मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भौगोलिक और राजनीतिक तनाव के बीच एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुए एक भीषण ड्रोन हमले के बाद देश की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में से एक, सऊदी अरामको ने अपनी प्रमुख ‘ईस्ट-वेस्ट क्रूड ऑयल पाइपलाइन’ (पूर्वी-पश्चिमी कच्चे तेल की पाइपलाइन) से तेल की आपूर्ति को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। यह कदम सुरक्षा चिंताओं और हमले से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए उठाया गया है।
यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में स्थित मुख्य तेल क्षेत्रों को लाल सागर (रेड सी) के तट पर स्थित यानबू बंदरगाह से जोड़ती है। होर्मुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव और संभावित नाकाबंदी के बाद, सऊदी अरब इसी पाइपलाइन का उपयोग करके रोजाना लगभग 50 लाख (5 मिलियन) बैरल कच्चा तेल सुरक्षित रूप से पश्चिमी बाजारों और अन्य देशों तक भेज रहा था। अब इसके बंद होने से वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मच गया है और आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है।
हमले का घटनाक्रम और सुरक्षात्मक कदम
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय के एक आधिकारिक प्रवक्ता के अनुसार, तड़के सशस्त्र ड्रोन के एक समूह ने पाइपलाइन के पंपिंग स्टेशनों को निशाना बनाया। हालांकि, स्वचालित सुरक्षा प्रणालियों और त्वरित आपातकालीन प्रतिक्रिया टीमों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बड़े पैमाने पर आग लगने की घटना पर काबू पा लिया, लेकिन सुविधाओं को हुए संरचनात्मक नुकसान के कारण परिचालन को सुरक्षित रूप से जारी रखना संभव नहीं था।
सऊदी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा जांच, रिसाव के जोखिम का परीक्षण और क्षति की मरम्मत पूरी होने तक इस पाइपलाइन के माध्यम से तेल का प्रवाह निलंबित रहेगा। कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि यह एक एहतियाती कदम है ताकि किसी भी बड़े हादसे या पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचा जा सके। प्राथमिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमले में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर इस तरह का सीधा प्रहार सुरक्षा व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का विकल्प थी यह पाइपलाइन
वैश्विक तेल व्यापार में होर्मुज की जलडमरूमध्य को सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। हाल के दिनों में क्षेत्रीय संघर्षों और क्षेत्रीय तनावों के चलते जब होर्मुज मार्ग के बाधित होने की स्थिति बनी, तो सऊदी अरब ने अपनी इस 1,200 किलोमीटर लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ (जिसे पेट्रोलाइन भी कहा जाता है) को मुख्य वैकल्पिक मार्ग के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया था।
सऊदी अरब रोजाना लगभग 50 लाख बैरल कच्चा तेल फारस की खाड़ी के क्षेत्रों से हटाकर इस पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के यानबू पोर्ट तक पहुंचा रहा था। यहां से बड़े तेल टैंकरों के माध्यम से यूरोप, अमेरिका और एशिया के बाजारों में तेल भेजा जा रहा था। इस पाइपलाइन के अचानक बंद हो जाने से अब सऊदी अरब के सामने अपने दैनिक निर्यात को बनाए रखने की एक बेहद कठिन चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि होर्मुज मार्ग पहले से ही अत्यधिक जोखिम भरा बना हुआ है।
ग्लोबल ऑयल मार्केट और कीमतों पर असर
ड्रोन हमले और पाइपलाइन के बंद होने की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है। वैश्विक मानक ‘ब्रेंट क्रूड’ और अमेरिकी ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (WTI) की कीमतों में तत्काल तेजी दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों और ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति में 50 लाख बैरल प्रतिदिन की संभावित कमी एक बहुत बड़ा झटका है। कई प्रमुख आयातक देश—विशेष रूप से एशियाई अर्थव्यवस्थाएं जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर अत्यधिक निर्भर हैं—पहले से ही रणनीतिक भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का जायजा लेने लगी हैं।
ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार:
- सप्लाई चैन में रुकावट: रेड सी रूट पर निर्भर जहाजों को अब डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ेगा।
- रिफाइनरियों पर दबाव: एशियाई और यूरोपीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की समय पर आपूर्ति न मिलने से उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है।
- बीमा दरों में बढ़ोतरी: मध्य पूर्व से गुजरने वाले तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों के लिए समुद्री बीमा (Marine Insurance) की दरें काफी बढ़ सकती हैं, जिससे परिवहन लागत में इजाफा होगा।
भारत सहित विकासशील देशों पर संभावित प्रभाव
सऊदी अरब भारत के लिए कच्चे तेल के सबसे बड़े और सबसे विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। सऊदी की इस पाइपलाइन के ठप होने और कच्चे तेल के वैश्विक दामों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
- पेट्रोल और डीजल की कीमतें: यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा, जिससे आम जनता की जेब पर असर पड़ सकता है।
- मुद्रास्फीति (महंगाई) का खतरा: ईंधन की लागत बढ़ने से माल ढुलाई और परिवहन महंगा हो जाता है, जिसका सीधा असर सब्जियों, अनाज और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
- करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD): कच्चे तेल के आयात बिल में बढ़ोतरी से देश के चालू खाते के घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और भारतीय रुपये की विनिमय दर कमजोर हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और सुरक्षा चिंताएं
इस हमले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निंदा हो रही है। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, यूरोपीय संघ और कई एशियाई देशों ने नागरिक और ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुए इस हमले को वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बताया है। वैश्विक नेताओं ने ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने और क्षेत्र में तनाव कम करने की अपील की है।
वहीं, सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि वह देश की महत्वपूर्ण संपत्तियों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों ने भी सऊदी अरब के प्रति अपना पूरा समर्थन व्यक्त किया है और ऊर्जा परिसंपत्तियों पर हमलों को रोकने के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करने की बात कही है।
भविष्य की राह: कब तक बहाल होगी आपूर्ति?
सऊदी अरामको के इंजीनियर और तकनीकी दल इस समय प्रभावित पंपिंग स्टेशनों की मरम्मत और पाइपलाइन की सुरक्षा स्थिति का आकलन करने में लगे हुए हैं। हालांकि, कंपनी ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि पूर्ण आपूर्ति कब तक बहाल हो पाएगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आंशिक परिचालन शुरू होने में भी कुछ दिनों से लेकर एक हफ्ते तक का समय लग सकता है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें सऊदी अरब के अगले कदम और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की घोषणाओं पर टिकी हैं। यदि यह संकट लंबा खींचता है, तो विश्व अर्थव्यवस्था को एक बार फिर से गंभीर ऊर्जा संकट और महंगाई के नए दौर का सामना करना पड़ सकता है।
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