तकनीकी क्रांति के इस दौर में स्मार्टफोन और लैपटॉप अब केवल विलासिता (luxury) का साधन नहीं, बल्कि आम इंसान की रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। चाहे पढ़ाई हो, दफ्तर का काम हो या डिजिटल लेनदेन, हर काम इन गैजेट्स पर निर्भर है। हालांकि, पिछले कुछ समय से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार से ग्राहकों के लिए निराश करने वाली खबरें सामने आ रही हैं। स्मार्टफोन और लैपटॉप के दामों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। एन्ट्री-लेवल और मिड्रेंज लैपटॉप से लेकर 5G स्मार्टफोन्स तक, लगभग सभी श्रेणियों में 10% से 35% तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
इस मूल्य वृद्धि ने आम बजट पर गहरा असर डाला है। मध्यम वर्ग और छात्रों के लिए नया लैपटॉप या स्मार्टफोन खरीदना चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में हर खरीदार के मन में एक ही सवाल है कि आखिर अचानक गैजेट्स इतने महंगे क्यों हो रहे हैं? और क्या निकट भविष्य में इनकी कीमतें घटेंगी या ये और भी महंगे होने वाले हैं?
क्यों बढ़ रहे हैं स्मार्टफोन और लैपटॉप के दाम? (प्रमुख कारण)
वैश्विक और घरेलू बाज़ार के कई तकनीकी और आर्थिक कारण मिलकर इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की कीमतों को ऊपर धकेल रहे हैं।
1. AI की भारी मांग और ‘मेमोरी क्रंच’ (Memory Crisis)
कीमतें बढ़ने का सबसे बड़ा और प्राथमिक कारण है दुनिया भर में तेजी से बढ़ता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का नेटवर्क। वैश्विक स्तर पर बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां (जैसे टेक जायंट्स और डेटा सेंटर) AI मॉडल्स और सर्वर तैयार करने में अरबों डॉलर लगा रही हैं। इन AI डेटा सेंटर्स को विशाल मात्रा में हाई-बैंडविड्थ DRAM (RAM) और NAND फ्लैश (SSD/स्टोरेज) की आवश्यकता होती है।
सैमसंग, एसके हायनिक्स (SK Hynix) और माइक्रोन जैसी प्रमुख मेमोरी निर्माता कंपनियों ने अपना ध्यान कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स (स्मार्टफोन/लैपटॉप) से हटाकर महंगे AI सर्वर मेमोरी चिप्स के उत्पादन पर केंद्रित कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, आम लैपटॉप और मोबाइल में इस्तेमाल होने वाली RAM की कीमतें लगभग 2.5 से 3 गुना तक बढ़ गई हैं। इस स्थिति को तकनीकी जगत में “चिपफ्लेशन” (Chipflation) कहा जा रहा है।
2. सेमीकंडक्टर और प्रोसेसर की कमी
केवल मेमोरी ही नहीं, बल्कि एंट्री-लेवल प्रोसेसर और जीपीयू (GPU) की आपूर्ति में भी बाधा उत्पन्न हुई है। प्रोसेसर बनाने के लिए सिलिकॉन और अन्य आवश्यक कच्चे माल की वैश्विक मांग काफी अधिक है। जब आपूर्ति कम होती है और मांग अत्यधिक, तो मैन्युफैक्चरिंग लागत अपने आप बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर अंतिम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।

3. रुपया-डॉलर विनिमय दर और आयात शुल्क (Currency & Import Impact)
भारत में बिकने वाले अधिकांश लैपटॉप, स्मार्टफोन और उनके पुर्जे (जैसे मदरबोर्ड, डिस्प्ले पैनल, कैमरा मॉड्यूल) विदेश से आयात किए जाते हैं। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर इन उत्पादों की लागत पर पड़ता है। डॉलर मजबूत होने से भारतीय कंपनियों के लिए कलपुर्जे आयात करना महंगा हो जाता है। इसके अलावा, सीमा शुल्क (Customs Duty) और अन्य लॉजिस्टिक्स खर्च भी कीमतों को और बढ़ा देते हैं।
4. ‘स्पेसिफिकेशन अपग्रेड’ और 5G टेक्नोलॉजी
आजकल के स्मार्टफोन और लैपटॉप में ऑन-डिवाइस AI फीचर्स, उच्च रिफ्रेश रेट वाली डिस्प्ले, बेहतर कैमरा सेंसर और बड़ी बैटरी जैसे आधुनिक फीचर्स दिए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, AI-सक्षम लैपटॉप (Copilot+ PCs) को सुचारू रूप से चलाने के लिए न्यूनतम 16GB RAM की आवश्यकता होती है। अधिक रैम और आधुनिक सेंसर की आवश्यकता के कारण बेस-मॉडल की निर्माण लागत (BOM – Bill of Materials) खुद-ब-खुद बढ़ जाती है।
सस्ते वेरिएंट्स का गायब होना: ‘स्पेसिफिकेशन कम्प्रेशन’
कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि वे दाम सीधे तौर पर ज्यादा न बढ़ाएं, अन्यथा बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है। इसके लिए कई कंपनियां ‘स्पेसिफिकेशन कम्प्रेशन’ (Spec Compression) का सहारा ले रही हैं।
इसका मतलब यह है कि पुरानी कीमत में ही नया मॉडल तो लॉन्च किया जाता है, लेकिन उसके फीचर्स घटा दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, जहां पहले किसी बजट में 16GB RAM या 512GB SSD मिलता था, अब उसी बजट में 8GB RAM या कम क्षमता वाली बैटरी दी जा रही है। यानी प्रत्यक्ष रूप से दाम स्थिर दिखे भी, तो अप्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता को कम फीचर्स के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं।
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