नेपाल में 19 दिन का सीक्रेट शूट: कैसे बनी चीन की नींद उड़ाने वाली तिब्बती फिल्म

फिल्म निर्माण की दुनिया में कई ऐसी कहानियां होती हैं जो परदे पर दिखने वाली कहानी से भी ज्यादा सनसनीखेज और रोमांचक होती हैं। तिब्बती मूल के निर्देशक शेनपेन खिमसार (Shenpenn Khymsar) की बहुचर्चित फिल्म ‘फोर रिवर्स सिक्स रेंज्स’ (Four Rivers Six Ranges) की दास्तान भी कुछ ऐसी ही है।

यह फिल्म 1959 में परम पूज्य 14वें दलाई लामा को तिब्बत से सुरक्षित निकालकर भारत पहुंचाने वाले तिब्बती प्रतिरोध समूह ‘चुशी गनड्रुक’ (Chushi Gangdruk) के गुमनाम योद्धाओं के अदम्य साहस और संघर्ष पर आधारित है। लेकिन इस ऐतिहासिक सिनेमाई यात्रा को सच साबित करने का रास्ता कतई आसान नहीं था। नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव, जासूसों के डर और सीमित संसाधनों के बीच इस फिल्म को जिस तरह सीक्रेट तरीके से महज 19 दिनों में शूट किया गया, उसने पूरी दुनिया की फिल्म इंडस्ट्री और भू-राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है।

फर्जी नाम ‘द हिमालयन रॉबिन हुड’ और सीक्रेट नेपाल मिशन

चीन का नेपाल की सरकार पर गहरा कूटनीतिक और आर्थिक दबाव रहा है। नेपाल सरकार अपनी धरती पर किसी भी तरह की “चीन-विरोधी” गतिविधियों या फिल्मों को अनुमति नहीं देती। निर्देशक शेनपेन खिमसार इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि अगर वे अपनी असली स्क्रिप्ट लेकर अनुमति मांगने जाते, तो फिल्म बनने से पहले ही ठंडे बस्ते में डाल दी जाती और पूरी टीम को गिरफ्तार किया जा सकता था।

इसीलिए एक बेहद चालाक मास्टरप्लान बनाया गया। नेपाल के संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेने के लिए एक नकली स्क्रिप्ट तैयार की गई, जिसका नाम रखा गया द हिमालयन रॉबिन हुड’ (The Himalayan Robin Hood)। कागज पर यह दिखाया गया कि यह एक आम लोककथा और डकैत/मददगार की कहानी है। लेकिन जमीन पर, मुस्टांग (Mustang) क्षेत्र की 15,000 से 16,000 फीट ऊंची बर्फिली और दुर्गम पहाड़ियों में शूट कुछ और ही हो रहा था—चीन की तानाशाही के खिलाफ लड़ा गया तिब्बती स्वतंत्रता संग्राम।

15,000 फीट की ऊंचाई पर 19 दिनों का खौफनाक और असाधारण शेड्यूल

किसी भी बड़े पैमाने की हिस्टोरिकल एक्शन फिल्म को पूरा होने में आमतौर पर 45 से 60 दिनों का समय लगता है। लेकिन शेनपेन के पास न तो बड़ा बजट था और न ही नेपाल में ज्यादा दिन टिकने का जोखिम उठाने की गुंजाइश। चीनी सुरक्षा एजेंसियों और नेपाली अधिकारियों की नजरों से बचने के लिए पूरी शूटिंग को सिर्फ 19 दिनों के रिकॉर्ड समय में निपटाया गया।

शूटिंग के हालात किसी युद्ध से कम नहीं थे:

  • बिना नहाए रहे कलाकार: किरदारों को तिब्बती लड़ाकों का असली और दर्दभरा एहसास देने के लिए मेथड एक्टिंग का सहारा लिया गया। कलाकारों को एक महीने से ज्यादा समय तक नहाने की इजाजत नहीं थी ताकि उनके चेहरों और बॉडी लैंग्वेज में वही संघर्ष दिखे।
  • खुद की जान जोखिम में डालकर एक्शन: स्टंट और ब्लास्ट सीन शूट करने के लिए टीम के पास महंगे सुरक्षा उपकरण नहीं थे। निर्देशक शेनपेन ने खुद जूट की बोरी को पानी में भिगोकर ओढ़ा और जलती हुई आग के बीच कैमरा लेकर कूद पड़े।
  • घोड़े की सवारी की ट्रेनिंग: बजट की कमी के कारण प्रोफेशनल हॉर्स रैंगलर नहीं रखे जा सके। खुद निर्देशक ने अपने कलाकारों को पहाड़ियों पर घोड़े चलाने की ट्रेनिंग दी।

चीन का तीखा ऐतराज: फिल्म को बताया ‘अलगाववादी’

जैसे ही फिल्म का पहला लुक और खबरें सामने आईं, बीजिंग में खलबली मच गई। चीन के सरकारी मीडिया (CGTN) ने फिल्म के खिलाफ कड़ा लेख जारी करते हुए इसे “इतिहास को गलत तरीके से पेश करने वाली” और “अलगाववादी एजेंडा” करार दिया। चीन का दावा है कि तिब्बत हमेशा से उसका अभिन्न अंग रहा है और यह फिल्म चीनी संप्रभुता को चुनौती देती है।

निर्देशक शेनपेन खिमसार ने चीन के इस तीखे रुख का जवाब देते हुए कहा कि चीन का यह डर ही साबित करता है कि तिब्बत का मुद्दा कितना संवेदनशील है। एक साधारण फिल्म निर्माता से ड्रैगन का इस कदर बौखला जाना यह दर्शाता है कि सच की ताकत कितनी बड़ी होती है।

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  • Rashika Sharma

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