भारत की न्याय व्यवस्था में “तारीख पर तारीख” का सिलसिला दशकों से चर्चा का विषय रहा है। देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों तक पहुंच चुका है। ऐसे में गंभीर और संवेदनशील अपराधों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast-Track Courts – FTCs) और फ़ास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) की स्थापना की गई थी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये अदालतें वाकई अपने नाम के मुताबिक तेज़ी से मामले निपटाती हैं? और ये आम सिविल या सेशन अदालतों से प्रक्रिया और संरचना में कैसे अलग होती हैं?
फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट क्या हैं और इनकी शुरुआत क्यों हुई?
फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट विशेष रूप से गठित की गई वे अदालतें हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य किसी खास श्रेणी के गंभीर मुकदमों की सुनवाई तय सीमा के भीतर पूरी करना होता है।
भारत में फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की संकल्पना 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद वर्ष 2000 में लागू की गई थी। इसके बाद वर्ष 2012 के निर्भया कांड और 2018 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम के बाद पोक्सो (POCSO) और बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों के लिए विशेष फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट (FTSCs) का नेटवर्क और मजबूत किया गया।
इन अदालतों का गठन उन मामलों को प्राथमिकता देने के लिए किया जाता है, जहाँ पीड़ित को तुरंत राहत की आवश्यकता होती है या जहाँ समाज पर अपराध का गहरा असर पड़ता है—जैसे यौन अपराध, भ्रष्टाचार, बच्चों के खिलाफ हिंसा, और हाल ही में चर्चा में आए पेपर लीक से जुड़े मामले।
आम अदालतों से कैसे अलग होती हैं फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें?
आम सत्र न्यायालयों (Session Courts) और फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट के बीच कार्यप्रणाली से लेकर बुनियादी ढांचे तक कई प्रमुख अंतर हैं:
| पहलू | आम अदालतें (Regular Courts) | फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast-Track Courts) |
| मुकदमों का दायरा | हर तरह के दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) मामले। | किसी विशिष्ट अपराध या कानून (जैसे POCSO, यौन हिंसा, वित्तीय धोखाधड़ी) पर केंद्रित। |
| सुनवाई का तरीका | एक ही जज के पास सैकड़ों विविध केस सूचीबद्ध होते हैं। | चुनिंदा केस होते हैं, जिससे हर दिन या निरंतर (Day-to-Day) सुनवाई संभव होती है। |
| समय सीमा (Timelines) | प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण मामलों में वर्षों लग जाते हैं। | कानूनन तय समयसीमा (जैसे 1 साल के भीतर ट्रायल पूरा करना) का लक्ष्य। |
| स्थगन (Adjournments) | वकीलों और गवाहों के न आने पर आसानी से अगली तारीख मिल जाती है। | बेवजह की तारीखें देने पर सख्त पाबंदी होती है। |
| विशेष ढांचा | सामान्य पुलिस और जांच एजेंसियों पर निर्भरता। | विशेष लोक अभियोजक (Special Prosecutors) और प्राथमिकता वाली फोरेंसिक जांच। |
क्या वाकई तेज़ी से निपटते हैं केस? डेटा और वास्तविकता
यदि डेटा की बात करें, तो आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें सामान्य अदालतों की तुलना में काफी तेज़ी से मामलों का निस्तारण करती हैं।
- निपटारे की दर (Disposal Speed): विधि मंत्रालय और न्याय विभाग के आंकड़ों के अनुसार, एक फ़ास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट औसतन प्रति माह 9 से 10 मामलों का निपटारा करता है, जबकि उसी स्तर की आम सत्र अदालतें प्रति माह औसतन 3 से 4 केस ही निपटा पाती हैं।
- कुल मामले: वर्ष 2019 में लॉन्च की गई फ़ास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के तहत देश भर में 770 से अधिक अदालतें काम कर रही हैं, जिन्होंने अब तक 3.66 लाख से अधिक संवेदनशील मामलों का निपटारा किया है।
क्या है जमीनी चुनौती?
यद्यपि निपटारे की रफ्तार बेहतर है, लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि ये अदालतें पूरी तरह से रुकावटों से मुक्त हैं। संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, FTSCs में अभी भी 2.45 लाख से अधिक मामले लंबित हैं।
इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:
- नए मामलों की भारी संख्या: अकेले वर्ष 2025 में FTSCs में लगभग 1.43 लाख नए मामले दर्ज हुए, जबकि निपटारा लगभग 66,500 मामलों का ही हो पाया।
- गवाहों और फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी: अदालतें कितनी भी तेज़ी से काम करना चाहें, यदि डीएनए (DNA) रिपोर्ट या मेडिकल साक्ष्य फोरेंसिक लैब से समय पर नहीं आते, या गवाह मुकर जाते हैं, तो सुनवाई टालनी ही पड़ती है।
- न्यायाधीशों और कर्मचारियों की कमी: राज्यों और उच्च न्यायालयों के स्तर पर रिक्त पदों को भरने में होने वाली देरी से फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की गति धीमी पड़ जाती है।
त्वरित न्याय की राह में आगे का रास्ता
फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें आम अदालतों की तुलना में निस्संदेह बेहतर और तेज़ परिणाम दे रही हैं। हालाँकि, सिर्फ अलग कोर्ट बना देना ही काफी नहीं है; जब तक पुलिस जांच, फोरेंसिक लैब की संख्या और न्यायिक रिक्तियों को समय पर पूरा नहीं किया जाएगा, तब तक ‘त्वरित न्याय’ का सपना पूरी तरह साकार होना मुश्किल है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद, पीड़ित महिलाओं और बच्चों के लिए ये अदालतें एक उम्मीद की किरण साबित हुई हैं, जहाँ मुकदमों को दशकों तक लटकने से बचाया जा सका है।
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