बॉलीवुड में इन दिनों जासूसी (Spy) और देशभक्ति के इर्द-गिर्द गंभीर और तनावपूर्ण कहानियों का दौर चल रहा है। बड़े पर्दे पर एजेंटों के मिशन और देश की सुरक्षा से जुड़ी कई फिल्में आपने देखी होंगी, लेकिन निर्देशक आकाश ए. कौशिक ने इस गंभीर जॉनर को एक बिल्कुल ही नया और मजेदार मोड़ दिया है। आयुष्मान खुराना और सारा अली खान स्टारर फिल्म ‘उड़ता तीर’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, जो दर्शकों को थ्रिलर के साथ-साथ हंसी के ऐसे सफर पर ले जाती है, जहां लॉजिक से ज्यादा आपका मनोरंजन प्राथमिकता बन जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि यह फिल्म आपके वीकेंड या सिनेमाई अनुभव के लिहाज से कैसी है।
फिल्म की अनोखी कहानी: पहचान का कन्फ्यूजन और भूल-भुलैया
‘उड़ता तीर’ की कहानी शुरू होती है दो पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स—बिलाल अहमद (आयुष्मान खुराना) और उसके साथी अशफाक (सुहैल नैय्यर) से। ये दोनों भारत के खिलाफ बड़ी साजिश रचने और देश को नुकसान पहुंचाने के मकसद से सीक्रेट मिशन पर भारत आते हैं। अपने इस खतरनाक प्लान को अंजाम देने के लिए वे भारत के काउंटर टेररिज्म स्क्वॉड (CTS) में चुपके से घुसपैठ कर लेते हैं। बिलाल खुद को ऑफिसर विक्रांत के रूप में पेश करता है, जबकि अशफाक ध्रुव बनकर यूनिट में जगह बनाता है। अपने मिशन को मजबूत करने और अंदरूनी जानकारियां जुटाने के लिए बिलाल डिफेंस मिनिस्ट्री में काम करने वाली यामिनी (सारा अली खान) को अपने प्रेम जाल में फंसाता है।
कहानी में असली यू-टर्न तब आता है जब एक बड़े हादसे के बाद बिलाल कोमा में चला जाता है और उसकी याददाश्त पूरी तरह चली जाती है। होश में आने पर उसे यह बिल्कुल याद नहीं रहता कि वह पाकिस्तान से आया कोई जासूस है। इसके उलट, उसे अपने अंदर देशभक्ति का ऐसा भूत सवार होता है कि वह खुद को एक कट्टर और ईमानदार भारतीय अफसर (विक्रांत) समझने लगता है। अब वह भारत के खिलाफ काम करने के बजाय देश की सुरक्षा में जुट जाता है और भारत में सक्रिय पाकिस्तानी आतंकियों को एक-एक कर पकड़वाना शुरू कर देता है।
यहाँ से फिल्म में जबरदस्त और हास्य से भरपूर उधेड़बुन शुरू होती है। बिलाल के पाकिस्तानी साथी अशफाक की मुसीबतें हद से ज्यादा बढ़ जाती हैं, क्योंकि उसे समझ नहीं आता कि वह अपने दोस्त को कैसे रोके और अपने पाकिस्तानी आकाओं को क्या जवाब दे। बिलाल पूरी शिद्दत से खुद को देशभक्त मानकर मिशन को फेल कर रहा होता है, और यही ‘ड्रामैटिक आयरनी’ और गलतफहमियों का यह खेल दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता है।
अभिनय: आयुष्मान की कॉमिक टाइमिंग और राहुल बोस का सरप्राइज पैकेज
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टार कास्ट और उनका बेहतरीन अभिनय है।
- आयुष्मान खुराना: हमेशा लीक से हटकर और गंभीर सामाजिक मुद्दों पर फिल्में करने वाले आयुष्मान खुराना ने इस बार कॉमेडी और स्पाई जॉनर में अपनीVersatility साबित की है। एक ऐसा शख्स जो अपनी असली पहचान भूल चुका है और भारतीय अफसर बनकर देश की रक्षा में जी-जान से जुटा है, उसके इस दोहरे विरोधाभास और भोलेपन को आयुष्मान ने गजब के आत्मविश्वास के साथ पर्दे पर उतारा है। उनकी कॉमिक टाइमिंग और चेहरे के भाव फिल्म की जान हैं।
- राहुल बोस: फिल्म में सीटीएस चीफ बर्मन के रूप में राहुल बोस का अंदाज सबसे ज्यादा चौंकाता है और कई मौकों पर वह महफिल लूट ले जाते हैं। उनके पास भले ही बहुत लंबे डायलॉग्स न हों, लेकिन उनकी आंखों के इशारे, गंभीर माहौल में उनके अजीबोगरीब रिएक्शन और एक्सप्रेशंस दर्शकों को जोरदार हंसी दिलाते हैं।
- सुहैल नैय्यर: अशफाक के किरदार में सुहैल ने आयुष्मान का बेहतरीन साथ दिया है। एक तरफ दोस्त की देशभक्ति और दूसरी तरफ पाकिस्तानी आकाओं का दबाव—इन दोनों के बीच फंसे एक लाचार साथी के रूप में उनका अभिनय गुदगुदाता है।
- अन्य कलाकार: सारा अली खान ने यामिनी के किरदार में अपनी एनर्जी और चार्म बिखेरा है। हालांकि, उनके किरदार को कहानी में थोड़ा और स्पेस मिल सकता था। इसके अलावा दिवंगत अभिनेता मुकुल देव (आतंकी अजहर मकसूद के रूप में), राम कपूर (पाकिस्तानी आर्मी जनरल नियाजी), और गुलशन ग्रोवर (मीर) जैसे दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी फिल्म के सपोर्टिंग फ्रेम को और मजबूत बनाती है। मुकुल देव को पर्दे पर आखिरी बार देखना उनके फैंस के लिए एक भावुक पल भी है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक और लेखक आकाश ए. कौशिक ने एक कठिन विषय को कॉमेडी के चश्मे से देखने का साहसिक प्रयास किया है। आतंकवाद और जासूसी जैसी गंभीर पृष्ठभूमि को इस तरह मज़ाकिया और हल्के-फुल्के अंदाज में ढालना सराहनीय है। फिल्म का पहला हाफ बेहद तेज रफ्तार और फुल एंटरटेनिंग है, जहां सिचुएशनल कॉमेडी आपको लगातार हंसाती है।
हालांकि, दूसरे हाफ में जब फिल्म थोड़ा थ्रिल और ट्विस्ट की तरफ बढ़ती है, तो इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर पड़ती है। कुछ मोड़ दर्शकों को पहले ही अंदाजा लग जाते हैं, जिससे कॉमेडी का फ्लो हल्का सा प्रभावित होता है। अगर एडिटिंग थोड़ी और क्रिस्प (धारदार) होती, तो प्रभाव और गहरा हो सकता था। फिल्म के गाने बहुत ज्यादा असरदार नहीं हैं और औसत लगते हैं, लेकिन इसका बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के सस्पेंस और कॉमेडी पंचों का मजा दोगुना कर देता है। सिनेमैटोग्राफी साफ-सुथरी है और स्क्रीन पर एक गॉसी, रिच लुक बनाए रखती है।
निर्णय (Verdict): क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?
कुल मिलाकर, ‘उड़ता तीर’ एक ऐसी मनोरंजक फिल्म है जो खुद को बहुत ज्यादा गंभीर न बनाते हुए केवल आपको हंसाने और गुदगुदाने का काम करती है। अगर आप अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा ब्रेक लेकर दिमाग को पूरी तरह आराम देना चाहते हैं और दोस्तों या परिवार के साथ थिएटर में कुछ ठहाके लगाना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक पैसा वसूल विकल्प है।
यह भी पढ़ें: Creta का दबदबा कायम, Sierra की धमाकेदार एंट्री!
1 thought on “उड़ता तीर रिव्यू: आयुष्मान-सारा का मजेदार ‘देशभक्ति धमाका’”