युद्ध की आहट से कच्चे तेल में लगी आग: क्या बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल और खाद के दाम? जानिए सरकार का मास्टर प्लान

पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) और वैश्विक मंच पर छाए युद्ध के बादलों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्गों और रणनीतिक समुद्री रास्तों (जैसे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’) पर बढ़ते खतरे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव $115 प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से 90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में जरा सा भी उछाल भारत के राजकोषीय गणित और आम जनता की जेब पर सीधा असर डालता है। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में $1 की वृद्धि भी भारत के क्रूड इंपोर्ट बिल को लगभग 18,000 करोड़ रुपये बढ़ा देती है।

क्या महंगे होंगे पेट्रोल और डीजल?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल में तेजी से घरेलू तेल विपणन कंपनियों (OMCs – जैसे IOCL, BPCL, HPCL) के रिफाइनिंग मार्जिन और मुनाफे पर भारी दबाव बन रहा है।

  • तत्काल राहत की संभावना: फिलहाल केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियों का प्रयास है कि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में अचानक बड़ा इजाफा न किया जाए। सरकार ने रणनीतिक रूप से निर्यात पर ‘विंडफॉल टैक्स’ (विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क) का उपयोग कर रिफाइनरियों के अत्यधिक निर्यात लाभ पर अंकुश लगाया है, ताकि देश के भीतर ईंधन की सप्लाई निर्बाध बनी रहे।
  • दीर्घकालिक जोखिम: यदि युद्ध का संकट लंबा खींचता है और कच्चा तेल $110-$120 प्रति बैरल के ऊपर लगातार बना रहता है, तो तेल कंपनियों के लिए घाटा बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में आने वाले हफ्तों या महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

खाद (उर्वरक) और खेती-किसानी पर संकट का साया

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) की दरों में उछाल का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रभाव देश के कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। खाद, विशेष रूप से यूरिया और डीएपी (DAP) के निर्माण में प्राकृतिक गैस और नेफ्था प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होते हैं।

  1. सब्सिडी का बढ़ता बोझ: अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल के महंगे होने से उर्वरक निर्माण की लागत कई गुना बढ़ जाती है।
  2. किसानों पर असर: भारत सरकार किसानों को किफायती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी ‘फर्टिलाइजर सब्सिडी’ देती है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकार का प्रयास रहता है कि इसका सीधा बोझ किसानों पर न पड़े और उन्हें एमआरपी (MRP) पर ही खाद मिलती रहे।
  3. सरकारी खजाने पर दबाव: यदि वैश्विक बाजार में कच्चे माल के दाम ऊंचे रहे, तो केंद्र सरकार का उर्वरक सब्सिडी बजट अनुमान से काफी आगे निकल सकता है, जिससे वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने की चुनौती पैदा होगी।

भाड़ा (Freight Cost) और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान

युद्ध के खतरे के कारण केवल तेल ही नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) भी बुरी तरह प्रभावित हुई है:

  • समुद्री माल भाड़े में उछाल: संवेदनशील व्यापारिक मार्गों पर जोखिम बढ़ने के कारण जहाजों के बीमा प्रीमियम (Insurance Premium) और कंटेनर किराए में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशियाई बंदरगाहों के लिए कंटेनर फ्रेट दरें कई गुना तक बढ़ गई हैं।
  • महंगाई का चौतरफा हमला: जब माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन (डीजल/फ्यूल) महंगा होता है, तो सब्जी, राशन, दवाइयों से लेकर दैनिक उपभोग की सभी वस्तुओं की लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है, जिससे खुदरा महंगाई (Retail Inflation) में उछाल आता है।

संकट से निपटने के लिए भारत सरकार का ‘मास्टर प्लान’

वैश्विक अनिश्चितताओं और युद्ध की विभीषिका के बावजूद भारत सरकार इस बार रणनीतिक रूप से बेहतर तैयारी के साथ मैदान में दिख रही है:

1. रणनीतिक पेट्रोलियम और उर्वरक भंडार (Strategic Buffers)

सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल व उर्वरक कंपनियों ने कीमतें तुलनात्मक रूप से स्थिर रहने के दौरान ही कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरक/खाद का पर्याप्त बफर स्टॉक जमा कर लिया है। इससे अल्पावधि में देश में किसी भी प्रकार की किल्लत पैदा नहीं होगी।

2. तेल आयात का विविधीकरण (Sourcing Diversification)

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए केवल एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। रूस जैसे देशों से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद जारी रखकर भारत ने अपने ऊर्जा बिल को नियंत्रित करने का काम किया है। इसके अलावा अफ्रीकी और अमेरिकी बाजारों से भी आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

3. विंडफॉल टैक्स और राजकोषीय प्रबंधन

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव के आधार पर सरकार समय-समय पर ईंधन के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स में बदलाव करती है। इससे न केवल सरकारी राजस्व में मदद मिलती है, बल्कि घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता भी सुनिश्चित रहती है।

4. सब्सिडी सुरक्षा चक्र

सरकार की प्राथमिकता किसानों को उर्वरक संकट से बचाना है। यदि वैश्विक स्तर पर डीएपी और यूरिया के दाम बढ़ते हैं, तो केंद्र सरकार सब्सिडी की राशि बढ़ाकर किसानों तक इसका असर नहीं पहुंचने देने की नीति पर कायम है।

आगे की राह

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर $115 के पार पहुंच चुका कच्चा तेल यकीनन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी की घंटी है। यद्यपि सरकार के पास रणनीतिक भंडार और बेहतर वित्तीय स्थिति का सहारा मौजूद है, लेकिन यदि संकट लंबा खिंचता है तो महंगाई, रुपये की कीमत और आयात बिल पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल तात्कालिक राहत बनी हुई है, लेकिन आने वाले दिनों में वैश्विक परिस्थितियों पर ही पेट्रोल, डीजल और दैनिक वस्तुओं के दामों की दिशा निर्भर करेगी।

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  • Rahul Kaushik

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