नाजिया इलाही खान का बड़ा फैसला: ‘सनातन धर्म और अपने पूर्वजों की जड़ों की ओर वापसी’

भारतीय सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल मच गई, जब प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक विश्लेषक और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता नाजिया इलाही खान ने एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह ऐलान किया कि वे अपने पूर्वजों की मूल संस्कृति और धर्म यानी ‘सनातन हिंदू धर्म’ में वापसी करने जा रही हैं। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। नाजिया इलाही खान ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले को किसी दबाव, प्रलोभन या तात्कालिक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार, अपनी ऐतिहासिक जड़ों की पहचान और सत्य को स्वीकार करने की एक अनवरत बौद्धिक व आध्यात्मिक यात्रा का निष्कर्ष बताया है।

पूर्वजों की सच्चाई और ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति

अपनी घोषणा के दौरान नाजिया इलाही खान ने अत्यंत बेबाकी और गहराई के साथ अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, “हम सभी के पूर्वज एक ही संस्कृति और परंपरा से जुड़े हुए थे। इतिहास के पन्नों को यदि निष्पक्षता से देखा जाए, तो भारत की इस पावन भूमि पर रहने वाले अधिकांश लोगों की मूल जड़ें सनातन धर्म से ही जुड़ी हैं। समय और परिस्थितियों के प्रभाव में आकर भले ही हमारे पूर्वजों के मार्ग बदल गए हों, लेकिन उनकी आत्मा और उनकी पहचान हमेशा इसी मिट्टी से बंधी रही। मैं अब किसी भ्रम में नहीं रहना चाहती। अपने पूर्वजों की उस सच्चाई को सहर्ष, गर्व से और पूरी निष्ठा के साथ स्वीकार करना ही मेरी आत्मा की आवाज है।”

नाजिया इलाही खान का मानना है कि अपनी जड़ों को पहचानना और उनका सम्मान करना हर व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार और कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा केवल एक पूजा-पद्धति या कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक व्यापक, समावेशी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जो प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व का सम्मान करता है।

नाजिया इलाही खान का सामाजिक व कानूनी सफर

नाजिया इलाही खान को समाज के उन सशक्त चेहरों में गिना जाता है जो हमेशा अन्याय के खिलाफ और महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में निडरता से आवाज उठाते रहे हैं। पेशे से वकील होने के नाते उन्होंने भारतीय कानून और संविधान के दायरे में रहकर महिलाओं के अधिकारों, विशेषकर मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक और कानूनी संरक्षण के लिए लंबा संघर्ष किया है।

  • तीन तलाक और हलाला के खिलाफ लड़ाई: उन्होंने तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत), हलाला और बहुविवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ लगातार राष्ट्रीय मंचों पर अपनी आवाज मुखर की। उनका मानना रहा है कि किसी भी धार्मिक परंपरा के नाम पर महिलाओं का शोषण या उनका अनादर नहीं किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रवादी दृष्टिकोण: नाजिया इलाही खान अक्सर टीवी बहसों और सामाजिक सम्मेलनों में अपने प्रखर राष्ट्रवादी विचारों के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) के सिद्धांत की वकालत की है और देश की सांस्कृतिक एकता को सर्वोपरि माना है।
  • मानवाधिकार और महिला सशक्तिकरण: विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से उन्होंने पीड़ितों को कानूनी सहायता और न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सनातन धर्म में वापसी की वजह और वैचारिक परिवर्तन

नाजिया इलाही खान ने यह स्पष्ट किया कि उनका यह कदम किसी अन्य विचार या समुदाय के प्रति विद्वेष का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उनकी अपनी आध्यात्मिक खोज का प्रतिफल है। उन्होंने सनातन धर्म के प्रति अपने रुझान के मुख्य कारणों को भी साझा किया:

  1. सनातन का व्यापक और उदार दृष्टिकोण: सनातन धर्म में विचारों की स्वतंत्रता और प्रश्न पूछने की छूट है। यहाँ सत्य की खोज को सर्वोपरि माना गया है, न कि किसी एक कठोर नियम या कट्टरता को थोपा गया है। नाजिया ने बताया कि सनातन की इसी उदारता और दार्शनिक गहराई ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
  2. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध: भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का अध्ययन करते हुए उन्होंने पाया कि भारत की मूल पहचान यहाँ की वेद-उपनिषद कालीन संस्कृति से है। अपने इतिहास और पूर्वजों के योगदान को नकार कर कोई भी व्यक्ति अपनी पूर्ण पहचान प्राप्त नहीं कर सकता।
  3. लैंगिक समानता और स्त्री का आदर: सनातन परंपरा में स्त्री को केवल एक नागरिक के रूप में ही नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में पूजा गया है। जहाँ नारी का सम्मान होता है, वही संस्कृति शाश्वत और प्रगतिशील हो सकती है। नाजिया के अनुसार, सनातन धर्म में महिलाओं को प्राप्त सम्मान और स्वतंत्रता ने उन्हें इस मार्ग को चुनने के लिए प्रेरित किया।

देशभर में फैसले की प्रतिक्रिया

नाजिया इलाही खान के इस निर्णय के सामने आने के बाद देश भर से मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं:

  • सांस्कृतिक व सामाजिक संगठनों का स्वागत: विभिन्न साधु-संतों, सनातन धर्म गुरुओं और सामाजिक विचारकों ने नाजिया इलाही खान के इस कदम का खुलकर स्वागत किया है। उनका कहना है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर वापस लौटना (‘घर वापसी’) एक अत्यंत साहसिक और वंदनीय कार्य है। उन्होंने नाजिया के निर्णय को सत्य और भारतीय संस्कृति की जीत बताया।
  • महिला अधिकारों के समर्थकों की सराहना: कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उनके इस निर्भीक और स्वतंत्र निर्णय की सराहना की है। उनका मानना है कि हर व्यक्ति को अपनी आस्था और वैचारिक यात्रा को चुनने का पूर्ण संवैधानिक और व्यक्तिगत अधिकार है।
  • आलोचना और विवाद: हमेशा की तरह, कुछ कट्टरपंथी और पारंपरिक सोच रखने वाले वर्गों द्वारा उनके इस कदम की आलोचना भी की जा रही है। हालाँकि, नाजिया इलाही खान ने स्पष्ट किया है कि वे इस तरह के विरोधों से कतई विचलित नहीं हैं और अपने निर्णय पर पूरी तरह से अडिग हैं।

भविष्य की रूपरेखा और अनुष्ठान की तैयारी

नाजिया इलाही खान के अनुसार, वे जल्द ही पूर्ण विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार और सनातन परंपरा के अनुसार ‘शुद्धि यज्ञ’ एवं धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से विधिवत सनातन धर्म को अंगीकार करेंगी। इस आयोजन में विभिन्न आध्यात्मिक गुरुओं और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति की संभावना जताई जा रही है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन या अपनी मूल जड़ों में वापसी के बाद भी वे समाज सेवा, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और न्याय के लिए अपनी लड़ाई पहले से भी अधिक ऊर्जा और समर्पण के साथ जारी रखेंगी।

निष्कर्ष: एक नए वैचारिक युग की शुरुआत

नाजिया इलाही खान का यह निर्णय केवल एक व्यक्ति की धार्मिक आस्था में बदलाव मात्र नहीं है, बल्कि यह समकालीन भारत में चल रहे वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। उनका यह कथन—“पूर्वजों की सच्चाई को स्वीकार करना ही मेरी वास्तविक पहचान है”—उन सभी लोगों के लिए एक विचारणीय संदेश है जो अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों की खोज में हैं।

भारतीय संविधान हर नागरिक को अपनी इच्छा से धर्म अपनाने और अपने विचारों को व्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। नाजिया इलाही खान का यह साहसिक कदम भारत के उसी लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक ढांचे की मजबूती को दर्शाता है, जहाँ सत्य की खोज और अपनी जड़ों के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है।

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  • Rahul Kaushik

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