दुनिया भर के समुद्र और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग (Maritime Trade Routes) इन दिनों अशांति और संघर्ष के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। कभी दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने वाली ये नीली राहें आज वाणिज्यिक जहाजों (Commercial Ships) के लिए खूनी मैदान साबित हो रही हैं। पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते तनाव, रेड सी (लाल सागर) में हुती विद्रोहियों के ताबड़तोड़ हमलों, होर्मुज स्ट्रेट में जारी भू-राजनीतिक खींचतान और उधर पूर्वी यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ब्लैक सी (काला सागर) के युद्ध क्षेत्र में तब्दील होने से समुद्री मार्ग ‘डेथ रूट’ (Death Route) में बदल गए हैं।
इन सब के बीच सबसे चिंताजनक और दर्दनाक पहलू यह है कि इस वैश्विक भू-राजनीतिक आग (Geopolitical Conflict) की चपेट में सबसे ज्यादा निर्दोष भारतीय नाविक (Indian Seafarers) आ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर गिरते ड्रोन, हमलावर मिसाइलें और समुद्री खदानें (Sea Mines) भारतीय सीफॉयर्स की जान के दुश्मन बन चुके हैं। सवाल उठता है कि आखिर भारतीय नाविक ही बार-बार मिसाइलों और ड्रोन हमलों का शिकार क्यों हो रहे हैं? आइए गहराई से समझते हैं इस वैश्विक संकट की वजह और इसके पीछे के तमाम पहलू।
1. होर्मुज से ब्लैक सी: जलमार्ग बना खूनी मैदान
वैश्विक मर्चेंट नेवी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के लिए यह दौर पिछले कुछ दशकों का सबसे खतरनाक समय माना जा रहा है। दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारे इस वक्त सीधे युद्ध की आग में झुलस रहे हैं:
रेड सी और होर्मुज स्ट्रेट (Red Sea & Strait of Hormuz)
मिडिल ईस्ट में इज़राइल-हमास संघर्ष की शुरुआत के बाद से यमन के हुती (Houthi) विद्रोहियों ने लाल सागर और बाबल-अल-मंदेब स्ट्रेट में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। हुती विद्रोहियों का दावा है कि वे केवल इज़राइल या उसके सहयोगियों (अमेरिका, ब्रिटेन) से जुड़े जहाजों को निशाना बना रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी मर्चेंट वेसल (व्यापारिक जहाज) उनके गाइडेंस सिस्टम, आत्मघाती ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों की ज़द में आ रहा है।
दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)—जहाँ से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है—ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनातनी का केंद्र बना हुआ है। जहाजों का अपहरण, संदिग्ध जब्ती और ड्रोन हमलों ने इस पूरे इलाके को खतरनाक बना दिया है।
ब्लैक सी (Black Sea – काला सागर)
फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद से ब्लैक सी भी एक खतरनाक बैटलग्राउंड बना हुआ है। समुद्री खदानें (Sea Mines), एंटी-शिप मिसाइलें और दोनों देशों की नौसेनाओं की रणनीतिक नाकेबंदी के कारण वाणिज्यिक जहाजों का यहां सुरक्षित गुजरना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। हाल के दिनों में कई मर्चेंट शिप्स यहां मिसाइल हमलों का शिकार हुए हैं या समुद्री बारूदी सुरंगों से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं।

2. क्यों बार-बार निशाना बन रहे हैं भारतीय नाविक?
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार और समुद्री विशेषज्ञ अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि जब भारत इनमें से किसी भी युद्ध या संघर्ष का हिस्सा नहीं है—भारत के संबंध अरब देशों, इज़राइल, रूस, यूक्रेन और पश्चिमी शक्तियों सभी के साथ संतुलित हैं—तो फिर भारतीय नाविक (Indian Seafarers) क्यों इन हमलों की चपेट में आ रहे हैं?
इसके पीछे कोई कूटनीतिक दुश्मनी नहीं, बल्कि वैश्विक मर्चेंट नेवी की डेमोग्राफी और परिचालन संरचना (Operational Structure) है:
क) वैश्विक मर्चेंट नेवी में भारत का दबदबा
दुनिया भर के व्यापारिक जहाजों को चलाने में भारतीय नाविकों की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और नौवहन आंकड़ों के अनुसार:
- वैश्विक मर्चेंट शिपिंग क्रू (Merchant Shipping Crew) में भारत का हिस्सा लगभग 10% से 12% है।
- भारत दुनिया भर में सीफॉयर्स (Seafarers) की आपूर्ति करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है।
- तेल टैंकरों (Oil Tankers), बल्क कैरियरों और कंटेनर जहाजों पर कैप्टन से लेकर क्रू मेंबर, इंजीनियर और तकनीशियनों तक के पदों पर भारतीय नाविक बड़ी संख्या में तैनात हैं।
सीधा गणित यह है: दुनिया के किसी भी कोने में अगर किसी कमर्शियल शिप पर मिसाइल या ड्रोन हमला होता है, तो इस बात की संभावना 80% से अधिक होती है कि उस जहाज के क्रू में कम से कम कुछ या पूरा स्टाफ भारतीय होगा।
ख) ‘फ्लैग ऑफ कंविनियंस’ (Flag of Convenience) का खेल
दुनिया भर में अधिकतर कार्गो और ऑयल टैंकर उन झंडों (जैसे पनामा, लाइबेरिया, मार्शल आइलैंड्स) के तहत पंजीकृत (Registered) होते हैं, जिन्हें ‘फ्लैग ऑफ कंविनियंस’ कहा जाता है।
- जहाज का मालिक किसी एक देश का हो सकता है (उदा. ग्रीस या अमेरिका)।
- जहाज पर फहराने वाला झंडा किसी तीसरे देश का (उदा. पनामा)।
- जहाज पर काम करने वाला क्रू चौथे देश का (उदा. भारत या फिलीपींस)।
जब हुती विद्रोही या युद्धरत देश किसी जहाज को अपनी रडार पर ‘दुश्मन से जुड़ा’ मानकर मिसाइल दागते हैं, तो मिसाइल यह नहीं देखती कि जहाज के अंदर किस देश का नागरिक काम कर रहा है। हमले का सीधा शिकार वे बेकसूर नाविक बनते हैं, जो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रहे होते हैं।
ग) गलत पहचान (Target Misidentification)
हुती विद्रोहियों या ब्लैक सी में इस्तेमाल की जाने वाली मिसाइलों और ड्रोन की गाइडेड प्रणाली कई बार सटीक जानकारी पर आधारित नहीं होती। पुराने आंकड़ों या गलत इंटेलिजेंस के आधार पर वे ऐसे तटस्थ (Neutral) जहाजों पर हमला कर देते हैं, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता।
3. जान हथेली पर रखकर क्यों काम कर रहे हैं सीफॉयर्स?
इतने भीषण खतरे, मिसाइल हमलों और अपहरण की धमकियों के बावजूद भारतीय नाविक इन खतरनाक रास्तों पर जाने के लिए मजबूर क्यों हैं?
- कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें और पेशेवर प्रतिबद्धता: मर्चेंट नेवी में सीफॉयर्स 4 से 9 महीने के सख्त कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं। जब जहाज समुद्र में होता है, तो रूट तय करना शिपिंग कंपनी (Ship Management Company) और चार्टरर का काम होता है। क्रू मेंबर अपनी मर्जी से बीच समुद्र में जहाज छोड़कर नहीं उतर सकते।
- आर्थिक दबाव और रोजगार: मर्चेंट नेवी में काम करने वाले कई युवा भारत के मध्यवर्गीय या ग्रामीण परिवारों से आते हैं। अच्छी सैलरी और करियर की खातिर वे इस जोखिम भरे पेशे को चुनते हैं। हालांकि अब IMO और अंतर्राष्ट्रीय परिवहन श्रमिक महासंघ (ITF) ने ‘हाई रिस्क एरिया’ (High-Risk Area) में जाने पर नाविकों को जहाज पर न जाने का अधिकार (Right to Refuse) और दोगुना वेतन (Bonus Pay) देने का प्रावधान किया है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर करियर और नौकरी बचाने का दबाव उन्हें जोखिम उठाने पर मजबूर कर देता है।
4. भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर असर
अगर यह ‘डेथ रूट’ इसी तरह सुलगता रहा, तो इसका असर केवल नाविकों की जान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम भारतीय नागरिक की जेब और देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है:
- कच्चे तेल की आपूर्ति: भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज और रेड सी के रास्ते आता है।
- सप्लाई चेन में देरी: स्वेज नहर के बजाय अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से जहाजों को मोड़ना पड़ रहा है, जिससे ईंधन की खपत बढ़ रही है और डिलीवरी में 10 से 15 दिनों की देरी हो रही है।
5. राहत और सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
इस संकट से निपटने और अपने नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार और भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने अभूतपूर्व कदम उठाए हैं:
- ऑपरेशन संकल्प (Operation Sankalp): भारतीय नौसेना ने अरब सागर, ओमान की खाड़ी और लाल सागर के करीब अपने गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स (युद्धपोत) तैनात किए हैं। भारतीय नौसेना ने कई मौकों पर सोमाली समुद्री डाकुओं के हमलों को नाकाम किया है और हुती मिसाइल हमलों के शिकार हुए जहाजों से भारतीय व विदेशी क्रू को सुरक्षित निकाला है।
- विदेश मंत्रालय और DG Shipping की गाइडलाइंस: भारत का महानिदेशालय नौवहन (DG Shipping) लगातार शिपिंग कंपनियों के संपर्क में है और संवेदनशील जलक्षेत्रों में भारतीय क्रू की सुरक्षा के लिए कड़े मानक जारी कर रहा है।
निष्कर्ष: युद्ध रोकने और कूटनीति की सख्त जरूरत
समुद्र में उठती ये मिसाइलें सिर्फ जहाजों को नहीं जला रही हैं, बल्कि उन हजारों परिवारों की उम्मीदों को राख कर रही हैं, जिनके बच्चे, पति और पिता दूर समंदर में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।
भारतीय नाविक न तो किसी देश के सैनिक हैं और न ही किसी युद्ध का हिस्सा। वे वैश्विक अर्थव्यवस्था के वो ‘अदृश्य नायक’ (Unsung Heroes) हैं जो दुनिया को चलायमान रखते हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र (UN) और इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) को तुरंत एक साथ आकर वाणिज्यिक जलमार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी और निर्दोष सीफॉयर्स को इस वैश्विक संघर्ष का बलि का बकरा बनने से रोकना होगा।
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