धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे बिना अनशन खत्म क्यों? सोनम वांगचुक का जवाब

जनसमाज संवाददाता,दिल्ली। देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक मामले को लेकर पिछले 26 दिनों से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे मशहूर पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आखिरकार अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में उन्होंने जल ग्रहण कर अपना अनशन तोड़ा।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल जो लगातार चर्चा के केंद्र में बना हुआ है, वह यह कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मुख्य मांग पूरी हुए बिना ही सोनम वांगचुक ने अनशन खत्म क्यों कर दिया? इस निर्णय पर उठ रहे सवालों और राजनीतिक अटकलों के बीच खुद सोनम वांगचुक ने अस्पताल के बिस्तर से एक वीडियो संदेश जारी कर इस फैसले के पीछे की वास्तविक और भावुक वजहें देश के सामने रखी हैं।

1. छात्रों का भविष्य और एफआईआर से सुरक्षा पहली प्राथमिकता

सोनम वांगचुक ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि केंद्र सरकार के साथ बातचीत के दौरान उनका मुख्य ध्यान किसी मंत्री के इस्तीफे पर नहीं, बल्कि आंदोलन में शामिल युवाओं और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने पर था।

वांगचुक ने बताया कि लद्दाख में उन्होंने देखा है कि किस तरह आंदोलन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर देने से उनका पूरा करियर और भविष्य तबाह हो जाता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर और 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च में भाग लेने वाले युवाओं को किसी भी कानूनी दंडात्मक कार्रवाई और पुलिस उत्पीड़न से बचाना ही उनकी सबसे बड़ी शर्त थी। जब सरकार ने लिखित आश्वासन दिया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई मुकदमा या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब उन्होंने इस मांग को प्राथमिकता देते हुए अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया।

2. देश में हिंसा की आशंका को टालना

अपने 26 दिन लंबे अनशन को समाप्त करने की एक बड़ी वजह बताते हुए वांगचुक ने कहा कि देश और दिल्ली में स्थितियां बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच गई थीं। जंतर-मंतर से लेकर सफदरजंग और मेदांता अस्पताल तक का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था।

  • लद्दाख घटना की कड़वी यादें: उन्होंने याद दिलाया कि 24 सितंबर 2025 को लद्दाख आंदोलन के दौरान युवाओं पर पुलिस और सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई में जान-माल का नुकसान हुआ था।
  • संभावित झड़प का डर: दिल्ली की सड़कों पर उग्र होते प्रदर्शनों और भारी पुलिस बल के कारण ऐसी आशंका बनने लगी थी कि कहीं फिर से कोई हिंसक झड़प न हो जाए।
  • शांति का संदेश: वांगचुक ने माना कि यदि वह अपने अनशन पर अड़े रहते और उनकी सेहत लगातार बिगड़ती, तो युवाओं में आक्रोश भड़क सकता था, जिससे पूरे देश में अशांति और हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। इसलिए उन्होंने हिंसा को रोकने और शांति बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया।

3. केंद्र सरकार से मिलीं 3 मुख्य लिखित गारंटियां

सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उन्होंने बिना किसी नतीजे के अनशन समाप्त नहीं किया है, बल्कि सरकार से मजबूत लिखित आश्वासन हासिल किए हैं। सरकार के साथ हुई वार्ता में निम्नलिखित तीन मुख्य मांगों पर सहमति बनी है:

सरकार द्वारा दी गई लिखित सहमतियांविवरण
१. कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च या जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले किसी भी छात्र पर केस या एफआईआर दर्ज नहीं होगी।
२. पीड़ित परिवारों को मुआवजाNEET परीक्षा पेपर लीक और धांधली के तनाव में आकर आत्महत्या करने वाले 20 से अधिक छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाएगा।
३. संसद में विस्तृत चर्चादेश की परीक्षा प्रणाली, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की जवाबदेही और भविष्य के शिक्षा सुधारों पर भारतीय संसद के पटल पर विस्तृत बहस होगी।

4. ‘इस्तीफे की मांग न मानने से नुकसान सरकार का ही है’

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए वांगचुक ने एक अलग दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि उनका दिमाग थोड़ा अलग तरीके से काम करता है।

“अगर शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, तो इससे छात्रों का नहीं, बल्कि खुद सरकार और मंत्री का नुकसान हो रहा है। नैतिक आधार पर अगर इस्तीफा पहले ही आ जाता, तो सरकार की इतनी जग-हंसाई न होती। इस्तीफे की जिद के चक्कर में अपने जीवन को जोखिम में डालना या देश को हिंसा की आग में झोंकना समझदारी नहीं होती।”

उन्होंने कहा कि वह अपनी व्यक्तिगत जिद या एक व्यक्ति के इस्तीफे के लिए जीवन का अंत नहीं करना चाहते थे, क्योंकि देश सेवा और शिक्षा सुधार के लिए उनका जीवित रहना जरूरी था। इसके साथ ही उन्होंने विश्वास जताया कि जन दबाव और नैतिक आधार के कारण मंत्री का मुद्दा खुद-ब-खुद हल हो जाएगा और छात्र आंदोलन आगे भी अपनी राजनीतिक मांगों को उठाता रहेगा।

5. ‘सौदेबाज़ी का आरोप लगाने वाले स्थिति से बेखबर हैं’

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सफदरजंग अस्पताल में रखे जाने के दौरान उनके साथ किसी बंदी जैसा व्यवहार किया गया, जहां उन्हें लोगों से मिलने या तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल करने से रोका गया। इन तमाम विकट परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने छात्रों के हक में लिखित गारंटी हासिल की और फिर जाकर अनशन समाप्त किया।

सोनम वांगचुक के इस कदम ने यह साबित किया है कि एक परिपक्व नेतृत्व हमेशा व्यक्तिगत जिद से ऊपर उठकर देश, युवाओं के भविष्य और सामाजिक शांति को प्राथमिकता देता है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर भले ही तत्काल सहमति न बनी हो, लेकिन छात्रों को मुकदमों से बचाना, मृतक परिवारों को मुआवजा दिलाना और संसद में परीक्षा सुधार पर चर्चा की गारंटी पाना इस 26 दिवसीय आंदोलन की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

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  • Rahul Kaushik

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