BRICS के लिए तड़पता पाकिस्तान: सदस्यता के लिए भारत की हरी झंडी क्यों बनी सबसे बड़ी शर्त?

गंभीर आर्थिक तंगी, विदेशी मुद्रा की कमी और भारी विदेशी कर्ज के बोझ तले दबा पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नए वित्तीय रास्ते तलाशने के लिए छटपटा रहा है। इसी कड़ी में इस्लामाबाद लंबे समय से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शक्तिशाली समूह ‘ब्रिक्स’ (BRICS) में शामिल होने के लिए हाथ-पांव मार रहा है। पाकिस्तान ने इस मंच की पूर्ण सदस्यता हासिल करने के लिए औपचारिक रूप से आवेदन दिया है, लेकिन बीजिंग और मॉस्को से बैक-चैनल समर्थन की उम्मीदों के बावजूद उसकी राह में सबसे बड़ी दीवार भारत की सहमति बनकर खड़ी है।

BRICS में शामिल होने के लिए क्यों बेताब है इस्लामाबाद?

पाकिस्तान की BRICS में दिलचस्पी केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि पूरी तरह से उसके अस्तित्व से जुड़ी आर्थिक मजबूरी है।

  • आर्थिक बदहाली और IMF पर निर्भरता: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की कड़ी शर्तों से परेशान पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए वैकल्पिक वित्तीय स्रोतों की तलाश में है।
  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) तक पहुंच: BRICS देशों द्वारा संचालित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से सस्ते और आसान दरों पर कर्ज पाना पाकिस्तान की मुख्य प्राथमिकताओं में से एक है। पाकिस्तान ने NDB में $580 मिलियन का शेयर खरीदकर अपनी मंशा पहले ही साफ कर दी है।
  • वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी: विस्तारित BRICS समूह आज दुनिया की लगभग 49% आबादी और क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर वैश्विक GDP के 40% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इस मंच का हिस्सा बनने से पाकिस्तान को व्यापार और निवेश के नए अवसर मिल सकते हैं।

भारत की ‘हाँ’ क्यों है अपरिहार्य?

BRICS कोई ऐसा संगठन नहीं है जहाँ केवल बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाए। संगठन के नियमों के अनुसार:

  • आम सहमति (Consensus) का नियम: BRICS में किसी भी नए देश को सदस्य बनाने के लिए सभी संस्थापक और मौजूदा सदस्यों की एकमत सहमति आवश्यक होती है।
  • भारत का वीटो जैसा अधिकार: भारत BRICS का एक संस्थापक और अत्यंत प्रभावशाली सदस्य है। यदि भारत किसी नए देश की प्रविष्टि पर आपत्ति जताता है, तो वह देश संगठन में शामिल नहीं हो सकता।

चीन और रूस का समर्थन भी नहीं आ रहा काम

पाकिस्तान ने रूस में अपने राजदूतों के माध्यम से और ‘ऑल-वेदर फ्रेंड’ चीन के जरिए दबाव बनाने की भरपूर कोशिश की है। हालांकि, रूस और चीन दोनों इस बात को भली-भांति समझते हैं कि भारत की सहमति के बिना इस प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि आतंकवाद को संरक्षण देने वाले और सीमा पार से अस्थिरता फैलाने वाले देश ऐसे वैश्विक आर्थिक मंचों की साख को प्रभावित कर सकते हैं। भारत की इस सैद्धांतिक स्थिति के कारण पाकिस्तान का BRICS में प्रवेश का सपना फिलहाल अधर में लटका हुआ है।

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  • Rahul Kaushik

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