डिजिटल इंडिया के विजन और भारत के वित्तीय तंत्र की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के संदर्भ में एक बड़ा नीतिगत और रणनीतिक फैसला सामने आ रहा है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और बैंकिंग जगत में चल रही उच्चस्तरीय वार्ताओं के अनुसार, पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की व्यवस्था को अब 15 अक्टूबर 2026 की जगह 1 जनवरी 2027 से लागू किया जा सकता है।
व्यापारी संगठनों, फिनटेक कंपनियों और पेमेंट एग्रीगेटर मंचों से मिले सुझावों और त्योहारों के आगामी सीजन (Festive Season) के दौरान डिजिटल लेन-देन में होने वाली भारी वृद्धि को देखते हुए इस समयसीमा के विस्तार पर विचार किया जा रहा है। डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के लिए यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एमडीआर (MDR) क्या है और यह क्यों चर्चा में है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate) वह शुल्क होता है जो कोई व्यापारी (Merchant) अपने ग्राहकों से डिजिटल या कार्ड-आधारित भुगतान स्वीकार करने के बदले में सर्विस प्रोवाइडर बैंकों और पेमेंट्स कंपनियों को देता है। जब भी आप किसी दुकान या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर डिजिटल माध्यम से पैसे चुकाते हैं, तो उस ट्रांजेक्शन को सुरक्षित और सुचारू रूप से प्रोसेस करने में शामिल पेमेंट गेटवे, बैंक और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का कुछ खर्च होता है। इसी खर्च की भरपाई एमडीआर के जरिए की जाती है।
वर्ष 2020 में भारत सरकार ने डिजिटल भुगतानों को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने और छोटे-बड़े व्यापारियों को यूपीआई अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से रूपे (RuPay) डेबिट कार्ड और यूपीआई पर शून्य-एमडीआर (Zero-MDR) नीति लागू की थी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई का दायरा असाधारण रूप से बढ़ा है, जिससे पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (PSPs), फिनटेक स्टार्टअप्स और बैंकों पर इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत तथा सर्वर सुरक्षा का भारी बोझ पड़ा है। इस वित्तीय दबाव को संतुलित करने और डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को दीर्घकालिक स्थिरता देने के लिए नए एमडीआर ढांचे को तैयार किया गया है।
प्रस्तावित एमडीआर ढांचा (Proposed MDR Framework): दरें और सीमाएं
एनपीसीआई द्वारा रेखांकित नए एमडीआर ढांचे के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- ₹2,000 से अधिक के ट्रांजेक्शन पर शुल्क: प्रस्तावित नियमों के तहत केवल ₹2,000 से अधिक राशि वाले व्यक्ति-से-व्यापारी (Person-to-Merchant – P2M) भुगतान पर ही एमडीआर लागू करने की सिफारिश की गई है।
- 0.4% की मानक दर: ऐसे बड़े भुगतानों पर अधिकतम 0.4% (40 बेसिस पॉइंट्स) की दर से एमडीआर लिया जाएगा।
- कैपिंग (अधिकतम सीमा): व्यापारियों पर अत्यधिक वित्तीय बोझ से बचने के लिए प्रति लेन-देन शुल्क की ऊपरी सीमा ₹300 तय की गई है (जैसे ₹75,000 या उससे अधिक के भुगतानों के लिए शुल्क ₹300 पर सीमित रहेगा)।
- छोटे भुगतानों पर राहत: दैनिक उपयोग के छोटे भुगतानों (₹2,000 तक) और सामान्य पीयर-टू-पीयर (P2P – एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर) भुगतानों पर यह शुल्क पूरी तरह शून्य रहेगा।
रोलआउट (Rollout) को स्थगित करने के प्रमुख कारण
15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस फैसले को जनवरी 2027 तक टालने के पीछे मुख्यतः तीन प्रमुख आर्थिक और तकनीकी कारण हैं:
1. त्योहारों के मौसम में व्यापार की स्थिरता
अक्टूबर से दिसंबर के बीच भारत में दिवाली, धनतेरस, छठ, गुरु नानक जयंती और नए साल जैसे प्रमुख त्योहार आते हैं, जो देश के खुदरा बाजार (Retail Market) के लिए पूरे साल का सबसे बड़ा व्यावसायिक अवसर होते हैं। इस दौरान यूपीआई के जरिए अरबों लेन-देन होते हैं। त्योहारों के ठीक बीच में नया शुल्क ढांचा लागू करने से मर्चेंट बिलिंग सॉफ्टवेयर अपडेट करने और तकनीकी एकीकरण (Technical Integration) में रुकावट आ सकती थी, जिससे व्यापार प्रभावित होने का डर था।
2. बैंकों और फिनटेक कंपनियों के बीच राजस्व का बंटवारा (Revenue Sharing)
एमडीआर लागू होने के बाद उससे मिलने वाले राजस्व का बैंकों, पेमेंट एग्रीगेटर्स (Payment Aggregators) और यूपीआई ऐप डेवलपर्स के बीच किस अनुपात में बंटवारा होगा, इस पर अभी भी बातचीत जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, पेमेंट एग्रीगेटर अपनी हिस्सेदारी को 50% से 80% के बीच रखने के लिए बैंकों से बातचीत कर रहे हैं। इस शेयरिंग मॉडल को स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता महसूस की गई।
3. तकनीकी तैयारी और सिस्टम ऑडिट
देश भर में लाखों छोटे और बड़े व्यापारियों के प्वाइंट ऑफ सेल (PoS) डिवाइसेज, साउंडबॉक्स और बिलिंग सॉफ्टवेयर को नए टैक्स/शुल्क ढांचे के अनुसार अपडेट करना एक बड़ा जटिल कार्य है। फिनटेक क्षेत्र ने एनपीसीआई से अनुरोध किया कि वे इस बदलाव को सुचारू रूप से लागू करने के लिए समयसीमा में विस्तार करें।
विभिन्न वर्गों पर संभावित प्रभाव
| वर्ग | प्रभाव विश्लेषण |
| आम उपभोक्ता (Consumers) | कोई सीधा प्रभाव नहीं: एमडीआर का भुगतान व्यापारी करते हैं, ग्राहक नहीं। ₹2,000 से कम के दैनिक भुगतानों और पीयर-टू-पीयर ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। |
| व्यापारी (Merchants) | मिश्रित प्रभाव: ₹2,000 से ऊपर के बड़े लेन-देन स्वीकार करने पर 0.4% का शुल्क देना होगा। हालांकि जनवरी 2027 तक का समय मिलने से त्योहारों के दौरान किसी अतिरिक्त लागत से राहत मिली है। |
| बैंक और फिनटेक कंपनियां | सकारात्मक वित्तीय सुधार: एमडीआर की बहाली से डिजिटल पेमेंट्स सेक्टर में राजस्व मॉडल मजबूत होगा, जिससे कंपनियां अपने सर्वर और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर में अधिक निवेश कर सकेंगी। |
सुप्रीम कोर्ट का रुख और नीतिगत स्पष्टता
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए विशिष्ट मर्चेंट लेन-देन पर एमडीआर लगाने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत के इस रुख ने साफ कर दिया कि वित्तीय तंत्र को आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाए रखने के लिए यह शुल्क न्यायोचित है।
जनवरी 2027 तक यूपीआई पर एमडीआर के अमल को स्थगित करना सरकार और एनपीसीआई का एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है। इससे एक तरफ जहां व्यापारियों को त्योहारों के व्यस्त सीजन में राहत मिली है, वहीं फिनटेक सेक्टर को अपने सिस्टम्स को सुदृढ़ और तैयार करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा। भारत में डिजिटल पेमेंट्स की क्रांति अब एक परिपक्व चरण में प्रवेश कर रही है, जहां सुविधाओं के साथ-साथ सिस्टम की आत्मनिर्भरता और वित्तीय स्थिरता को समान प्राथमिकता दी जा रही है।
यह भी पढ़ें: ‘मरते-मरते भी मुझे परेशान कर गया’, नाना पाटेकर के निधन पर बोलीं तनुश्री दत्ता; भड़के फैन्स ने दिया करारा जवाब