मध्यप्रदेश के छतरपुर स्थित प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र शास्त्री अक्सर अपने बयानों को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। लेकिन इस बार उनके द्वारा खान-पान और शाकाहार-मांसाहार (नॉनवेज) को लेकर दी गई एक टिप्पणी ने देश की राजनीति और सामाजिक गलियारों में नया बवंडर खड़ा कर दिया है। धीरेंद्र शास्त्री के इस विवादित बयान पर वामपंथी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सीपीएम के नेताओं ने धीरेंद्र शास्त्री की भाषा और सोच पर सवाल उठाते हुए अत्यंत कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है और उन्हें ‘मूर्ख’ तक कह डाला है। इस वाकयुद्ध के बाद से ही देश भर में सांस्कृतिक विविधता, खान-पान की स्वतंत्रता और धार्मिक गुरुओं के बयानों की सीमाओं को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
धीरेंद्र शास्त्री का बयान: आखिर क्या कहा था बागेश्वर बाबा ने?
दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब बागेश्वर धाम में आयोजित एक कथा और दिव्य दरबार के दौरान पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री संत समाज और अपने भक्तों को संबोधित कर रहे थे। सनातन धर्म में पवित्रता और आचार-विचार पर जोर देते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने शाकाहार का समर्थन किया। हालांकि, इस दौरान उन्होंने मांसाहार करने वाले लोगों पर हमला बोलते हुए कुछ ऐसी भाषा का प्रयोग किया जिसे कई वर्गों ने अपमानजनक माना।
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने ठेठ बुंदेलखंडी अंदाज में कहा कि जो लोग बेजुबान जानवरों को मारकर खाते हैं, उनका दिमाग और प्रवृत्ति भी राक्षसी हो जाती है। उन्होंने मांसाहार करने वालों की तुलना ताड़का और रावण जैसे पौराणिक राक्षसों से कर दी। धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि इंसान का शरीर फल, सब्जी और अनाज खाने के लिए बना है, न कि किसी जीव की हत्या करके उसका मांस पकाने के लिए। उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि जो लोग खुद को आधुनिक और प्रगतिशील मानते हैं लेकिन थाली में मांस सजाकर खाते हैं, वे वास्तव में सभ्य नहीं बल्कि मानसिक रूप से विकृत हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि सनातन धर्म की रक्षा करनी है और देश में शांति लानी है, तो हर भारतीय को तुरंत नॉनवेज खाना छोड़ देना चाहिए।
सीपीएम (CPM) का तीखा पलटवार: ‘कौन है ये मूर्ख…’
बागेश्वर बाबा का यह बयान जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, वामपंथी दलों और विशेष रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया। सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं ने धीरेंद्र शास्त्री के इस वक्तव्य को भारत की बहुसांस्कृतिक और बहुलवादी पहचान पर हमला करार दिया।
सीपीएम के एक प्रमुख नेता और प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए धीरेंद्र शास्त्री पर हमला बोलते हुए कहा, “कौन है ये मूर्ख जो देश की बहुसंख्यक आबादी के खान-पान का फैसला करेगा? भारत विविधताओं का देश है, जहाँ सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों, जनजातियों और समुदायों के लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार जीवन यापन करते आ रहे हैं। किसी कपड़े पहनने वाले बाबा को यह अधिकार किसने दिया कि वह देश के करोड़ों लोगों को राक्षस या मूर्ख कहे?”
सीपीएम नेताओं का कहना है कि भारत के संविधान ने हर नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने, अपनी आस्था का पालन करने और गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार दिया है। वामपंथी पार्टी ने आरोप लगाया कि धीरेंद्र शास्त्री जैसे लोग धर्म की आड़ में नफरत फैलाने और समाज को शाकाहारी बनाम मांसाहारी के नाम पर बांटने का काम कर रहे हैं। सीपीएम ने यह भी कहा कि पूर्वोत्तर भारत, केरल, बंगाल, तटीय क्षेत्रों और यहाँ तक कि देश के कई आदिवासी तथा दलित समुदायों में मांसाहार उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रहा है। ऐसे में पूरे समुदाय को एक झटके में ‘राक्षस’ कह देना भारत की संस्कृति का घोर अपमान है।
खान-पान और विविधता पर गहराया देशव्यापी विवाद
सीपीएम की इस सख्त टिप्पणी के बाद यह मामला केवल एक धार्मिक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले लिया है। एक तरफ जहां सनातन धर्म के कट्टर समर्थक, कई हिंदू संगठन और धीरेंद्र शास्त्री के अनुयायी बाबा के बयान के बचाव में उतर आए हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता, वामपंथी दल और क्षेत्रीय नेता सीपीएम के रुख का समर्थन कर रहे हैं।
- शाकाहार समर्थकों का पक्ष: बागेश्वर धाम के समर्थकों का तर्क है कि धीरेंद्र शास्त्री ने अहिंसा (जीव दया) और सनातन परंपरा के वैदिक सिद्धांतों की बात की है। उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि लोगों को सात्विक जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना था। समर्थकों का कहना है कि भारतीय दर्शन में ‘अहिंसा परमो धर्म:’ को सर्वोच्च माना गया है और एक धार्मिक गुरु होने के नाते धीरेंद्र शास्त्री का यह कर्तव्य है कि वे अपने श्रद्धालुओं को सही मार्ग दिखाएं।
- विरोधियों और प्रगतिशील विचारकों का पक्ष: इसके विपरीत, सीपीएम और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि धर्म का काम लोगों को जोड़ना होता है, न कि उनके खान-पान के आधार पर उन्हें नीचा दिखाना। भारत में पोषण, भूगोल और संसाधनों के आधार पर भोजन की विविधता विकसित हुई है। समुद्र तटीय राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, केरल, ओडिशा और गोवा में मछली और मांस सदियों से मुख्य आहार रहा है। यहाँ तक कि कई राज्यों में देवी-देवताओं को बलि चढ़ाने की पौराणिक परंपराएं भी रही हैं। ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री द्वारा मांसाहार को ‘राक्षसी’ बताना ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी करना है।
राजनीतिक रंग और चुनावी समीकरण
मध्यप्रदेश, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों में धीरेंद्र शास्त्री का अच्छा-खासा प्रभाव है। यही वजह है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे पर बेहद संभलकर बयानबाजी कर रहे हैं। बीजेपी के कई नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से धीरेंद्र शास्त्री का समर्थन करते हुए सीपीएम पर निशाना साधा है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि वामपंथी दल हमेशा से हिंदू संतों और सनातन परंपराओं का अपमान करते आए हैं और ‘मूर्ख’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल सीपीएम की हताशा को दर्शाता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने संतुलन बनाने की कोशिश की है। उन्होंने बाबा के बयान की भाषा पर तो असहमति जताई है, लेकिन सीपीएम द्वारा इस्तेमाल किए गए कड़े शब्दों से भी दूरी बनाई है। हालांकि, सीपीएम अपने स्टैंड पर कायम है और उसका कहना है कि अंधविश्वास और नफरत फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति का मुखर विरोध किया जाना चाहिए, चाहे उसका राजनीतिक या धार्मिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो।
क्या धर्म गुरुओं को अपनी भाषा पर संयम रखना चाहिए?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक मंचों से बोलने वाले धार्मिक गुरुओं की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? धीरेंद्र शास्त्री के युवा प्रशंसकों की संख्या लाखों में है, और उनके द्वारा कहे गए शब्दों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई धर्मगुरु खान-पान या व्यक्तिगत जीवनशैली को लेकर अतिवादी बयान देता है, तो इससे समाज में विभाजन और लिंचिंग जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
वहीं, दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को भी यह समझने की जरूरत है कि वैचारिक असहमति जताने के लिए ‘मूर्ख’ जैसी भाषा का प्रयोग करने से बहस का स्तर गिरता है
बाबा बागेश्वर के ‘नॉनवेज’ वाले बयान और उस पर सीपीएम के ‘कौन है ये मूर्ख…’ वाले पलटवार ने भारतीय राजनीति में धर्म, संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संघर्ष को एक बार फिर उजागर कर दिया है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में खान-पान केवल स्वाद का विषय नहीं है, बल्कि यह भूगोल, अर्थव्यवस्था और सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़ा है। ऐसे में किसी एक जीवनशैली को दूसरे पर थोपने या उसके आधार पर नागरिकों को आकलित करने से विवाद होना स्वाभाविक है। फिलहाल यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीति और गरमाने के आसार हैं।