दक्षिण भारतीय सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री अनुपमा परमेश्वरन ने हाल ही में अपने जीवन से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और दर्दनाक अनुभव को साझा किया है। ‘प्रेमम’, ‘कार्तिकेय 2’ और ‘तिल्लू स्क्वायर’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में अपनी सशक्त अदाकारी से दर्शकों का दिल जीतने वाली अनुपमा ने मासिक धर्म यानी पीरियड (Period) से जुड़े सामाजिक ढोंग, रूढ़िवादिता और परिवार या समाज द्वारा मिलने वाले मानसिक तानों पर खुलकर अपनी बात रखी है। अनुपमा का यह बयान सोशल मीडिया और सिनेमा जगत में काफी चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि उन्होंने उस विषय पर अपनी आवाज उठाई है जिस पर आज भी हमारे समाज में खुलकर बात करने से परहेज किया जाता है।
मासिक धर्म को लेकर समाज की सोच पर उठाया सवाल
एक साक्षात्कार के दौरान अनुपमा परमेश्वरन ने बताया कि कैसे जब वे छोटी थीं या अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब मासिक धर्म के दिनों में उन्हें अजीब और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में पीरियड्स को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानने के बजाय इसे ‘अशुद्धता’ या ‘पाप’ की तरह देखा जाता है।
अनुपमा ने दर्द जताते हुए कहा, “जब हर महीने मुझे मासिक धर्म होता था, तो लोग जिस तरह से व्यवहार करते थे और जो बातें कहते थे, उससे मेरा दिल पूरी तरह टूट जाता था। मुझे ऐसा महसूस कराया जाता था मानो मैंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। एक समय तो ऐसा आ गया था जब मुझे खुद के औरत होने पर घिन आने लगी थी। मुझे लगता था कि भगवान ने महिलाओं को यह दर्द और यह समाज का तिरस्कार सहने के लिए ही क्यों बनाया है?”
रसोई से दूरी और ‘अछूत’ जैसा व्यवहार
अभिनेत्री ने उन रीति-रिवाजों और बंदिशों का भी जिक्र किया जो आज भी कई घरों में पीरियड्स के दौरान महिलाओं पर थोपी जाती हैं। अनुपमा ने बताया कि इन विशेष दिनों में लड़कियों को अलग-थलग कर दिया जाता है। उन्हें मंदिर जाने, रसोई में प्रवेश करने या अपनों को छूने तक की मनाही होती है।
उन्होंने साझा किया कि जब एक छोटी उम्र की लड़की इस तरह के व्यवहार से गुजरती है, तो उसके बाल-मन पर इसका गहरा और नकारात्मक असर पड़ता है। जब परिवार के लोग ही उसे ‘अशुद्ध’ समझने लगते हैं और अजीब तानें कसते हैं, तो वह मानसिक रूप से बेहद अकेला महसूस करने लगती है। अनुपमा के अनुसार, इन तानों और पाबंदियों ने उनके भीतर हीन भावना पैदा कर दी थी और वे सोचने पर मजबूर हो गई थीं कि क्या एक महिला होना वाकई में कोई अभिशाप है।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है गहरा प्रभाव
अनुपमा परमेश्वरन ने इस बात पर जोर दिया कि पीरियड्स केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इस दौरान महिलाओं को हार्मोनल बदलावों के कारण मूड स्विंग्स और गंभीर शारीरिक दर्द से भी गुजरना पड़ता है। ऐसे समय में जब महिलाओं को सहानुभूति, प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब उन्हें समाज और परिवार के तानों का शिकार होना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि लोग अक्सर शारीरिक दर्द को तो समझ लेते हैं, लेकिन मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक शर्मिंदगी (Period Shaming) से होने वाले मानसिक आघात को नजरअंदाज कर देते हैं। इस शर्मिंदगी और अकेलेपन के कारण कई लड़कियां डिप्रेशन और एंग्जायटी का शिकार हो जाती हैं।
फैंस और समाज से मिला भारी समर्थन
अनुपमा परमेश्वरन के इस साहसिक बयान की सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ हो रही है। उनके फैंस और कई अन्य महिलाओं ने उनके इस बयान पर अपनी सहमति जताई है। लोगों का कहना है कि एक प्रसिद्ध अभिनेत्री का इस विषय पर सार्वजनिक रूप से बोलना बेहद सराहनीय है, क्योंकि इससे उन लाखों लड़कियों को हिम्मत मिलेगी जो आज भी बंद कमरों में पीरियड्स से जुड़े तानों और शर्मिंदगी को चुपचाप सहन कर रही हैं।
अनुपमा के इस बयान ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि 21वीं सदी में भी हम अपनी सोच में कितने पीछे हैं। यदि हम वास्तव में एक प्रगतिशील समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें महिलाओं की सेहत और उनकी प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रियाओं को सम्मान की नजर से देखना होगा, न कि उन्हें शर्मिंदा करना होगा।
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