स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 (CWG 2026) से भारत के लिए एक बेहद गर्व और प्रेरणा देने वाली खबर आई है। भारत की स्टार पैरा-एथलीट शर्मिला धनखड़ (Sharmila Dhankar) ने महिलाओं की शॉट पुट (गोला फेंक) F57 स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है।
यह जीत केवल एक पदक भर नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पैरा एथलेटिक्स श्रेणी में भारत का पहला स्वर्ण पदक है। इसके साथ ही शर्मिला ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पैरा एथलेटिक्स पदक के पिछले 20 वर्षों के लंबे इंतजार को भी खत्म कर दिया है।
घरेलू हिंसा, गरीबी, शारीरिक अक्षमता और सामाजिक संघर्षों से लड़कर वैश्विक मंच के सर्वोच्च पोडियम तक पहुंचने वाली 40 वर्षीय शर्मिला धनखड़ की यह कहानी हर भारतीय को प्रेरित करती है।
ग्लासगो CWG 2026 में शर्मिला धनखड़ का स्वर्णिम प्रदर्शन
ग्लासगो के स्कॉट्सटौन स्टेडियम (Scotstoun Stadium) में खेले गए महिलाओं के शॉट पुट F57 फाइनल में शर्मिला धनखड़ ने शुरुआत से ही दबदबा बनाए रखा।
- पहला प्रयास: शर्मिला ने अपने पहले ही प्रयास में 9.48 मीटर का मजबूत थ्रो फेंककर अन्य प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त बना ली।
- सर्वश्रेष्ठ थ्रो: अपने अगले प्रयासों में उन्होंने अपने खेल के स्तर को और बेहतर करते हुए 9.81 मीटर का थ्रो फेंका, जो उनके इस सत्र का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (Season Best) साबित हुआ।
- पदक तालिका का परिणाम: घाना की जिनाबू इसाह (Zinabu Issah) 8.65 मीटर के थ्रो के साथ दूसरे स्थान पर रहीं और उन्होंने रजत पदक जीता। वहीं भारत की ही शिल्पा के. शायला ने 7.26 मीटर के थ्रो के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया, जिससे भारत को इस स्पर्धा में दोहरा पदक प्राप्त हुआ।
F57 श्रेणी क्या होती है?
पैरा एथलेटिक्स में F57 श्रेणी उन खिलाड़ियों के लिए तय की गई है, जो निचले अंगों की शारीरिक अक्षमता, पोलियों या कम मांसपेशी क्षमता से ग्रस्त होते हैं। इस श्रेणी के एथलीट अपनी जगह पर बने एक फिक्स्ड स्टूल (Seated Position) पर बैठकर गोला या भाला फेंकते हैं, जिसमें ऊपरी शरीर की ताकत, संतुलन और तकनीक की अहम भूमिका होती है।

कौन हैं शर्मिला धनखड़? शुरुआती जीवन और संघर्ष
शर्मिला धनखड़ हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के छितरौली गांव की रहने वाली हैं। जब वह महज 2 साल की थीं, तब पोलियो की चपेट में आने के कारण उनका एक पैर प्रभावित हो गया था।
शर्मिला की जिंदगी का शुरुआती सफर संघर्षों और विपत्तियों से भरा रहा:
- घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना: मात्र 18 वर्ष की आयु में शर्मिला का पहला विवाह हुआ। शादी के बाद उन्हें दहेज की मांग को लेकर लगातार मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। दो बेटियों (अंजू और लक्ष्मी) को जन्म देने के कारण उत्पीड़न और बढ़ गया।
- जिंदगी का सबसे कठिन दौर: 26 वर्ष की उम्र में एक गंभीर मारपीट के बाद उन्हें बेटियों के साथ घर से निकाल दिया गया। वह अपने मायके वापस लौटीं, जहां एक समय वह गहरे अवसाद और आत्मघाती विचारों से जूझ रही थीं।
- दूसरी शादी और जीवन का मोड़: 28 वर्ष की उम्र में शर्मिला का विवाह अजीत सिंह से हुआ। अजीत और उनके परिवार ने न केवल शर्मिला को अपनाया, बल्कि उनकी बेटियों को भी पूरा प्यार दिया
34 साल की उम्र में खेल की शुरुआत और परिवार का त्याग
आम तौर पर जहाँ एथलीट अपने करियर की शुरुआत किशोरावस्था में करते हैं, वहीं शर्मिला ने 34 वर्ष की आयु में खेल के मैदान पर कदम रखा।
- अजीत सिंह की भूमिका: शर्मिला के पति अजीत सिंह ने एक समाचार पत्र में पैरा एथलेटिक्स के बारे में पढ़ा और शर्मिला को खेलों में उतरने के लिए प्रेरित किया।
- घर बेचकर पूरा किया सपना: पेशेवर ट्रेनिंग और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के भारी खर्चों को उठाने के लिए शर्मिला के परिवार ने साल 2023 में अपना पैतृक घर तक बेच दिया। परिवार के इस अटूट विश्वास और त्याग ने शर्मिला के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने की आग जला दी।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय करियर की उपलब्धियां
खेल की दुनिया में कदम रखने के बाद शर्मिला ने पीछे मुड़कर नहीं देखा:
| प्रतियोगिता | उपलब्धि/स्थान |
|---|---|
| राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (2021) | राष्ट्रीय चैंपियन और 9.52 मीटर का नेशनल रिकॉर्ड |
| बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल 2022 | चौथा स्थान (पदक से चूकीं) |
| हांग्जो एशियाई पैरा गेम्स | चौथा स्थान |
| विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप | पांचवां स्थान |
| फाजा अंतरराष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स (दुबई) | स्वर्ण पदक (शॉट पुट) व कांस्य पदक (डिसकस थ्रो) |
| ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 | स्वर्ण पदक (9.81 मीटर) |
भारत के लिए इस ऐतिहासिक जीत के मायने
- 20 साल का सूखा खत्म: राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत ने पैरा एथलेटिक्स में आखिरी पदक साल 2006 (मेलबर्न) में जीता था, जब रंजीत कुमार जयसीलन ने पुरुषों के डिसकस थ्रो में कांस्य जीता था। शर्मिला ने स्वर्ण जीतकर इस 20 साल लंबे पदक के सूखे को समाप्त किया।
- भारत का पदक अभियान तेज: ग्लास्गो 2026 में शर्मिला धनखड़ का यह स्वर्ण भारत का प्रतियोगिता में दूसरा स्वर्ण पदक है (इससे पहले भारोत्तोलन में मीराबाई चानू ने पहला स्वर्ण पदक जीता था)।
- भावी पीढ़ी के लिए मिसाल: शर्मिला की बेटियां अंजू और लक्ष्मी भी एथलेटिक्स की राह पर हैं। शर्मिला का कहना है कि उनका सबसे बड़ा सपना अपनी बेटियों को वे सभी अवसर प्रदान करना है, जो उन्हें बचपन में नहीं मिल सके।
आंसुओं और कठिनाइयों से लिखी गई शर्मिला धनखड़ की सफलता की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे बुलंद हों और परिवार का साथ हो, तो उम्र, शारीरिक सीमाएं या बीता हुआ कल कभी आपकी सफलता के आड़े नहीं आ सकता। ग्लासगो के स्कॉट्सटौन स्टेडियम में जब तिरंगा लहराया और राष्ट्रगान बजा, तो वह केवल शर्मिला की जीत नहीं थी, बल्कि भारत की हर उस महिला की जीत थी जो विपरीत परिस्थितियों से लड़कर नया इतिहास लिखने का साहस रखती है।
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