ग्लेशियर पिघलने से बढ़ा खतरा: हिमाचल और सिक्किम की 34 झीलों में बढ़ा जलस्तर

नेपाल और तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा के बाद अब भारत के हिमालयी राज्यों पर एक बहुत बड़ा पर्यावरणीय संकट मंडराने लगा है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते वैश्विक तापमान (Global Warming) के कारण हिमालय के ऊंचे पहाड़ों पर जमे ग्लेशियर (हिमनद) तेजी से पिघल रहे हैं। इस तेजी से पिघलती बर्फ के कारण पहाड़ों की चोटियों पर विशाल प्राकृतिक झीलें बन रही हैं, जिन्हें ‘ग्लेशियल लेक्स’ (Glacial Lakes) कहा जाता है।

केंद्र सरकार और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 100 सबसे बड़ी और संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की 24×7 निगरानी की जा रही है। इनमें से 34 झीलों का जलस्तर और सतह क्षेत्रफल (Water Spread Area) चिंताजनक रूप से बढ़ चुका है। सबसे ज्यादा भयावह स्थिति पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में देखने को मिल रही है, जहाँ इन झीलों के अचानक फटने यानी ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

क्या है GLOF (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) और क्यों है यह इतना खतरनाक?

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जो तब आती है जब किसी ग्लेशियल झील को रोकने वाला प्राकृतिक बाँध (जो मिट्टी, पत्थरों और जम चुकी बर्फ यानी मोरैन से बना होता है) कमजोर होकर टूट जाता है या अचानक बह जाता है।

जब यह प्राकृतिक बाँध टूटता है, तो झील में भरा लाखों-करोड़ों क्यूसेक पानी, विशाल चट्टानों, मलबे, बर्फ और गाद के साथ नीचे की ओर अत्यंत तीव्र गति से बहता है। यह मलबा अपने रास्ते में आने वाले गाँवों, शहरों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) और सड़कों को पलक झपकते ही तबाह कर देता है। उत्तराखंड के केदारनाथ (2013) और सिक्किम में ल्होनक झील (2023) के फटने से आई तबाही इसके बहुत ही दर्दनाक उदाहरण रहे हैं।

ग्लेशियर पिघलने से बढ़ा खतरा हिमाचल और सिक्किम

किस राज्य में बढ़ा सबसे ज्यादा खतरा? (आंकड़ों की नजर में)

सरकारी रिपोर्ट और वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक, 100 बड़ी झीलों के विश्लेषण में 34 झीलों का जल दायरा बढ़ता पाया गया है:

  • हिमाचल प्रदेश: राज्य में निगरानी की जा रही 10 सबसे बड़ी ग्लेशियल झीलों में से 6 झीलों का क्षेत्रफल और जलस्तर बढ़ा है। लाहौल और स्पीति की प्रसिद्ध ‘घेपन गथ’ (Geepang Lake) और कुल्लू की ‘वासुकी झील’ में अभूतपूर्व फैलाव देखा गया है।
  • सिक्किम: पूर्वोत्तर के इस राज्य में कुल 42 मुख्य झीलों की निगरानी की जा रही है, जिनमें से 15 झीलों का जल क्षेत्र तेजी से बढ़ा है।
  • अन्य संवेदनशील राज्य: लद्दाख, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश की भी कई दर्जनों झीलें हाई-रिस्क श्रेणी में हैं, जिनका दायरा ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ रहा है।

हिमाचल में 525% बढ़े ग्लेशियल लेक्स: शोधकर्ताओं की चेतावनी

आईआईटी रोपड़ (IIT Ropar) और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी द्वारा किए गए एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, 1990 में हिमाचल प्रदेश में कुल 107 ग्लेशियल झीलें थीं, जो 2024 तक बढ़कर 669 हो गईं। यानी राज्य में इन झीलों की संख्या में 525% का विशाल उछाल आया है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इनमें से 88 झीलें ऐसी हैं जो भूकंप के झटकों, अचानक भूस्खलन, हिमस्खलन (Avalanche) या प्राकृतिक बाँध के कमजोर होने पर तुरंत फट सकती हैं। यदि ये झीलें फटती हैं तो चेनाब, ब्यास और सतलुज नदी घाटियों में स्थित लगभग 34 बस्तियों, 57 प्रमुख पुलों और 100 किलोमीटर से अधिक की सड़कों पर विनाशकारी असर पड़ेगा।

सरकार की तैयारी: डाउनस्ट्रीम मैपिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम

केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इस खतरे से निपटने के लिए बहुस्तरीय योजना पर काम शुरू कर दिया है:

  1. डाउनस्ट्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर मैपिंग: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार केवल झील का आकार नहीं देख रही, बल्कि यह भी मैप कर रही है कि झील फटने पर पानी किस रास्ते से बहेगा और रास्ते में कितनी आबादी, बिजली परियोजनाएं, बाँध और अस्पताल आते हैं।
  2. स्वदेशी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने हिमाचल प्रदेश के सिस्सू में Glacial Lake Outburst Flood Early Warning System का सफल परीक्षण किया है। इसका मकसद झील का जलस्तर या दबाव अचानक बढ़ने पर नीचे बसे गाँवों को समय रहते अलर्ट भेजना है।
  3. क्रायोस्फीयर रिसर्च सेंटर: जल शक्ति मंत्रालय के तहत रुड़की स्थित ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी’ (NIH) में सेंटर फॉर क्रायोस्फीयर एंड क्लाइमेट चेंज स्टडीज स्थापित किया गया है। यह सेंटर गंगोत्री, मिलम, खटलिंग (उत्तराखंड) और त्रिलोकी ग्लेशियर (हिमाचल) में हो रहे बदलावों का वास्तविक डेटा जुटा रहा है।

भविष्य की राह: विकास और पर्यावरण में संतुलन की जरूरत

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का स्पष्ट मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रहा तापमान अब सिर्फ कागजी चिंता नहीं, बल्कि एक ठोस मानवीय विभीषिका का रूप ले चुका है। पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकना और सुरंगों के लिए भारी ब्लास्टिंग स्थिति को और खतरनाक बना रही है।

समय रहते यदि ग्लेशियल झीलों के पानी को नियंत्रित रूप से बाहर निकालने की तकनीकें लागू नहीं की गईं और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का दायरा नहीं बढ़ाया गया, तो आने वाले समय में हिमालयी नदियाँ विकराल रूप धारण कर भारी तबाही मचा सकती हैं।

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  • Rahul Kaushik

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