‘व्यूज के लिए कुछ भी?’ फर्जी सिम्पथी पाने के चक्कर में अपने बच्चों को गोद में लेकर वीडियो क्यों बना रही हैं महिलाएं?

डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया के दौर में ‘कंटेंट’ शब्द का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है। आज इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉट्स और फेसबुक वीडियोज के जरिए लोग रातों-रात मशहूर होने और पैसे कमाने का जरिया ढूंढ रहे हैं। लेकिन इस अंधी दौड़ में संवेदनाएं और सामाजिक मूल्य किस कदर गिर रहे हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब व्यूज और फर्जी सिम्पथी (सहानुभूति) हासिल करने के लिए बच्चों को एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इंटरनेट पर आए दिन ऐसे वीडियोज वायरल होते हैं, जिनमें महिलाएं गोद में रोते, बिलखते या अस्वस्थ बच्चे को लेकर अपने दुखड़ा रोती नजर आती हैं। कभी पति से अनबन का ढोंग, कभी गरीबी का अतिरंजित प्रदर्शन, तो कभी अपनी लाचारी का नाटक—इन सबमें एक चीज कॉमन होती है: गोद में मासूम बच्चा।

यह प्रवृत्ति अचानक से नहीं उभरी है, बल्कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम के काम करने के तरीके और मानसिक स्थिति के एक खतरनाक पहलू को उजागर करती है। सवाल यह उठता है कि कोई मां या महिला अपने खुद के बच्चे के मासूम चेहरे को इमोशनल ब्लैकमेलिंग का हथियार क्यों बना रही है?

एल्गोरिदम, ‘सिम्पथी-कार्ड’ और वायरल होने की लत

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का गणित सीधा है—जिस वीडियो पर लोग रुकेंगे, कमेंट करेंगे और शेयर करेंगे, वह वायरल होगा। साइकोलॉजिकल रिसर्च मानती है कि इंसानी दिमाग बच्चों, बुजुर्गों और जानवरों की लाचारी देखकर सबसे जल्दी इमोशनल होता है। महिलाएं और कंटेंट क्रिएटर्स इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ चुके हैं।

जब कोई महिला अकेले वीडियो बनाकर अपनी परेशानी बयां करती है, तो शायद उस पर लोग उतना ध्यान न दें। लेकिन वही महिला जब अपनी गोद में एक छोटे बच्चे को लेकर, आंखों में आंसू भरकर दुख बयां करती है, तो दर्शकों का दिल दहल जाता है। लोग बिना सच्चाई जाने रीच बढ़ाते हैं, भर-भरकर कमेंट्स करते हैं और शेयर करते हैं। कंटेंट बनाने वाले को पता होता है कि ‘सिम्पथी कार्ड’ खेलने से अकाउंट की रीच आसमान छूने लगेगी। एक बार रीच बढ़ी, तो स्पॉन्सरशिप, पेड प्रमोशंस और पैसों की बारिश शुरू हो जाती है। यानी जिस बच्चे को लाचार दिखाकर व्यूज बटोरे गए थे, वही बच्चा व्यूज और मॉनेटाइजेशन का सबसे बड़ा साधन बन जाता है।

फेक ड्रामा और स्क्रिप्टेड कंटेंट की बाढ़

आजकल इंटरनेट पर ‘कंटेंट’ और ‘हकीकत’ के बीच की रेखा पूरी तरह धुंधली हो चुकी है। कई मामलों में देखा गया है कि जो महिलाएं वीडियो में बेबस और लाचार दिखती हैं, वे असल जिंदगी में एक वेल-सेटल्ड लाइफ जी रही होती हैं। कैमरे के सामने ऑन-डिमांड रोना, रोने का बैकग्राउंड म्यूजिक लगाना और गोद में सो रहे या रो रहे बच्चे को कैमरे के बिल्कुल सामने एडजस्ट करना—यह सब एक सोची-समझी पटकथा (स्क्रिप्ट) का हिस्सा होता है।

कई बार तो वीडियो को ज्यादा ड्रामेटिक बनाने के लिए बच्चों को जबरन रुलाया जाता है या उनके अनकम्फर्टेबल होने के बावजूद उन्हें कैमरे के सामने घंटों रखा जाता है। अगर बच्चा सो रहा है, तो उसे उठाकर कैमरे के सामने लाया जाता है ताकि दर्शकों का ध्यान खींचा जा सके। यह महज कंटेंट क्रिएशन नहीं है, बल्कि बच्चों की मासूमियत का व्यावसायिक इस्तेमाल है।

मासूम बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर

जो महिलाएं व्यूज और पैसों के लिए अपने बच्चों को इस फर्जीवाड़े का हिस्सा बना रही हैं, वे शायद यह भूल रही हैं कि वे अपने ही बच्चों के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ कर रही हैं।

  • डिजिटल फुटप्रिंट और निजता का हनन: आज जो वीडियो ‘सहानुभूति’ के नाम पर इंटरनेट पर डाला जा रहा है, वह हमेशा के लिए वहां दर्ज हो जाता है। जब ये बच्चे बड़े होंगे और खुद को इंटरनेट पर इस तरह लाचार, बिकने वाले और सहानुभूति के पात्र के रूप में देखेंगे, तो उनके आत्मसम्मान को कितनी ठेस पहुंचेगी?
  • बचपन का छिन जाना: जिस उम्र में बच्चे को खिलौनों, पढ़ाई और बेफिक्र खेलकूद का माहौल मिलना चाहिए, उस उम्र में उसे कैमरे के सामने एक ‘प्रॉप’ बनाकर खड़ा कर दिया जाता है।
  • मानसिक तनाव: बार-बार कैमरे के सामने इमोशनल ड्रामा देखने से बच्चों के कोमल मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे समझ नहीं पाते कि उनकी मां सच में दुखी है या यह सिर्फ एक नाटक है, जिससे उनका विश्वास और मानसिक संतुलन प्रभावित होता है।

डिजिटल भिक्षावृत्ति और नैतिक पतन

पुराने जमाने में लोग सड़कों पर बच्चों को गोद में लेकर भीख मांगते थे, जिसे सामाजिक रूप से एक अपराध और मजबूरी माना जाता था। आज के डिजिटल दौर में वही काम ड्राइंग रूम में बैठकर, महंगे स्मार्टफोन से किया जा रहा है। इसे अगर ‘डिजिटल भिक्षावृत्ति’ (Digital Begging) कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। अंतर सिर्फ इतना है कि पहले सड़क पर कटोरा फैलाया जाता था, अब कमेंट सेक्शन में “यूपीआई आईडी” या “हेल्प” की अपील की जाती है।

यह प्रवृत्ति समाज के नैतिक पतन को दर्शाती है। जहां मातृत्व और मां के प्यार को दुनिया का सबसे पवित्र और स्वार्थरहित रिश्ता माना गया है, वहां व्यूज और फॉलोअर्स के लिए उसी रिश्ते का सौदा किया जा रहा है।

दर्शकों की जिम्मेदारी और डिजिटल अवेयरनेस

इस पूरी समस्या के लिए सिर्फ कंटेंट बनाने वाली महिलाएं या क्रिएटर्स ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि दर्शक भी उतने ही दोषी हैं। जब तक हम बिना सोचे-समझे ऐसे फर्जी और इमोशनल वीडियोज को लाइक, शेयर और कमेंट करेंगे, तब तक यह धंधा फलता-फूलता रहेगा।

दर्शकों को यह समझना होगा कि हर इमोशनल वीडियो सच नहीं होता। हमें ऐसी सामग्री को बढ़ावा देने के बजाय रिपोर्ट (Report) करना चाहिए। जब ऐसी फर्जी सिम्पथी वाली रील्स और वीडियोज पर व्यूज मिलना बंद हो जाएंगे, तो लोग खुद-ब-खुद बच्चों का इस तरह इस्तेमाल करना बंद कर देंगे।

सोशल मीडिया बेशक अपनी पहचान बनाने और कमाई करने का एक बेहतरीन जरिया है, लेकिन जब कमाई की कीमत किसी मासूम का बचपन और उसकी गरिमा बनने लगे, तो समाज और कानून दोनों को इस पर सख्त रुख अपनाने की जरूरत है। ‘व्यूज के लिए कुछ भी’ करने की यह होड़ अगर समय रहते नहीं रोकी गई, तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह बेहद खतरनाक साबित होगी।

यह भी पढ़ें: ‘मैं चाइनीज नहीं, हिंदुस्तानी हूँ!’ वायरल बच्ची के जवाब ने जीता देश का दिल

Author

Leave a Comment