केरल ने खोया अपना सांस्कृतिक दीप: सूर्या कृष्णमूर्ति का निधन

केरलीय कला, संस्कृति और वैश्विक मंचों पर भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाले महान सांस्कृतिक पुरोधा, रंगकर्मी और मीडिया व्यक्तित्व ‘सूर्या कृष्णमूर्ति’ (Soorya Krishnamoorthy) के निधन से संपूर्ण देश और विशेष रूप से केरल (केरलम) में शोक की लहर दौड़ गई है। तिरुवनंतपुरम से लेकर वैश्विक स्तर पर फैले उनके प्रशंसकों, कलाकारों और शुभचिंतकों ने इस महान आत्मा को नम आँखों से अंतिम विदाई दी। उनके जाने से भारतीय कला जगत और रंगमंच के उस स्वर्ण युग का पटाक्षेप हो गया है, जिसने शास्त्रीय और लोक कलाओं को नए आयाम दिए थे।

सूर्या कृष्णमूर्ति केवल एक व्यक्ति या संस्थापकीय नाम नहीं थे, बल्कि वे स्वयं में एक सांस्कृतिक क्रांति थे। वे तिरुवनंतपुरम स्थित प्रसिद्ध सांस्कृतिक संगठन ‘सूर्या स्टेज एंड फिल्म सोसाइटी’ (Soorya Stage and Film Society) के संस्थापक और प्राणदाता थे। यह संस्था दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठनों में से एक मानी जाती है, जिसने चार दशकों से भी अधिक समय तक भारतीय नृत्य, संगीत, नाटक और सिनेमा को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

एक वैज्ञानिक जो कला का पुजारी बन गया

सूर्या कृष्णमूर्ति का जीवन प्रतिभा, समर्पण और विविधता का एक अद्भुत उदाहरण था। बहुत कम लोग जानते हैं कि कला जगत में इतिहास रचने से पहले वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में एक कुशल वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे। महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ काम कर चुके कृष्णमूर्ति का मन अंततः विज्ञान की प्रयोगशालाओं से निकलकर कला के विशाल कैनवास की ओर मुड़ गया। उन्होंने इसरो की अपनी स्थायी और प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर अपना पूरा जीवन भारतीय संस्कृति और रंगमंच के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।

उनका मानना था कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना को जगाने, समाज को जोड़ने और भावी पीढ़ियों में नैतिक मूल्यों का संचार करने का सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने विज्ञान की सटीकता और अनुशासन को कला के संवेदन के साथ ऐसा जोड़ा कि उनके द्वारा निर्देशित हर नाटक, हर प्रकाश-ध्वनि (Light and Sound) शो और हर सांस्कृतिक महोत्सव पूर्णता और भव्यता की मिसाल बन गया।

‘सूर्या सोसाइटी’ और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक क्रांति

1970 के दशक के उत्तरार्ध में स्थापित ‘सूर्या’ (Soorya) संस्था के माध्यम से कृष्णमूर्ति ने कला के क्षेत्र में जो कार्य किया, वह अद्वितीय है। ‘सूर्या महोत्सव’ (Soorya Festival) आज विश्व का सबसे लंबा चलने वाला कला उत्सव माना जाता है, जो वर्ष के 111 दिनों तक निरंतर आयोजित होता है। इस महोत्सव ने न केवल केरल बल्कि दुनिया के करीब 40 से अधिक देशों में भारतीय कला का परचम लहराया।

कृष्णमूर्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी कला को व्यवसायीकरण के चक्रव्यूह में फंसने नहीं दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कला समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। उनके द्वारा आयोजित कई कार्यक्रम आम जनता के लिए पूरी तरह से निःशुल्क होते थे। भारत के शीर्ष शास्त्रीय नर्तकों, संगीतकारों और रंगकर्मियों के लिए ‘सूर्या’ के मंच पर प्रस्तुति देना एक अत्यंत गर्व का विषय माना जाता था। पंडित जसराज, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, डॉ. के. जे. येसुदास, मल्लिका साराभाई और पंडित बिरजू महाराज जैसे महान दिग्गज सूर्या कृष्णमूर्ति के निमंत्रण पर सहर्ष केरल आते थे।

लाइट एंड साउंड शो और रंगमंच में नवीन प्रयोग

रंगमंच और नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में सूर्या कृष्णमूर्ति के प्रयोगों ने भारतीय थिएटर को एक नई दिशा दी। उन्होंने विशालकाय ‘लाइट एंड साउंड’ शो का निर्माण किया, जिसने आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कथावाचन को एक सूत्र में पिरोया। उनके द्वारा निर्देशित कई नाटकों ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भूचाल ला दिया।

उनके नाटकों की दृश्य-श्रव्य संरचना, दृश्यों का संयोजन, प्रकाश व्यवस्था और पार्श्व संगीत इतने जीवंत होते थे कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने केरल के पारंपरिक रंगमंच ‘कथकली’, ‘मोहिनीअट्टम’ और ‘कैलरीपयट्टू’ को समकालीन नाट्य शैलियों के साथ मिलाकर ऐसे नए प्रयोग किए जिन्हें विश्व भर के नाट्य समीक्षकों ने सराहा।

सांस्कृतिक जन-आंदोलन और सादगी भरा जीवन

विशालकाय मंचों और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद सूर्या कृष्णमूर्ति का व्यक्तिगत जीवन अत्यंत साधारण और विनम्र था। वे हमेशा सफेद धोती और शर्ट में नज़र आते थे। उनके व्यक्तित्व की सौम्यता और हर किसी को अपना बना लेने की कला ने उन्हें लाखों लोगों का प्रिय बना दिया था। वे सिर्फ कलाकारों के संरक्षक नहीं थे, बल्कि युवा प्रतिभाओं के लिए एक मार्गदर्शक और पितातुल्य गुरु भी थे।

उन्होंने केरल में एक ऐसा सांस्कृतिक माहौल तैयार किया, जहाँ हर घर में कला के प्रति सम्मान की भावना जगी। राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक, और कई अंतरराष्ट्रीय निकायों ने उनके सांस्कृतिक योगदान को सराहा। उन्हें केरल संगीता नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया।

केरल का शोक और दिग्गजों की श्रद्धांजलि

सूर्या कृष्णमूर्ति के पार्थिव शरीर को जनता और प्रशंसकों के दर्शनार्थ रखा गया, जहाँ समाज के हर वर्ग के लोग उन्हें अंतिम नमन करने पहुँचे। राज्य के मुख्यमंत्री, सांस्कृतिक मंत्रियों, वरिष्ठ राजनेताओं, फिल्मी हस्तियों, शास्त्रीय कलाकारों और हज़ारों आम नागरिकों ने उनके अंतिम दर्शन कर अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की।

कला जगत की प्रसिद्ध हस्तियों ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि कृष्णमूर्ति का जाना एक ऐसे सांस्कृतिक स्तंभ का गिरना है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उन्होंने केरल को दुनिया के नक्शे पर एक ‘सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में स्थापित करने में जो भूमिका निभाई, उसे इतिहास हमेशा स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रखेगा।

एक अमर विरासत छोड़ गए कृष्णमूर्ति

सूर्या कृष्णमूर्ति भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं, उनके नाटक, उनके विचार और कला के प्रति उनका निस्वार्थ प्रेम हमेशा जीवित रहेगा। उन्होंने जो सांस्कृतिक दीप जलाया था, उसकी लौ कभी मद्धम नहीं पड़ेगी।

केरल की धरती, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ अपनी समृद्ध कला परंपराओं के लिए जानी जाती है, आज अपने इस महान पुत्र को विदाई देते हुए स्तब्ध और गमगीन है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब कोई व्यक्ति अपने जुनून और समर्पण के साथ संस्कृति की सेवा में उतरता है, तो वह कालजयी बन जाता है। ‘सूर्या’ के रूप में उन्होंने जो प्रकाश फैलाया है, वह भारतीय कला जगत का मार्ग सदैव प्रशस्त करता रहेगा।

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  • Rahul Kaushik

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