उत्तर प्रदेश के एक स्थानीय गांव स्थित प्रसिद्ध मंदिर के प्रांगण में शादी की शहनाइयां बज रही थीं। मंडप सज चुका था, रिश्तेदार और ग्रामीण नवदंपति को आशीर्वाद देने के लिए जमा हो रहे थे। पंडित जी वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शादी की रस्में पूरी करा रहे थे। सभी लोग खुशी-खुशी वर-वधू के सात फेरों का इंतजार कर रहे थे। लेकिन इस पूरे आयोजन के पीछे एक कड़वी और गैर-कानूनी सच्चाई छिपी हुई थी। मंडप में बैठी दुल्हन की उम्र महज 13 वर्ष थी, जबकि दूल्हा 20 साल का नवयुवक था।
जैसे ही विवाह की अंतिम रस्में पूरी होने वाली थीं, अचानक मंदिर प्रांगण में पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग की संयुक्त टीम ने दबिश दी। पुलिस की गाड़ियों का हूटर सुनते ही शादी के आयोजन में हड़कंप मच गया। जो रिश्तेदार कुछ देर पहले तक हंस-बोल रहे थे, वे अचानक घबराकर इधर-उधर देखने लगे। प्रशासनिक टीम ने तुरंत प्रभाव से शादी की रस्मों को बीच में ही रुकवा दिया और वर-वधू दोनों पक्षों के परिजनों से पूछताछ शुरू कर दी।
गुप्त सूचना के आधार पर हुई त्वरित कार्रवाई
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस प्रशासन और बाल संरक्षण इकाई को जिला चाइल्ड हेल्पलाइन (1098) के माध्यम से एक गुप्त सूचना मिली थी। सूचना देने वाले ने बताया कि क्षेत्र के एक मंदिर में कानून को ताक पर रखकर एक नाबालिग बच्ची का विवाह कराया जा रहा है। मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए स्थानीय थाना पुलिस और जिला बाल संरक्षण अधिकारी ने बिना किसी देरी के एक विशेष टीम का गठन किया और मंदिर परिसर की ओर रवाना हो गए।
जब प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंची, तब विवाह की रस्में अंतिम चरण में थीं। दूल्हा और दुल्हन मंडप में बैठे हुए थे। टीम ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए विवाह प्रक्रिया पर रोक लगा दी। अधिकारियों ने जब परिजनों से वधू की उम्र से संबंधित दस्तावेज मांगे, तो दुल्हन पक्ष के लोग बगलें झांकने लगे और कोई भी प्रामाणिक दस्तावेज पेश नहीं कर सके।
कागजातों की जांच में खुली पोल
पुलिस और बाल संरक्षण टीम ने जब गहनता से छानबीन की, तो नाबालिग लड़की का आधार कार्ड और स्कूल का ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) खंगाला गया। दस्तावेजों की जांच में यह स्पष्ट हो गया कि लड़की की जन्मतिथि के अनुसार उसकी वर्तमान आयु केवल 13 वर्ष कुछ महीने ही है। कानून के मुताबिक, भारत में लड़की की शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष तय की गई है।
लड़की नाबालिग तो थी ही, साथ ही 20 वर्षीय दूल्हा भी शादी की कानूनी उम्र (21 वर्ष) पूरी नहीं कर पाया था। यानी यह पूरी तरह से एक गैर-कानूनी बाल विवाह था, जिसे दोनों परिवारों की सहमति से चुपचाप संपन्न कराने की कोशिश की जा रही थी।
परिजनों की दलील और पुलिस की सख्त हिदायत
पूछताछ के दौरान दुल्हन के परिजनों ने गरीबी और सामाजिक दबाव का हवाला देने की कोशिश की। परिजनों का कहना था कि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने और घर में कोई कमाऊ सदस्य न होने के कारण वे जल्द से जल्द अपनी बेटी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे। वहीं दूल्हे के परिवार का कहना था कि उन्हें कानून की इतनी बारीकियों की जानकारी नहीं थी।
हालांकि, प्रशासनिक अधिकारियों ने परिजनों की इन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझाते हुए स्पष्ट किया कि गरीबी या अज्ञानता किसी भी स्थिति में कानून तोड़ने का बहाना नहीं बन सकती। 13 साल की बच्ची का विवाह करना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह उसके शारीरिक, मानसिक और शैक्षणिक विकास के साथ भी एक गंभीर खिलवाड़ है।
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) के समक्ष पेशी
शादी रुकवाने के बाद पुलिस टीम दूल्हा, दुल्हन और उनके माता-पिता को थाने ले आई। वहां दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए गए। इसके बाद नाबालिग बच्ची को बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee – CWC) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। समिति ने बच्ची का मेडिकल परीक्षण कराने के निर्देश दिए और उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसे सुरक्षित स्थान पर भेजने की प्रक्रिया शुरू की।
प्रशासन ने परिजनों से एक लिखित शपथ पत्र (Affidavit) भी लिया, जिसमें उन्होंने वचन दिया कि जब तक उनकी बेटी कानूनी रूप से बालिग (18 वर्ष) नहीं हो जाती, तब तक वे उसका विवाह नहीं करेंगे और उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने का पूरा अवसर देंगे। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि दोबारा इस तरह का प्रयास किया गया, तो परिजनों के खिलाफ ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम’ के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जेल जाना पड़ सकता है।
समाज के लिए एक सबक और जागरूकता की जरूरत
बाल विवाह जैसी कुप्रथा हमारे समाज के लिए आज भी एक बहुत बड़ा अभिशाप बनी हुई है। देश में कड़े कानून होने के बावजूद, दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में चोरी-छिपे नाबालिग बच्चों की शादी कराने के मामले सामने आते रहते हैं।
कच्ची उम्र में शादी कर देने से विशेष रूप से बालिकाओं का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होता है। कम उम्र में मां बनने से कुपोषण, स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं और मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality) का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा, कम उम्र में विवाह हो जाने के कारण लड़कियों का शिक्षा प्राप्त करने और अपने पैरों पर खड़े होने का अधिकार भी छिन जाता है।
कानून क्या कहता है?
‘बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006’ (Prohibition of Child Marriage Act) के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के की शादी कराना या उसमें सहायता करना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। इस कानून के अंतर्गत:
- बाल विवाह कराने वाले माता-पिता या अभिभावकों को 2 वर्ष तक की कठोर जेल की सजा और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
- शादी कराने वाले पंडित, मौलवी, मैरिज हॉल संचालक, बैंड-बाजे वाले और इसमें शामिल होने वाले अतिथियों पर भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
- ऐसे विवाहों को कानूनन अमान्य (Null and Void) घोषित किया जाता है।
नागरिकों की जिम्मेदारी
प्रशासन ने आम जनता से अपील की है कि वे बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ एकजुट हों। यदि किसी भी नागरिक को अपने आसपास या किसी मंदिर, मैरिज होम में बाल विवाह होने की जानकारी मिलती है, तो वे तुरंत चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 या स्थानीय पुलिस स्टेशन (112) पर सूचना दें। सूचना देने वाले की पहचान पूरी तरह से गुप्त रखी जाती है।
इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि समय पर मिली एक सूचना और प्रशासन की मुस्तैदी किसी मासूम बच्ची की जिंदगी और उसका भविष्य तबाह होने से बचा सकती है।
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