ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स के इस दौर में अपराध और थ्रिलर पर आधारित वेब सीरीज की एक लंबी फेहरिस्त देखने को मिलती है, लेकिन ‘ऑटो शंकर’ (Auto Shankar) एक ऐसी सीरीज है जो मनोरंजन के साथ-साथ रोंगटे खड़े कर देने वाले खौफनाक अहसास से भर देती है। साल 2019 में जी5 (ZEE5) पर रिलीज हुई यह तमिल क्राइम-थ्रिलर वेब सीरीज केवल एक काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे दुर्दांत और कुख्यात धारावाहिक हत्यारों (Serial Killers) में से एक, गौरी शंकर उर्फ ‘ऑटो शंकर’ के वास्तविक जीवन और उसके द्वारा किए गए रोंगटे खड़े कर देने वाले अपराधों पर आधारित है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में मद्रास (अब चेन्नई) की गलियों में फैले इस खौफ ने पूरे शासन-प्रशासन, पुलिस और आम जनता को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था।
यह वेब सीरीज न केवल एक अपराधी के बनने और उसके दुस्साहस की दास्तान पेश करती है, बल्कि यह उस दौर के राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने, पुलिस तंत्र में फैली साठगांठ और जरायम की दुनिया के उस घिनौने सच को उधेड़ कर रख देती है, जिसे सामान्य तौर पर अनदेखा कर दिया जाता है।
कौन था ऑटो शंकर? ऑटो चालक से खूंखार गैंगस्टर बनने का सफर
कहानी की शुरुआत होती है एक साधारण ऑटो रिक्शा चालक गौरी शंकर से, जो मूल रूप से एक साधारण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता था। चेन्नई के थिरुवनमियुर इलाके में ऑटो चलाकर जीवन यापन करने वाला यह व्यक्ति बेहद महत्वाकांक्षी, चालाक और निर्दयी स्वभाव का था। 1980 के दशक में मद्रास शहर तेज़ी से बदल रहा था और इसी बदलाव के बीच अवैध शराब की तस्करी, वेश्यावृत्ति और नशीले पदार्थों का धंधा फल-फूल रहा था।
शंकर ने बहुत जल्दी यह भांप लिया कि केवल ईमानदारी से ऑटो चलाकर बड़ी रकम नहीं कमाई जा सकती। उसने अवैध शराब की बिक्री से अपने काले साम्राज्य की नींव रखी। धीरे-धीरे उसने स्थानीय पुलिस और प्रभावशालियों को पैसे तथा अन्य सुविधाओं के बल पर अपनी जेब में कर लिया। पुलिस और नेताओं के संरक्षण के कारण शंकर का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वह खुद को कानून से ऊपर समझने लगा। कुछ ही वर्षों में वह महज़ एक ऑटो चालक से पूरे इलाके का बेताज बादशाह बन बैठा, जिसे लोग ‘ऑटो शंकर’ के नाम से जानने लगे।
वेब सीरीज का ताना-बाना और खौफनाक वारदातें
वेब सीरीज ‘ऑटो शंकर’ में निर्देशक रंगा ने 80 के दशक के मद्रास के माहौल को बहुत ही यथार्थवादी और प्रामाणिक तरीके से पर्दे पर उतारा है। सीरीज में मुख्य भूमिका अभिनेता अप्पानी सरत (Appani Sarath) ने निभाई है। उनके सशक्त और जीवंत अभिनय ने ऑटो शंकर के किरदार में फूंक दी है। उनके चेहरे की क्रूरता, चाल-ढाल और संवाद अदायगी दर्शकों के मन में एक गहरा डर पैदा करती है।
सीरीज में यह दिखाया गया है कि कैसे शंकर और उसके गिरोह ने एक के बाद एक कई जघन्य अपराधों को अंजाम दिया। जब भी कोई व्यक्ति उसके रास्ते में रोड़ा बनता, या उसके अवैध धंधों की जानकारी बाहर निकालने की कोशिश करता, तो शंकर बेहद बेरहमी से उसे ठिकाने लगा देता था।
1988 के आसपास, शंकर ने अपने विरोधियों और अपने धंधे से जुड़े उन लोगों की हत्याएं शुरू कर दीं, जिन पर उसे गद्दारी का शक था। सबसे खौफनाक बात यह थी कि हत्या करने के बाद लाशों को छिपाने के लिए वह उन्हें अपने ही घर के अंदर या अपने सहयोगियों के ठिकानों पर जलाकर दफना देता था और दीवारों में चिनवा देता था। इन जघन्य वारदातों के कारण पूरा शहर दहशत के साए में जीने को मजबूर हो गया था।
प्रशासन और पुलिस के साथ साठगांठ का कड़वा सच
‘ऑटो शंकर’ केवल एक हत्यारे की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भ्रष्ट तंत्र की परतें भी खोलती है जो ऐसे अपराधियों को जन्म देता है और उन्हें पनपने का मौका देता है। सीरीज में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि शंकर का साम्राज्य तब तक कायम रहा जब तक उसे खाकी वर्दी और राजनीतिक ताकतों का पूरा समर्थन प्राप्त था।
अवैध शराब के अड्डों से मिलने वाले मोटे कमीशन ने कई पुलिस अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। जब भी शंकर के खिलाफ कोई शिकायत आती, उसे दबा दिया जाता था। यही कारण था कि कई सालों तक उसके द्वारा की जा रही हत्याओं की भनक तक किसी को नहीं लगी। सीरीज का यह पहलू दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली अपराधी केवल बंदूक या चाकू थामने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि उसे शह देने वाला भ्रष्ट तंत्र भी उतना ही जिम्मेदार होता है।
अपराध का अंत और न्याय की लड़ाई
हर काले साम्राज्य का अंत तय होता है और ऑटो शंकर के मामले में भी यही हुआ। जब एक के बाद एक कई लोग रहस्यमयी तरीके से गायब होने लगे, तो एक निडर और ईमानदार पुलिस अधिकारी ने इस मामले की तह तक जाने का फैसला किया। लापता लोगों की जांच करते-करते पुलिस की सुई ऑटो शंकर और उसके सहयोगियों पर जाकर टिकी।
जब पुलिस ने शंकर के ठिकाने पर छापेमारी की और जांच आगे बढ़ाई, तो जो सच निकलकर सामने आया उसने जांच अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए। घर की दीवारों और फर्श के नीचे से कई नरकंकाल बरामद हुए। इस खुलासे ने न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था में तूफान ला दिया।
शंकर और उसके साथियों पर मुकदमा चला। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, अदालत ने उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराधों और समाज के प्रति उसके खतरे को देखते हुए उसे मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई। अप्रैल 1995 में सेलम सेंट्रल जेल में ऑटो शंकर को फांसी पर लटका दिया गया।
तकनीकी पहलू, सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर
सीरीज की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रामाणिकता (Authenticity) है। 1980 के दशक के मद्रास को री-क्रिएट करने के लिए आर्ट डायरेक्शन और सिनेमैटोग्राफी पर काफी बारीकी से काम किया गया है। उस दौर की गाड़ियां, पहनावा, सिनेमा हॉल के पोस्टर और गलियों का माहौल दर्शक को सीधे उसी दौर में ले जाता है।
सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक सस्पेंस और थ्रिल को कई गुना बढ़ा देता है। क्रूर दृश्यों को जिस तरह से बिना किसी हिचकिचाहट के दिखाया गया है, वह इसे एक डार्क और सीरियस क्राइम ड्रामा बनाता है। संवेदनशील दर्शकों के लिए कुछ दृश्य बेहद विचलित करने वाले हो सकते हैं, लेकिन कहानी की सच्चाई को बयां करने के लिए यह आवश्यक लगता है।
क्राइम-थ्रिलर प्रेमियों के लिए एक मस्ट-वॉच सीरीज
‘ऑटो शंकर’ केवल एक वेब सीरीज नहीं है, बल्कि यह समाज के उस काले सच का आईना है जो हमें चेतावनी देता है कि कैसे अपराध और भ्रष्टाचार मिलकर आम लोगों की जिंदगी को नरक बना सकते हैं। यदि आप सच्ची घटनाओं, क्राइम इंवेस्टिगेशन और थ्रिलर कंटेंट के शौकीन हैं, तो ‘ऑटो शंकर’ आपको शुरू से अंत तक बांधे रखने का मद्दा रखती है। यह सीरीज यह साबित करती है कि कभी-कभी हकीकत, किसी भी काल्पनिक कहानी से कहीं ज्यादा भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाली होती है।
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