहुत बड़ा झटका था। सिद्धार्थ पूरी तरह हताश हो चुके थे। उन्हें न केवल अपनी मेहनत बेकार जाती हुई दिखी, बल्कि उनके सामने आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया। बिना किसी काम और आय के साधन के मुंबई जैसे महंगे शहर में अपना गुजारा करना बेहद मुश्किल हो गया था।

बॉलीवुड में सिद्धार्थ मल्होत्रा के संघर की कहानी

उस दौर की तंगी का जिक्र करते हुए सिद्धार्थ ने बताया कि किस तरह बजट सीमित होने के कारण उन्हें खाने-पीने की चीजों में बेहद कटौती करनी पड़ती थी। दिन का खर्च चलाने और अपनी सेहत को बनाए रखने के लिए वह उबले हुए अंडे और शकरकंद (स्वीट पोटैटो) खाकर अपने दिन बिताया करते थे। अंडा और शकरकंद सस्ते होने के साथ-साथ शरीर को जरूरी न्यूट्रिशन और प्रोटीन भी देते थे, जिससे वह कम पैसों में अपनी फिटनेस भी बनाए रख पाते थे और पेट भी भर लेते थे। इस आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव के बीच सिद्धार्थ ने कभी भी हार मानने की नहीं सोची।

सिद्धार्थ ने एक साक्षात्कार के दौरान अपने मनोभावों को बयां करते हुए स्पष्ट कहा कि उस कठिन समय में अगर किसी चीज ने उन्हें टूटने से बचाया और मुंबई से वापस दिल्ली लौटने नहीं दिया, तो वह था उनका ‘ढीठपन’ और ‘अड़ियलपन’। सिद्धार्थ के अनुसार, यदि व्यक्ति में अपने सपनों के प्रति जिद और एक खास तरह का ढीठपन न हो, तो यह इंडस्ट्री आपको बहुत जल्दी नकार कर बाहर का रास्ता दिखा देती है। उन्होंने अपने मन में यह ठान लिया था कि चाहे कितनी भी असफलताओं का सामना करना पड़े, वह बिना कुछ हासिल किए खाली हाथ वापस नहीं लौटेंगे। इसी अड़ियल रवैये ने उन्हें हर असफलता के बाद दोबारा खड़े होने की ताकत दी और वे लगातार नए ऑडिशन और मौकों की तलाश में जुटे रहे।

जब अभिनय के मौके तुरंत नहीं मिल पा रहे थे, तब सिद्धार्थ ने हार मानने के बजाय फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझने का फैसला किया। उन्होंने मशहूर निर्देशक करण जौहर की बहुचर्चित फिल्म ‘माय नेम इज खान’ (2010) में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर (सहायक निर्देशक) काम करना शुरू किया। इस फिल्म के सेट पर उन्हें कैमरे के पीछे की दुनिया, लाइट, एंगल, डायरेक्शन और बड़े-बड़े कलाकारों के अभिनय को बेहद करीब से देखने और सीखने का अवसर मिला। सहायक निर्देशक के तौर पर की गई इस मेहनत ने सिद्धार्थ के भीतर के कलाकार को तराशने में अहम भूमिका निभाई।

उनकी इस लगन, अनुशासन और मेहनत को करण जौहर ने बहुत करीब से देखा। आखिरकार साल 2012 में सिद्धार्थ की किस्मत ने करवट ली और उन्हें धर्मा प्रोडक्शंस की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से एक मुख्य अभिनेता के रूप में बॉलीवुड में धमाकेदार डेब्यू करने का मौका मिला। इस फिल्म में उनके साथ वरुण धवन और आलिया भट्ट भी नजर आए थे। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और सिद्धार्थ रातों-रात देश के युवाओं और क्रश के रूप में मशहूर हो गए। उनकी चार्मिंग पर्सनालिटी और अभिनय को दर्शकों ने काफी सराहा।

इसके बाद सिद्धार्थ ने अपने करियर में कई अलग-अलग तरह की फिल्मों में काम किया। ‘हंसी तो फंसी’, ‘एक विलेन’, ‘कपूर एंड संस’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता को साबित करने की कोशिश की। लेकिन इनमें से कुछ फिल्में जहां बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं, वहीं कुछ फिल्में दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं। उनके करियर में एक समय ऐसा भी आया जब उनके नाम लगातार कई फ्लॉप या औसत फिल्में दर्ज होने लगीं। आलोचकों ने उनके करियर और अभिनय कौशल पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। एक बार फिर सिद्धार्थ के करियर पर अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगे थे।

लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि सच्चे कलाकार को केवल एक सही मौके की तलाश होती है, सिद्धार्थ के जीवन में भी वह ऐतिहासिक मोड़ आया साल 2021 में रिलीज हुई फिल्म ‘शेरशाह’ के रूप में। कैप्टन विक्रम बत्रा (परमवीर चक्र विजेता) के जीवन और 1999 के कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी इस बायोपिक फिल्म ने सिद्धार्थ मल्होत्रा के करियर की दिशा और दशा को पूरी तरह बदलकर रख दिया। फिल्म में उन्होंने कैप्टन विक्रम बत्रा और उनके जुड़वां भाई विशाल बत्रा की दोहरी भूमिका निभाई।

‘शेरशाह’ में सिद्धार्थ द्वारा निभाया गया कैप्टन विक्रम बत्रा का किरदार न केवल उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय माना गया, बल्कि इसने दर्शकों की आंखों में आंसू और सीने में देशभक्ति का जज्बा भर दिया। “ये दिल मांगे मोर” का नारा लगाने वाले अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस, वीरता और उनके मानवीय पहलू को सिद्धार्थ ने जिस संजीदगी और शिद्दत के साथ पर्दे पर उतारा, उसने आलोचकों का मुंह पूरी तरह बंद कर दिया। इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया था, जहां इसने व्यूअरशिप के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब सराहा गया।

‘शेरशाह’ की सफलता ने सिद्धार्थ मल्होत्रा को बॉलीवुड में एक नई और मजबूत पहचान दी। उन्हें एक ‘चॉकलेट बॉय’ या केवल रोमांटिक हीरो के दायरे से निकालकर एक गंभीर, परिपक्व और बहुमुखी अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। इस फिल्म के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। सिद्धार्थ खुद भी मानते हैं कि ‘शेरशाह’ उनके जीवन और करियर की सबसे खास फिल्म है, जिसने उन्हें दर्शकों के दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए एक अमिट जगह दिला दी।

सिद्धार्थ मल्होत्रा का यह पूरा सफर केवल एक बॉलीवुड स्टार की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के उन लाखों-करोड़ों युवाओं के लिए एक जिंदा मिसाल और प्रेरणा है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बिना किसी सहारे के बड़े शहरों का रुख करते हैं। सिद्धार्थ की यह कहानी सिखाती है कि जीवन में शुरुआती असफलताएं और आर्थिक तंगियां आपको कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए आती हैं। यदि आपके पास अपने लक्ष्य के प्रति एक अड़ियल रवैया, मेहनत करने का जज्बा और ढीठपन है, तो देर से ही सही लेकिन सफलता आपके कदम जरूर चूमती है। उबले अंडे और शकरकंद खाकर गुजारा करने वाले दिन आज सिद्धार्थ के लिए बीते हुए कल की बात हो चुके हैं, लेकिन उन दिनों से मिली सीख ने आज उन्हें जमीन से जुड़ा हुआ एक सफल और संवेदनशील इंसान बनाए रखा है।

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  • Rashika Sharma

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