नई दिल्ली: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और उनके फैसलों को लेकर विवाद अब चरम पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े निर्णयों को लेकर देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जहां एक तरफ देश के विभिन्न राज्यों और शहरों में विपक्षी दलों तथा सामाजिक संगठनों द्वारा विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह पूरा मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने, उनके द्वारा एकतरफा लिए गए फैसलों को असंवैधानिक घोषित करने और मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या मांगें रखी गई हैं?
सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका (PIL) में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है।
याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
- फैसलों को रद्द करना: अन्य दो चुनाव आयुक्तों (डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी) की कथित असहमति या सहमति के बिना लिए गए सभी 14 प्रशासनिक फैसलों और निर्देशों को अमान्य और असंवैधानिक घोषित किया जाए।
- पद से निलंबन और ‘को-वारंटो’ रिट: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से निलंबित करने और ‘को-वारंटो’ (Quo Warranto) रिट जारी कर उनसे यह पूछने की मांग की गई है कि वे किस अधिकार से आयोग के सामूहिक अधिकारों का अकेले प्रयोग कर रहे हैं।
- SIT या न्यायिक जांच: मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) के दौरान कथित तौर पर करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) या न्यायिक समिति का गठन किया जाए।
- डेटा की फॉरेंसिक जांच: ECI-Net के तहत एकत्र किए गए डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीयकरण और सुरक्षा प्रोटोकॉल की फॉरेंसिक ऑडिट कराई जाए।
आंतरिक मतभेद और विवाद की वजह
विवाद की मुख्य जड़ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और आयोग के कामकाज में कथित एकतरफा फैसलों को माना जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से याचिकाओं में दावा किया गया है कि पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 ऐसे बड़े अवसर आए, जब दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रस्तावों और फैसलों पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इसके बावजूद उनकी असहमति को दरकिनार करते हुए आदेश जारी कर दिए गए।
मुख्य विवादित बिंदु इस प्रकार हैं:
- फॉर्म-6 में बदलाव: नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में किए गए बदलावों पर सवाल उठाए गए हैं।
- डेटाबेस का केंद्रीयकरण: दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय द्वारा राज्यों के मतदाता डेटा पर नियंत्रण बढ़ाए जाने का विरोध हुआ है।
- मतदाताओं के नाम काटना: जमीनी स्तर पर बिना उचित सुनवाई या लिखित आदेश के बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने के गंभीर आरोप लगे हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी
सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों का दौर जारी है।
- दिल्ली (जंतर-मंतर व ECI कार्यालय): राजधानी दिल्ली में छात्र संगठनों और विपक्षी कार्यकर्ताओं ने निर्वाचन सदन की ओर मार्च करने की कोशिश की। जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
- पटना (बिहार): पटना के आयकर चौराहे पर विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पुतला फूंका और जोरदार नारेबाजी की। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए वाटर कैनन (पानी की बौछारों) का इस्तेमाल भी किया गया।
- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड: शिमला में चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर विरोध-प्रदर्शन के दौरान कालिख पोतने और पोस्टरों के माध्यम से इस्तीफे की मांग करने की घटनाएं सामने आईं। देहरादून में कार्यकर्ता सुरक्षा घेरे तोड़ते दिखे।
- जम्मू-कश्मीर विधानसभा: जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सत्र के दौरान भी यह मुद्दा गूंजा, जहां विपक्षी विधायकों ने बैनर और पोस्टर लहराकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।
विपक्षी दलों ने अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस मामले पर संतोषजनक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में देशव्यापी आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
इस पूरे घटनाक्रम पर देश की राजनीति पूरी तरह से गरमा गई है।
- विपक्ष का पक्ष: विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और इसके निर्णयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बिना वजह किए गए बदलावों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
- सत्तारूढ़ दल का रुख: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने विपक्षी दलों के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव में बार-बार मिल रही हार से हताश होकर संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को गिराने का प्रयास लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
- चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण: दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचारों या मतभेदों का होना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग का दावा है कि अंतिम फैसले नियमों के तहत और सर्वसम्मति से ही लागू किए जाते हैं।
आगे क्या?
सड़कों पर विरोध और सर्वोच्च अदालत में दायर याचिकाओं के बाद अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की ओर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई स्वीकार करते हुए क्या दिशा-निर्देश जारी करता है। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग की साख और जनता का उस पर विश्वास बनाए रखने के लिए इस विवाद का पारदर्शी समाधान निकलना अत्यंत आवश्यक है।
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