काजोल ने बताई मुखर्जी बाड़ी की 80 साल पुरानी दुर्गा पूजा की विरासत

जब बात मुंबई में दुर्गा पूजा के उत्सव की आती है, तो एक नाम सबसे पहले और सबसे सम्मान के साथ लिया जाता है—बॉम्बे सर्बोजनिक दुर्गा पूजा समिति, जिसे आम बोलचाल में ‘मुखर्जी बाड़ी की दुर्गा पूजा’ कहा जाता है। यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि मायानगरी मुंबई के दिल में बसा एक ‘मिनी कोलकाता’ है। इस साल, यह प्रतिष्ठित पूजा अपनी 80वीं वर्षगांठ का ऐतिहासिक मील का पत्थर छू रही है। बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री और इस परिवार की लाडली काजोल ने इस 80 साल पुरानी अनमोल विरासत के बारे में खुलकर बात की है। उनका यह संदेश साफ है—यह उत्सव दिखावे, ग्लैमर या प्रसिद्धि का नहीं, बल्कि गहरी आस्था, संस्कृति और पारिवारिक जुड़ाव का जीवंत प्रतीक है।

मुंबई की भागदौड़ में बंगाली संस्कृति की जीवंत धड़कन

मुंबई एक ऐसा शहर है जो कभी नहीं सोता। यहां की रफ्तार, आधुनिकता और चकाचौंध हर किसी को अपनी ओर खींचती है। लेकिन इस तेज-तर्रार महानगर के बीच सांताक्रूज (पश्चिम) के एक कोने में हर साल अक्टूबर के दिनों में कुछ ऐसा घटित होता है, जो समय के पहिए को जैसे थोड़ा धीमा कर देता है। यहां एक ऐसी दुनिया आबाद होती है जिसकी खुशबू बंगाल की सोंधी माटी, ढाक की थाप, धुनुची नृत्य और बंगाली व्यंजनों की महक से सराबोर होती है।

मुखर्जी परिवार की यह दुर्गा पूजा पिछले आठ दशकों से बंगाली समुदाय और कला जगत के लोगों को एक सूत्र में पिरोती आ रही है। इस साल 80वें वर्ष में प्रवेश करने पर यह उत्सव और भी अधिक भावुक और ऐतिहासिक हो गया है। नई पीढ़ी से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई इस पवित्र अनुष्ठान का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक रहता है।

शुरुआत की कहानी: कैसे रखी गई थी इस महान परंपरा की नींव?

इस महान उत्सव की शुरुआत शशधर मुखर्जी (जो दिग्गज फिल्म निर्माता थे और काजोल के दादाजी लगते हैं) और उनके परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा की गई थी। आज से 80 साल पहले, जब मुंबई (तब बॉम्बे) में प्रवासियों के लिए अपने घर और त्योहारों से दूर रहना बहुत कठिन था, तब बंगाली संस्कृति को संजोए रखने और मां दुर्गा के आशीर्वाद को बनाए रखने के लिए इस सार्वजनिक पूजा की नींव रखी गई थी।

शुरुआती दौर में यह उत्सव बेहद सादगीपूर्ण और पारिवारिक था। धीरे-धीरे समय बीतता गया, पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन पूजा का मूल स्वरूप और उसकी आत्मीयता आज भी वैसी ही बनी हुई है। आज यह पूजा केवल मुखर्जी परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि यह मुंबई के सांस्कृतिक मानचित्र का एक अनिवार्य और गौरवशाली हिस्सा बन चुकी है।

काजोल का नजरिया: “यह प्रसिद्धि नहीं, बल्कि हमारी आस्था है”

काजोल, जो अपनी बेबाक और ऊर्जावान शैली के लिए जानी जाती हैं, जब भी मुखर्जी बाड़ी की दुर्गा पूजा की बात करती हैं, तो उनकी आंखों में एक अलग ही चमक और आवाज में अपनेपन का अहसास होता है।

अपने एक हालिया इंटरव्यू और बातचीत में काजोल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस पूजा का मुख्य उद्देश्य कभी भी मीडिया की सुर्खियां बटोरना या ग्लैमर का प्रदर्शन करना नहीं रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“हमारे लिए यह उत्सव प्रसिद्धि या लाइमलाइट का माध्यम नहीं है। यह हमारी आस्था, हमारी जड़ों और उस अटूट विश्वास का प्रतीक है जो हमें मां दुर्गा से जोड़ता है। पिछले 80 सालों से यह परंपरा बिना किसी दिखावे के, केवल शुद्ध भक्ति भाव के साथ आगे बढ़ रही है।”

काजोल खुद हर साल इन पांच दिनों के दौरान पारंपरिक साड़ियों में नजर आती हैं। वे न सिर्फ मेहमानों का स्वागत करती हैं, बल्कि मां के भोग वितरण से लेकर पारंपरिक अनुष्ठानों और परिवार की हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी को खुद संभालती हैं। उनके लिए यह मंच स्टारडम से दूर, अपनी मां (तनुजा), बहन (तनीषा मुखर्जी) और पूरे परिवार के साथ अपनेपन के पल बिताने का सबसे खूबसूरत जरिया है।

महाषष्ठी से विजया दशमी तक: परंपराओं का अटूट सिलसिला

मुखर्जी बाड़ी की दुर्गा पूजा अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों और नियमों के लिए पूरे शहर में प्रसिद्ध है। यहां आने वाले हर श्रद्धालु को बंगाल के किसी पारंपरिक पूजा पंडाल जैसा ही अनुभव होता है।

  1. महाषष्ठी और मां का आगमन: पूजा के पहले दिन यानी महाषष्ठी पर मां दुर्गा की प्रतिमा का अनावरण होता है और कल्पोआरंभ के साथ अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इस दिन बंगाली समुदाय के लोग पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर मां का स्वागत करने पहुंचते हैं।
  2. महापुष्पंजलि और प्रातकालीन अनुष्ठान: महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी के दिन सुबह होने वाली ‘पुष्पंजलि’ इस पूजा का सबसे आध्यात्मिक केंद्र होती है। मंत्रोच्चार के बीच जब सैकड़ों लोग एक साथ हाथ में फूल लेकर मां को अर्पित करते हैं, तो पूरा वातावरण दिव्यता से भर जाता है।
  3. अष्टमी की महाआरती और भोग: महाअष्टमी के दिन विशेष भोग तैयार किया जाता है, जिसमें खिचड़ी, लबड़ा (मिश्रित सब्जी), चटनी और रसगुल्ला शामिल होता है। मुखर्जी बाड़ी के इस प्रसिद्ध महाभोग को पाने के लिए आम लोगों के साथ-साथ बॉलीवुड की कई दिग्गज हस्तियां भी कतार में खड़ी नजर आती हैं।
  4. सिंदूर खेला और विदाई: विजया दशमी के दिन होने वाला ‘सिंदूर खेला’ इस उत्सव का सबसे भावनात्मक क्षण होता है। विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर लगाने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मंगलमय जीवन की कामना करती हैं। इसके बाद नम आंखों से मां को विदाई दी जाती है।

बॉलीवुड और आम जनता का अनूठा संगम

मुखर्जी बाड़ी की इस पूजा की एक और खास विशेषता यह है कि यहां किसी वीआईपी या आम नागरिक के बीच कोई दीवार नहीं होती। हालांकि यहां बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे—जैसे जया बच्चन, रानी मुखर्जी, काजोल, अयन मुखर्जी और कई अन्य निर्देशक-कलाकार शिरकत करते हैं, लेकिन माहौल पूरी तरह से एक पारिवारिक घर जैसा होता है।

यहां आने वाले हर आम इंसान को वही आदर और अपनापन मिलता है जो परिवार के किसी सदस्य को मिलता है। यही वजह है कि पिछले 80 वर्षों से लोग इस पूजा से भावनात्मक रूप से जुड़े चले आ रहे हैं। यह एक ऐसा मंच है जहां फिल्मी चकाचौंध पीछे छूट जाती है और केवल संस्कृति, परंपरा और भक्ति आगे रहती है।

80 साल का सफर: आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा

आज जब आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग अपनी संस्कृति और जड़ों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, तब मुखर्जी परिवार की यह 80 साल पुरानी परंपरा हमें यह सिखाती है कि अपनी मिट्टी और संस्कारों से जुड़े रहना कितना जरूरी है।

काजोल और उनके पूरे परिवार ने यह साबित कर दिया है कि प्रसिद्धि चाहे जितनी मिल जाए, लेकिन अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेज कर रखना ही असली इंसानियत और बड़प्पन है। इस 80वें वर्ष में प्रवेश करते हुए, यह दुर्गा पूजा न सिर्फ पिछले दशकों की यादों को ताजा कर रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दे रही है कि सच्ची आस्था किसी लाल कालीन या कैमरों की फ्लैशलाइट पर निर्भर नहीं होती, बल्कि वह दिल की गहराई से निकलती है।

जब विजया दशमी के दिन “आशछे बोशोर आबार hobe” (अगلی बार फिर मिलेंगे) के उद्घोष के साथ मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन होता है, तो हर भक्त के दिल में एक नई उम्मीद और अगले साल का इंतजार जग जाता है। मुंबई की इस अनूठी ‘मिनी कोलकाता’ की गूंज आने वाले कई दशकों तक इसी तरह आस्था और प्रेम का संदेश देती रहेगी।

यह भी पढ़ें: बिहार STET 2026: एडमिट कार्ड जारी होने की तिथि और परीक्षा शेड्यूल घोषित

Author

  • Rashika Sharma

    राशिका शर्मा एक उभरती हुई युवा पत्रकार एवं कंटेंट राइटर हैं, जो समाज, शिक्षा, डिजिटल मीडिया, लाइफस्टाइल और समसामयिक विषयों पर प्रभावशाली एवं तथ्यात्मक लेखन के लिए जानी जाती हैं। उन्हें समाचार लेखन के माध्यम से लोगों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुँचाने में विशेष रुचि है।

    वे सरल, स्पष्ट और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में लेखन करती हैं, जिससे उनके लेख हर वर्ग के पाठकों के लिए सहज और रोचक बनते हैं। डिजिटल युग में बदलती खबरों, युवा मुद्दों और सामाजिक विषयों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक संवेदनशील और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में पहचान दिलाती है।

    राशिका शर्मा का उद्देश्य निष्पक्ष पत्रकारिता के माध्यम से समाज में जागरूकता बढ़ाना और पाठकों तक विश्वसनीय समाचार पहुँचाना है।

Leave a Comment