‘बच्चा गलती करे तो करे, लेकिन…’ – सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने क्यों कही यह बड़ी बात? पढ़ें पूरा मामला

नई दिल्ली: बच्चों के पालन-पोषण, उनकी मानसिक स्थिति और समाज में उनकी गलतियों को देखने का नजरिया क्या होना चाहिए? इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणी की है। जस्टिस नागरत्ना की इस गंभीर और संवेदनशील टिप्पणी ने देश भर में बच्चों की सुरक्षा, कानूनी ढांचे और माता-पिता के साथ-साथ समाज की जिम्मेदारियों को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

अदालत में एक संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि “बच्चा अगर गलती करे तो करे, लेकिन उसे सुधारने और सही दिशा दिखाने का काम वयस्कों और समाज का है। बच्चों की किसी भी भूल के लिए उन्हें सीधे तौर पर अपराधी ठहरा देना या उनके साथ कठोरता से पेश आना किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं है।”

क्या है पूरा मामला और जस्टिस नागरत्ना का रुख?

सुप्रीम कोर्ट में यह टिप्पणी बच्चों के अधिकारों और ‘बाल न्याय अधिनियम’ (Juvenile Justice Act) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। अदालत में अक्सर ऐसे मामले आते हैं जहाँ नाबालिगों द्वारा किए गए अपराधों या गलतियों पर कानूनी रुख तय करना होता है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वयस्क और बच्चा—दोनों के मानसिक और भावनात्मक स्तर में जमीन-आसमान का अंतर होता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा:

“एक बच्चा अपनी उम्र, नासमझी या सही मार्गदर्शन के अभाव में गलती कर सकता है। गलतियाँ करना बचपन का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन हमारा कानून और समाज इस तरह से तैयार होना चाहिए कि हम बच्चे को उसकी गलती से सीखने और सुधरने का अवसर दें, न कि उसका भविष्य हमेशा के लिए अंधकारमय बना दें।”

जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर विशेष बल दिया कि समाज की आपराधिक प्रवृत्ति या कठोर रवैये का शिकार बच्चों को नहीं होना चाहिए। कानून का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उनका ‘पुनर्वास’ (Rehabilitation) और सुधार करना होना चाहिए।

बाल न्याय (Juvenile Justice) और समाज की दोहरी जिम्मेदारी

भारत के संविधान और भारतीय कानूनी व्यवस्था में बच्चों के अधिकारों को हमेशा से प्राथमिकता दी गई है। हालांकि, बदलते दौर में सोशल मीडिया, तकनीकी प्रभाव और पारिवारिक विघटन के कारण किशोरों में अपराध या भटकाव की प्रवृत्ति बढ़ी है।

इस परिस्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी यह रेखांकित करती है कि जब भी कोई नाबालिग किसी गलत रास्ते पर जाता है, तो उसमें उसकी अपनी समझ से ज्यादा समाज, परिवार और माहौल की नाकामी होती है।

1. परिवार की भूमिका:

माता-पिता और अभिभावकों की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समय रहते पहचानें। बच्चों को सिर्फ पाबंदियों में बांधने के बजाय उनके साथ संवाद (Communication) स्थापित करना जरूरी है।

2. शिक्षण संस्थानों का दायित्व:

स्कूल और कॉलेज केवल किताबी ज्ञान देने की जगह नहीं हैं। वे बच्चों के नैतिक और मानसिक चरित्र का निर्माण करते हैं। स्कूलों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता होना बेहद अनिवार्य है।

3. कानून और पुलिस का रवैया:

जब कोई बच्चा कानून के दायरे में आता है, तो पुलिस और कानूनी तंत्र को संवेदनशील होना चाहिए। जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड की भूमिका यह सुनिश्चित करने की है कि बच्चे को एक अपराधी की तरह नहीं, बल्कि एक सुधार के योग्य नागरिक की तरह देखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के मुख्य मायने

जस्टिस बीवी नागरत्ना की इस टिप्पणी को यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो इसके तीन प्रमुख संदेश सामने आते हैं:

  1. संवेदनशीलता बनाम कठोरता: बच्चों के साथ पेश आते समय कानून की किताबों का सख्ती से पालन करने से ज्यादा मानवीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
  2. सुधार का अवसर: हर बच्चे के पास अपने अतीत से बाहर निकलकर एक बेहतर भविष्य बनाने का मौलिक अधिकार है। यदि समाज उसे शुरुआती चरण में ही ‘अपराधी’ का ठप्पा (Stigma) लगा देगा, तो वह कभी मुख्यधारा में वापस नहीं लौट पाएगा।
  3. वयस्कों की जवाबदेही: अगर कोई बच्चा गलत कदम उठाता है, तो समाज के वयस्कों को स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए कि वे बच्चे को सही मार्गदर्शन देने में कहाँ चूक गए।

बचपन को बचाने और संवारने के लिए क्या जरूरी है?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने न केवल अदालतों बल्कि आम जनता, शिक्षकों और नीति निर्माताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। बच्चों को एक सुरक्षित और सकारात्मक माहौल देने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं:

  • मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान: बच्चों पर पढ़ाई, प्रतियोगिता और अपेक्षाओं का अत्यधिक दबाव उन्हें आक्रामक या दिग्भ्रमित बना देता है। उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण: जब बच्चा कोई भूल करे, तो उसे डांटने या सजा देने से पहले गलती के पीछे के कारण को समझना आवश्यक है।
  • सशक्त बाल संरक्षण प्रणाली: देश में बाल सुधार गृहों (Observation Homes) की स्थिति में सुधार किया जाना चाहिए ताकि वे वास्तव में ‘सुधार गृह’ बन सकें, न कि अपराध का नया अड्डा।

जस्टिस बीवी नागरत्ना के ये शब्द केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं हैं, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक दर्पण हैं। ‘बच्चा गलती करे तो करे’ का अर्थ यह कतई नहीं है कि गलतियों को बढ़ावा दिया जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि बच्चों की नासमझी और गलतियों को संभालने के लिए वयस्कों में धैर्य, समझदारी और सहानुभूति होनी चाहिए।

यदि हम एक सुरक्षित, न्यायप्रिय और समृद्ध समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने बच्चों को गलतियों पर डराने के बजाय उन्हें सही और गलत का अंतर सिखाते हुए हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना होगा।

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  • Rahul Kaushik

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