कौन थे पाकिस्तानी वकील चौधरी जुल्फिकार अली और ‘प्रहार’ फिल्म से जुड़ा सच?

भारतीय सिनेमा जगत में हाल ही में रिलीज हुई चर्चित फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ (Prahaar: The Untold Story of Ujjwal Nikam) ने दर्शकों का खूब ध्यान खींचा है। इस फिल्म में देश के जाने-माने स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर उज्ज्वल निकम के जीवन और उनके द्वारा लड़े गए ऐतिहासिक मुकदमों की गाथा को पर्दे पर उतारा गया है। फिल्म में अभिनेता राजकुमार राव मुख्य भूमिका यानी उज्ज्वल निकम के किरदार में नजर आ रहे हैं। वहीं, इस फिल्म में एक और किरदार की बहुत चर्चा हो रही है, जो पाकिस्तान के सरकारी वकील चौधरी जुल्फिकार अली का है। इस महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण किरदार को बेहतरीन अभिनेता जयदीप अहलावत ने निभाया है।

फिल्म के रिलीज होने के बाद से ही दर्शकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर असल जिंदगी में चौधरी जुल्फिकार अली कौन थे, उनका भारत के प्रसिद्ध वकील उज्ज्वल निकम से क्या नाता था और उन्होंने किस गलती को स्वीकार किया था? आइए इस लेख के माध्यम से इस पूरे इतिहास और इससे जुड़े दिलचस्प पहलुओं को विस्तार से जानते हैं।

कौन थे चौधरी जुल्फिकार अली?

चौधरी जुल्फिकार अली पाकिस्तान के एक जाने-माने और बेहद असरदार सरकारी वकील (पब्लिक प्रोसिक्यूटर) थे। उनका नाम मुख्य रूप से दो सबसे बड़े और सनसनीखेज मामलों से जुड़ा था—पहला 26/11 मुंबई आतंकी हमला और दूसरा पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या का हाई-प्रोफाइल मामला।

जब साल 2008 में मुंबई पर भयानक आतंकवादी हमला हुआ, तो भारत में एकमात्र जिंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। भारत की तरफ से इस केस की कमान उज्ज्वल निकम के हाथों में थी, जिन्होंने अपनी दलीलों और सबूतों के दम पर कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाया। दूसरी ओर, इस हमले की साजिश से जुड़े तार पाकिस्तान से भी जुड़े थे, जिसके लिए पाकिस्तान की अदालत में भी अलग से कानूनी कार्यवाही चल रही थी। इसी पाकिस्तानी मुकदमे की जांच और कानूनी प्रक्रिया से चौधरी जुल्फिकार अली सीधे तौर पर जुड़े हुए थे।

उज्ज्वल निकम के सामने कब और क्यों मानी थी गलती?

भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा से राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव रहा है, ऐसे में दोनों देशों के कानूनी दिग्गजों का आमने-सामने आना किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं था। मार्च 2012 में पाकिस्तान का एक न्यायिक आयोग (Judicial Commission) मुंबई आया था, जिसमें चौधरी जुल्फिकार अली भी शामिल थे।

इस दौरे के दौरान भारत के विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम और पाकिस्तान के वकील चौधरी जुल्फिकार अली के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई थी। रिपोर्ट्स और खुद उज्ज्वल निकम द्वारा साझा किए गए संस्मरणों के अनुसार, संवेदनशील और तनावपूर्ण माहौल के बावजूद जुल्फिकार अली का रवैया अन्य पाकिस्तानी अधिकारियों की तरह पूरी तरह अड़ियल नहीं था।

मुलाकात के दौरान जब दोनों देशों के बीच 26/11 हमले की साजिश और कानूनी दस्तावेजों को लेकर चर्चा हुई, तो एक अहम कानूनी बिंदु पर चौधरी जुल्फिकार अली ने उज्ज्वल निकम के तर्कों और आपत्तियों को गहराई से समझा। बातचीत के दौरान उन्होंने इस बात को महसूस किया और एक तरह से अपनी गलती या चूक स्वीकार की कि जिस तरह से मामलों को शुरुआती दौर में पाकिस्तान में हैंडल किया जा रहा था, उसमें कानूनी खामियां थीं। निकम ने एक इंटरव्यू या बातचीत में जिक्र किया था कि जुल्फिकार अली एक ऐसे व्यक्ति थे जो तर्कों को सुनने और निष्पक्ष कानूनी समझ रखने की क्षमता रखते थे।

दुखद अंत: जुल्फिकार अली की हत्या

इस ऐतिहासिक मुलाकात और दोनों देशों के बीच कानूनी संवाद के कुछ ही महीनों बाद एक बेहद चौंकाने वाली और डरावनी घटना घटी। मई 2013 की शुरुआत में जब चौधरी जुल्फिकार अली पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो हत्याकांड और मुंबई हमले की साजिश से जुड़े मामलों की जांच में पूरी तरह सक्रिय थे, तब उनकी निर्मम हत्या कर दी गई।

3 मई 2013 को इस्लामाबाद के जी-9 सेक्टर (G-9 Sector) में स्थित उनके घर के पास अज्ञात बंदूकधारियों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। इस वीभत्स हमले में उनकी मौके पर ही मौत हो गई। इस सनसनीखेज वारदात के बाद पूरी न्याय व्यवस्था में हड़कंप मच गया था। जब उज्ज्वल निकम तक यह खबर पहुंची, तो उन्हें भी गहरा सदमा और हैरानी हुई थी, क्योंकि कुछ समय पहले ही वे एक-दूसरे से कानूनी मुद्दों पर खुलकर चर्चा कर चुके थे। हालांकि, जांच एजेंसियों के मुताबिक उनकी इस हत्या का भारत-यात्रा या उज्ज्वल निकम से हुई बैठकों से कोई सीधा संबंध नहीं था, बल्कि यह पाकिस्तान के अंदरूनी राजनीतिक और आपराधिक षड्यंत्रों का नतीजा था।

फिल्म ‘प्रहार’ में इस किरदार का महत्व

निर्देशक अविनाश अरुण की फिल्म ‘प्रहार’ में इस अनसुने और गहरे इतिहास को पर्दे पर बहुत ही खूबसूरती के साथ पिरोया गया है। फिल्म के पहले भाग में जब कहानी कोर्टरूम और कानूनी दांव-पेच के बीच आगे बढ़ती है, तब जयदीप अहलावत द्वारा निभाया गया चौधरी जुल्फिकार अली का किरदार कहानी में एक अलग ही वजन और गहराई लेकर आता है।

जयदीप अहलावत ने अपनी दमदार एक्टिंग और सधी हुई बॉडी लैंग्वेज से इस पाकिस्तानी वकील के किरदार में जान फूंक दी है। स्क्रीन पर उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) और चौधरी जुल्फिकार अली (जयदीप अहलावत) के बीच की तकरार, वैचारिक आदान-प्रदान और वकीलों वाली नूराकुश्ती दर्शकों को बांधकर रखती है। यह फिल्म सिर्फ एक आतंकी हमले की कहानी नहीं है, बल्कि यह न्याय के लिए लड़ी गई उस लंबी और पेचीदा कानूनी लड़ाई का दस्तावेज है, जिसमें दोनों देशों के कानूनी पहलुओं को करीब से दिखाया गया है।

संक्षेप में कहें तो, चौधरी जुल्फिकार अली का किरदार और उनकी जिंदगी इस बात का प्रतीक है कि कैसे आतंक के खिलाफ वैश्विक न्याय की लड़ाई में कई बार सच्चाई की पैरवी करने वालों को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ती है। फिल्म ‘प्रहार’ के जरिए आज की पीढ़ी को इस ऐतिहासिक पात्र और घटना के बारे में गहराई से जानने का अवसर मिल रहा है।

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  • Rashika Sharma

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