जनसमाज संवाददाता, दिल्ली। प्रदर्शन और आंदोलनों का नाम सुनते ही अक्सर ज़हन में भीड़ का शोर, सरकार-विरोधी नारे, तख्तियाँ और तनाव का माहौल कौंधने लगता है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने दुनिया को यह दिखाया कि जब इंसानी जज़्बात और एक-दूसरे की मदद की भावना जागती है, तो हज़ारों की आक्रोशित भीड़ भी पल भर में एक परिवार में बदल जाती है।
हाल ही में आयोजित सीजेपी (CJP) विरोध प्रदर्शन के दौरान एक ऐसा वाकया सामने आया, जिसने इंटरनेट पर लाखों लोगों का दिल जीत लिया और लोगों की आँखों में नमी ला दी। भारी भीड़ और गहमागहमी के बीच एक छोटा बच्चा अपनी माँ से बिछड़ गया। घबराया और रोता हुआ बच्चा जब प्रदर्शनकारियों को दिखा, तो किसी ने भी आंदोलन के नारों को प्राथमिकता नहीं दी। पल भर में ही पूरे प्रदर्शन का रुख बदल गया और हज़ारों लोगों की भीड़ एक स्वर में चिल्लाने लगी: “प्रीति गुप्ता कहाँ हैं? आपका बच्चा यहाँ है!”
कैसे बदला एक तनावपूर्ण माहौल इंसानियत की मिसाल में?
सीजेपी प्रदर्शन में हज़ारों की तादाद में लोग अपनी माँगों को लेकर एकत्र हुए थे। चारों तरफ़ नारेबाज़ी हो रही थी, लोग तख्तियाँ लिए खड़े थे और जगह-जगह गुटों में बातचीत चल रही थी। इसी अफरा-तफरी और भीड़भाड़ में प्रीति गुप्ता नाम की एक महिला का छोटा बेटा अपनी माँ का हाथ छूट जाने के कारण भीड़ में कहीं खो गया।
भीड़ इतनी विशाल थी कि एक छोटे बच्चे के लिए अपनी माँ को ढूँढना नामुमकिन था। डर और घबराहट के मारे मासूम बच्चा रोने लगा। आमतौर पर ऐसी बड़ी रैलियों में लोग अपने-अपने मुद्दों में इतने व्यस्त होते हैं कि अक्सर आसपास की ऐसी घटनाओं पर ध्यान नहीं जाता। लेकिन यहाँ मौजूद युवाओं और आम नागरिकों ने संवेदनशीलता का परिचय दिया।
जैसे ही कुछ युवाओं की नज़र रोते हुए बच्चे पर पड़ी, उन्होंने तुरंत उसे संभाला और उसका नाम व उसकी माँ का नाम पूछा। बच्चे ने सहमी हुई आवाज़ में अपनी माँ का नाम “प्रीति गुप्ता” बताया। इसके बाद जो हुआ, वह सोशल मीडिया पर एक ऐतिहासिक पल बन गया।
प्रदर्शन के नारों की जगह गूँजा माँ का नाम
वहाँ मौजूद लोगों ने बिना एक पल गँवाए अपनी राजनीतिक या सामाजिक माँगों के नारों को रोक दिया। एक समूह ने ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया— “प्रीति गुप्ता कहाँ हैं? आपका बच्चा यहाँ है!”
यह आवाज़ केवल एक या दो लोगों तक सीमित नहीं रही। संदेश को हवा की गति से पूरी भीड़ में फैलाया गया। एक समूह से दूसरे समूह, और फिर तीसरे समूह तक यह आवाज़ एक “ह्यूमन चेन” की तरह आगे बढ़ती गई। देखते ही देखते पूरा प्रदर्शन स्थल इसी एक आवाज़ से गूंज उठा। हज़ारों लोग अपने हाथों को हवा में उठाकर और लाउडस्पीकर/माइक की मदद से केवल एक ही बात दोहरा रहे थे, ताकि भीड़ के किसी भी कोने में खड़ी माँ तक यह संदेश पहुँच सके।
वह भावुक क्षण: जब माँ को मिला उसका बच्चा
भीड़ के दूसरे कोने में अपने बच्चे को पागलों की तरह ढूँढ रही प्रीति गुप्ता ने जब चारों तरफ़ अपना ही नाम गूँजते हुए सुना, तो उनके कदम थम गए। जैसे ही उन्हें अहसास हुआ कि उनका बच्चा सुरक्षित है और लोग उन्हें ही पुकार रहे हैं, वह रोते हुए भीड़ को चीरती हुई आवाज़ की दिशा में भागीं।
जैसे ही प्रीति गुप्ता वहाँ पहुँचीं, बच्चे ने दौड़कर अपनी माँ को गले लगा लिया। माँ और बच्चे के इस भावुक मिलन को देखकर आसपास मौजूद सैकड़ों लोगों की आँखें भर आईं। जो भीड़ कुछ मिनट पहले उग्र और मुखर थी, वह इस पल ताली बजाकर और मुस्कुराकर इस पुनर्मिलन का जश्न मना रही थी।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो: इंटरनेट ने कहा “यह हमारा भारत है”
इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (विशेषकर इंस्टाग्राम और एक्स) पर शेयर किया गया, जो देखते ही देखते वायरल हो गया। लाखों लोगों ने इस वीडियो को देखा और शेयर किया।
इंटरनेट पर यूज़र्स ने प्रदर्शनकारियों की इस समझदारी और इंसानियत की जमकर तारीफ की:
- एक यूज़र ने लिखा: “यह सिर्फ़ एक प्रदर्शन नहीं था, यह कविता थी, यह इंसानियत का सबसे खूबसूरत रूप था।”
- दूसरे यूज़र ने टिप्पणी की: “नफ़रत और मतभेदों से परे, यह हमारा असली देश है जहाँ अनजान लोग भी एक-दूसरे का परिवार बन जाते हैं।”
- एक अन्य व्यक्ति ने लिखा: “किसी भी बड़े जनसमूह या मेले में बच्चों को उनके माता-पिता से मिलाने का यह सबसे तेज़ और सुरक्षित तरीका होना चाहिए।”
इस घटना से मिलने वाले बड़े सबक
यह घटना केवल एक बच्चे के खोने और मिलने की मामूली कहानी नहीं है। यह आज के समाज के लिए कई गहरे संदेश छोड़ जाती है:
- सहानुभूति और एकजुटता (Empathy): भीड़ का मतलब केवल बेकाबू लोग नहीं होते। यदि दिशा सही हो, तो भीड़ सबसे बड़ी सुरक्षा कवच बन सकती है।
- युवाओं की ज़िम्मेदारी: प्रदर्शन में मौजूद युवाओं ने जिस तरह से समझदारी दिखाई, उसने साबित किया कि देश की युवा पीढ़ी संवेदनशील और ज़िम्मेदार है।
- सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा: ऐसे बड़े आयोजनों में आयोजकों और अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अतिरिक्त सतर्क रहने की आवश्यकता है।
‘प्रीति गुप्ता कहाँ हैं?’ का यह नारा इतिहास के पन्नों में राजनीतिक नारों की तरह नहीं, बल्कि इंसानियत के सबसे सुरीले तराने के रूप में याद रखा जाएगा। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि चाहे हमारे वैचारिक मतभेद कितने भी बड़े क्यों न हों, जब बात किसी मासूम की सुरक्षा की आती है, तो हम सब एक हैं।
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